लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह

राज दफ्तर जाने के लिये जिस स्टाप से मिनी बस पकडता था, वहाँ वह करीब करीब खाली होती थी. मुश्किल से तीन या चार सवारियाँ होती थी उसमें. फिर भी राज एक खास सीट पर हीं बैठता था. मिनी बस आगे जाती और उसमें सवारियाँ भरती जाती. जब तक वह लडकी बस में चढ़ती तब तक बहुत सारी सीटें भर जातीं, पर राज ध्यान रखता कि उसके बगल वाली सीट खाली रहे जिससे वह लडकी उसके बगल में बैठे. अक्सर ऐसा हो जाता कि उस सीट पर कोई दूसरा बैठ जाता या लड़की मुस्कुरा कर किसी अन्य सीट पर बैठ जाती. उस दिन राज उदास हो जाता और दिन भर उसका मन दफ्तर में नहीं लगता.

पर राज देख रहा था कि इधर कई दिनों से ऐसा हो रहा है कि वह लड़की उसी की बगल में बैठ रही थी. दोनों उतरते भी एक ही स्टाप पर थे. राज मन ही मन सोचता था कि लड़की से बातचीत की जाए, पर उसके दिल में यह भी ख्याल आता था कि लड़की न जाने क्या सोचेगी और वह चुप रह जाता था. लड़की की ओर से भी बातचीत के लिये कोई पहल नहीं थी. बस में चढते समय वह राज की ओर देख कर मुस्कुराती अवश्य थी, फिर उसकी बगल में बैठ जाती थी. राज ने चोरी छिपे एकाध बार उसकी ओर देखने की कोशिश की तो पाया कि वह खिड़की के बाहर के द्ऋष्यों में मग्न है.

कुछ दिनों पहले जब वह लडकी बस में चढ रही थी तो राज ने हिम्मत करकर उसको ध्यान से देखने की कोशिश की थी. छोटे कद की दुबली पतली लड़की थी वह. रंग गोरा तो नहीं था, पर वह काली या सांवली भी नहीं थी. उसके चेहरे के रंग को गेहुँआ कहा जा सकता था. चेहरा भी बहुत आकर्षक नहीं था, पर उसकी मुस्कुराहट जिसमें मासूमियत की झलक थी, उसके सब कम्मियों को दूर कर देती थी. उस दिन भी लडकी आकर उसी की बगल में बैठी थी. राज को लगा कि आज उससे बातचीत करनी चाहिए, पर कुछ सोचकर वह चुप रह गया. उसे लगा कि लडकी ने उसे ध्यान से देखते देख न लिया हो.

कल वह लडकी अपने स्टाप पर नहीं थी. मिनी बस जब वहाँ से निकल गयी तो राज को लगा, यह क्या हो गया? वह क्यों नहीं आयी?वह इतनी नियमित थी कि उसकी अनुपस्थिति राज सोच भी नहीं सकता था. उसे यह भी ख्याल नहीं आया कि वह छुट्टी भी ले सकती है. कोई भी आवश्यक काम पड सकता है. राज उदास अवश्य हो गया था और दिन भर किसी काम में उसका मन नहीं लगा था. कभी तो वह सोचता कि वह लडकी अब आयेगी ही नहीं. कभी कुछ और सोचने लगता. उसे तो यह भी नहीं पता था कि वह लडकी कुँआरी है या शादीशुदा. कभी उसके मन में यह भी ख्याल आ रहा था कि हो सकता है कि उसके पिता की तबियत खराब हो गयी हो या माँ बीमार हो गयी हो. उसे अपने ऊपर आश्चर्य भी हो रहा था कि क्यों वह इतना सोच रहा है उस लडकी के बारे में. क्या लेना देना है उसे उस लड़की से? क्या रिश्ता है उसका लडकी के साथ? ख्यालात राज का पीछा नहीं छोड रहे थे. उसके मन में एकबार यह भी ख्याल आया था कि हो सकता है कि वह लडकी अपने प्रेमी के साथ भाग गयी हो. पर इस विचार से उसको झटका लगा और राज ने उसे अपने अंदर ज्यादा देर तक टिकने नहीं दिया.

वैसे दफ्तर में राज ने अपने मित्र से ही इसके बारे में चर्चा करने की सोची. दफ्तर मे ऐसे तो बहुत लोग थे, पर वही एक मित्र था, जिससे वह खुल कर किसी बात पर चर्चा कर सकता था. राज को तो आज यह भी याद नहीं है कि कितने मतलब और बेमतलब की बातें उसने अपने इस मित्र से की है. उन दोनों के बीच कोई दुराव छिपाव नहीं था, पर इस मामले का जिक्र वह अपने उस मित्र से भी नहीं कर सका. पता नहीं क्यों राज को लगा कि मित्र उसकी मूर्खता का मजाक उडायेगा. मित्र ने एकबार उसकी अन्यमनस्कता का कारण जानने का प्रयत्न भी किया था,पर राज टाल गया था और काम का बहाना करके उसके पास से खिसक गया था.

राज को आश्चर्य हुआ कि दफ्तर से लौटते समय भी वह उसी लड़की के बारे में सोच रहा था. मिनी बस जब उस स्टाप से गुजरने वाली थी तो राज को लगा कि उसे वहीं उतर जाना चाहिए और उस लडकी के घर जाना चाहिए. फिर उसे ख्याल आया कि वह उस लडकी के घर का पता,यहाँ तक की उसका नाम भी नहीं जानता है. यह सोचकर उसे अपने आप पर बहुत क्रोध आया.

घर पहुँचते-पहुँचते राज ने अपने को सामान्य बनाने का प्रयत्न किया. उसे लगा कि परिवार के लोग उससे उसकी उदासी का कारण न पूछ बैठें. पर किसी ने पूछा नहीं. यों भी दफ्तर से लौटने ओोर खाना खाकर सोने के बीच समय ही कितना मिलता है कि परिवार के सदस़्य एक दूसरे की ओर इतना ध्यान दें. अगर बीच में रविवार न पडे तो परिवार के सदस़्य शायद एक दूसरे को ठीक से पहचान भी नहीं सके. ऐसे तो रविवार के दिन भी लोगों को एक दूसरे से बात करने की कितनी फुरसत होती है? न जगने का ठिकाना, न नहाने धोने का. दोपहर के भोजन के समय अवश्य सब एक साथ हो जाते हैं.

रात का खाना खाकर राज दस बजे के बाद हीं अपने विस्तर पर चला गया. परिवात के अन्य सदस्यों को इसमे भी कोई अनोखापन नहीं नजर आया. अपने कमरे में जाकर कुछ देर तक तो वह अखबार पढता रहा. फिर बत्ती बुझाकर सो गया. नींद तो उसे आ नहीं रही थी. वह योहीं करवटें बदलता रहा. दिन भर की घटनाएँ उसे एक एक कर याद आा रहीं थीं. ऐसे उस लडकी के बारे में सोचना उसे पागलपन के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं लग रहा था,पर राज हटा नहीं पारहा रहा उसे अपने दिलोदिमाग से.

राज को कब नींद आयी उसे पता भी नहीं चला, पर जागा तो पसीने से लथपथ था और उसकी सांसें जोर-जोर से चल रहीं थीं. राज को लगा कि वह जोर से चिल्लाया था और अब उसे आश्चर्य हो रहा था कि किसी ने उसकी आवाज सुनी क्यों नहीं. उसने एक भयानक स्वप्न देखा था. और उस स्वप्न की याद अभी भी उसके शरीर में कपकपीं पैदा कर रही थी. उसने देखा था कि वह लडकी, हाँ हाँ वही बस वाली लडकी आग कि लपटों से घिरी है. आग की लपटों के बीच भी राज को उसका चेहरा साफ-साफ नजर आ रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि लड़की के आसपास खडे़ लोग उसको बचाने का प्रयत्न क्यों नहीं कर रहे हैं. राज दौड कर लडकी के पास पहुँचना चाहता था, पर उसे ऐसा लग रहा था कि उसके पैर जंजीर से जकडे हुए हैं और चाह कर भी लडकी की सहायता के लिए नहीं पहुँच सकता है. राज को अपनी अस्हायावस्था पर रोना आा रहा था. उसने यह भी महसूस किया कि कुछ लोग उसकी तरफ इशारे भी कर रहे हैं राज को लगा कि लोग उसकी ओर इशारे कर के यह बताना चाहते हैं कि देखो यह वही शख्स है जिसकी वजह से लड़की इस हालात में पहुँच गयी है. इसी ने लडकी को इस अवस्था में पहुँचने पर मजबूर कर दिया है. राज जोर से चिल्ला पडा था,नहीं यह सब झूठ है. मैनें ऐसा कुछ भी नहीं किया. इसके बाद हीं उसकी नींद टूट गयी. कमरे में घुप्प अंधेरा था. ऐसा अंधेरा तो उसके कमरे में होता नहीं. हाँलाकि वह बत्ती बुझाकर हीं सोता है,पर आसपास की रोशनी के कारण उसका कमरा पूर्ण अंधकारमय नहीं हो पाता. शायद बिजली चली गयी थी,क्योंकि उसके कमरे का पंखा भी नहीं चल रहा था. अब नींद आने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता था.

सुबह जब राज उठा तो उसका सर भारी भारी लग रहा था. रात का स्वप्न बुरी तरह उसके दिमाग पर छाया हुआ था. वह यंत्रवत दफ्तर के लिए तैयार हुआ एक बार उसका मन हुआ कि इस बस को छोड दे,पर दफ्तर में देर से पहुँचने का भय उसे बस स्टाप तक ले ही गया. राज बहुत अनमने से मिनी बस में चढा. मिनी बस जब उस लड़की वाले स्टाप पर पहुँची,तो राज को बाहर देखने का भी साहस नहीं हुआ,पर जब वह लड़की बस में दाखिल हुई तो उसकी निगाह अनायास लड़की की ओर उठ गयी. वही चिर परिचित मुस्कान उसके चेहरे पर थी. राज ने सुना, लड़की उसके बगल में बैठते हुए कह रही थी,-“कल घर से निकलने में थोडी देर हो गयी और मैं यह बस न पकड सकी”.

 

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