कहानी |
आलोक कुमार सातपुते
फ़र्क़
एक शेरनी अपने बच्चों को शिकार सीखा रही थी,तभी उसकी नज़र महुआ बीनती हुई एक औरत पर पड़ी और उसने उस पर हमला करके उसे गिरा दिया और कहा-मैं तुम्हें खा जाऊँगी । इस पर उस औरत ने हाथ जोड़कर कहा-बहन,तुम मुझे छोड़ दो। मेरे बच्चे भूख से बिलबिला रहे होंगे। मै अपने बच्चों को दूध पिलाकर फिर आ जाऊंगी,तब तुम मुझे खा लेना । उसके ऐसा कहने पर शेरनी को शेर और गाय वाली कहानी याद आ गयी,जब शेर ने उस समय गाय को छोड़ दिया था।
शेरनी को विचार करते देख उस औरत ने फिर कहा तुम भी तो एक माँ हो । तुम मुझे नहीं समझोगी तो और कौन समझेगा । इस पर शेरनी ने उससे वापस आने का वादा लेकर छोड़ दिया,और अपने बच्चों के साथ एक पेड़ की छांव में बैठ गयी। पेड़ के नीचे बैठे-बैठे वह सोचने लगी कि शेर ने तो वापस आने पर गाय को छोड़ दिया था,पर मैं नहीं छोड़ पाऊंगी । उस समय तो जंग़ल में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी,और आजकल तो पानी भी बड़ी मुश्किल से मिल पाता है। सोचते-सोचते उसे झपकी सी लग आयी। कुछ देर बाद हल्ला-गुल्ला सुनकर उसकी आँखें खुल गयी,तो देखती क्या है कि वही औरत एक बड़ी भीड़ के साथ उसके बिल्कुल नज़्दीक पहुँच गयी है। वह अपने बच्चों को सम्भाल भी नहीं पायी,और उसे अपनी जान बचाने के लिये वहाँ से भागना पड़ा ।
अब शेरनी को जानवर और इंसान में फ़र्क़ समझ में आ गया था, लेकिन अपने बच्चों को खोने के बाद।
मुक्ति
रम्हऊ के छोटे भाई जगनू को छुटपन से ही मस्तिष्क सहित आधे शरीर में लकवा मार गया था। कुछ और बड़े होने पर उसे मिरग़ी के दौरे भी पड़ने लगे। प्रकृति के नियमानुसार उसके शरीर का तो विकास होता रहा,पर लकवाग्रस्त आधे भाग में संवेदनहीनता की स्थिति ही बनी रही। माँ-बाप जब तक ज़िन्दा रहे,उसकी दिनचर्चा को संभाले रखा। उनके मरने के बाढ़ रम्हऊ की पत्नी बुधनी को उसकी देखभाल करनी पड़ती। वह खीझती-झींकती हुई काम करती और रोज़ शाम को पति से अपने देवर की शिक़ायत करती । इसपर रम्हऊ उपने भाई को लात-घंूसों से मारा करता। अपनी खीझ वह इस रूप में प्रकट करता। अंततः पंगु जगनू की मृत्यु हो गई। मातमपुर्सी के लिये आये लोग रम्हऊ से कहते-अब होनी को कौन टाल सकता है भला…वैसे एक प्रकार से अच्छा ही हुआ जो उसे उसकी कष्टप्रद ज़िन्दगी से मुक्ति मिल गयी।
उसे मुक्ति मिले या न मिले,पर मुझे तो उससे मुक्ति मिल ही गयी,सोचकर उसके अधरों पर विद्रूप सी मुसकान तिरने
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