हिंदुत्व के खिलाफ हो रहे हैं षड्यंत्र

सिद्धार्थ शंकर गौतम 

दुनिया के सबसे पुराने धर्मो में से एक है। वर्तमान का हिंदू धर्म ही सनातन धर्म है। इस धर्म का दर्शन बहुत विशाल है और इसकी मूल अवधारणा है, वसुधैव कुटुंबकम। मेरा अपना मानना है कि जो भी हीन भावना को दुत्कारकर भगा दे, वही हिंदू है। मगर, वर्तमान में हिंदुत्व में ठहराव-सा आ गया है। हिंदू समाज को विभाजित करने का कुचक्र चल रहा है। कुछ कमी हम में है, तो कुछ हमारी राजनीति में। आज हिंदू बंटा हुआ है। कुटिल राजनीतिज्ञों की राजनीतिक चालों में फंसकर हिंदू विभाजित हो गए हैं। इतिहास गवाह है कि जो भी समाज संगठित रहा है, दुनिया में उसका ही सिक्का चला है। जैसे-पूरी दुनिया में यहूदियों की संख्या सवा करोड़ से ज्यादा नहीं है, पर विश्व की 47 प्रतिशत संपत्ति पर इनका आधिपत्य है। जिन वैज्ञानिक आविष्कारों का सुख पूरी मानवता भोग रही है, उनमें से साठ फीसदी से अधिक यहूदियों ने किए।

ऐसा नहीं है कि यहूदियों में वर्ण व्यवस्था नहीं थी। प्राचीनकाल में इस समाज में तीन वर्ण होते थे, मगर सदियों तक शोषित तथा दबे-कुचले यहूदियों ने स्वयं को संगठनात्मक स्तर पर इतना मजबूत और एकात्म किया कि वर्तमान में यहूदी एक सशक्त ताकत के रूप में पूरी दुनिया से अपना लोहा मनवा रहे हैं। हिटलर ने यहूदियों पर जुल्म ढाए, मुस्लिम शासकों ने उनका वजूद मिटाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। फिर भी, यहूदी सिर उठाकर जी रहे हैं। इसका कारण सिर्फ एकता है। जब यहूदी एक हो सकते हैं, वे वर्णो और वर्गो से मुक्त हो सकते हैं, तो हिंदू क्यों नहीं? आखिर हिंदू भी तो सदियों से दबे-कुचले रहे हैं। फिर, यहूदियों के मुकाबले हिंदू आबादी भी बहुत ज्यादा है। तब कहीं तो कमी होगी? ऐसे कई संगठन हैं, जो हिंदुओं को एकजुट करने के प्रयास में लगे हुए हैं, तब यह काम हो क्यों नहीं रहा है? दरअसल, जो भी संगठन हिंदुओं को एकजुट करने का पवित्र कार्य कर रहे हैं, उनमें व्यावहारिकता की कमी स्पष्ट रूप से दिखती है। लगता है, मानो रंगमंच पर कोई नाटक चल रहा है, जिसका प्रमुख पात्र भी हिंदू है और खलनायक भी हिंदू। हिंदू तभी एकजुट हो सकेंगे, जब वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल उन्हें ढाला जाएगा।

भाषावाद, जातिवाद, प्रांतवाद आदि का भेद पूरी तरह समाप्त हो। सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक भेदभाव बंद हो। वर्तमान में हिंदुओं को एकजुट करने के जितने भी प्रयास होते हैं, उनमें इन सभी बुराइयों को दूर करने के प्रयास नहीं किए जाते। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने हिंदुत्व को जमकर नुकसान पहुंचाया है। एक सशक्त, एकात्म और संगठित हिंदू समाज के निर्माण के लिए जब तक प्रचीनकाल से चली आ रही बुराइयों को दूर नहीं किया जाएगा, हिंदू एकजुट नहीं हो सकते। आज हिंदू और हिंदुत्व की अवधारणा ही भारत को विदेशी आक्रांताओं से बचा सकती है। अपने आसपास के परिवेश में हम आसानी से देख रहे हैं कि दूसरे धर्म-संप्रदाय स्वयं की संगठनात्मक क्षमताओं में कैसे वृद्धि करते जा रहे हैं, वह भी हिंदुओं की भागीदारी से। कई हिंदू इन धर्म-संप्रदायों को ग्रहण करके इनका आधार बढ़ा रहे हैं।

फिर, यह कहने में भी गुरेज नहीं होना चाहिए कि कमी हमारी ही राजनीतिक व्यवस्था में है, तभी हिंदू इस कदर दिग्भ्रमित हैं कि उन्हें अन्य धर्म अपनाने पड़ते हैं। इस प्रकार की समस्या आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आम है। मात्र अंशकालीन लाभ के लिए देश के पथभ्रष्ट राजनीतिज्ञ दीर्घकालीन नुकसान की अनदेखी कर रहे हैं, जिसे किसी भी नजरिए से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि भारत में हिंदू ही सुरक्षित न रहा, तो कौन रहेगा? फिर देश के भीतर तो ठीक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदू व हिंदुत्व के खिलाफ कुछ ताकतों द्वारा झंडा बुलंद किया जा रहा है। हो सकता है कि इस बात से कुछ लोग सहमत न हों कि हिंदुओं के विरुद्ध कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र चल रहा है। ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि नेपाल, जो विश्व का एकमात्र घोषित हिंदू राष्ट्र था, आज उसका क्या हुआ? क्या यह हिंदुत्व के विरुद्ध षड्यंत्र नहीं है? पूरी दुनिया में ऐसे ही षड्यंत्र चल रहे हैं और इससे बचने का उपाय यह है कि हमें हिंदू धर्म का पुनर्गठन करना होगा। जातियों और वर्णो की समाप्ती वर्तमान समय की आवश्यकता है। यह होगा कैसे, हमारे विद्वानों और विचारकों को अब इसी पर विचार करना होगा।

8 thoughts on “हिंदुत्व के खिलाफ हो रहे हैं षड्यंत्र

  1. इन वर्षों देश में चुआचुत देखने में नहीं आरही है !बसों में ट्रेनों में स्माल बिग होटलों में ,मंदिरों में भी कोई नहीं पूछता है की तुम किस जाती के हो !इक्का दुक्का अपवाद घटनाओ को तूल देने की कोई जरुरत नहीं!वेसे कलक्टर और चपरासी कभी बराबर नहीं हो सकते चाहे किसी जाती के हो !सेठ और मुनीम बराबर नहीं !ये स्तरके भेदभाव तो स्वाभाविक है !समाज में भेदभाव तो केवल राजनीती वालो ने जानाबुज कर विक्सित किये है !नए नए शब्द अल्पसंख्यक ,दलित ,जनजाति अनुसूचित ,धर्मनिरपेक्स, आदि! ये सब समाज को लड़ाने के लिए शब्द रचना की गयी !सन ७१२ से सन १५०० तक मुसलमानों ने हिन्दुओं पर राजेतिक आक्रमण के साथ धार्मिक आक्रमण किये श्रधा केंद्र मंदिर तोड़े धर्म ग्रन्थ जलाये, स्त्री धन लुटा ,हिन्दू नहीं समझा की ये केवल राजनेतिक आक्रमण नहीं है ! अग्रेजो ने समाज में नकली भेदभावो को विसित किया नयी शब्द रचना की ,नयी शिक्षा व्यवस्ता दी जिससे व्यक्ति भारतीय न रह सके ,धर्मान्तरण किया ,काले अंग्रेज बने ,हिन्दू इसके दूरगामी कुप्रभावो को नहीं समझ सका !सता के लालची राजनेतिक लोगो ने भी अग्रेजो की चाल जरी राखी हुई है ! अपर धन के बल पर विदेशियों ने यहाँ सेकड़ो ngo चलाकर देशद्रोही तेयार कर दिए है जो उनकी आदेश से बोलते है ,आन्दोलन करते है ,मानवाधिकार के नाम पर देश द्रोहियों का आतंक करियो का,असामाजिक व्यक्तियों का पक्स और हिन्दुओ का विरोध करते है !बड़े बड़े नेताओ और ब्यूरोक्रेट्स के काले कारनामो की फाईले पश्चिमी देशो के शासको के पास होने से हमारे नेता ब्लेक मेल होकर देश को नुकसान तक पहुचने वाले समझोतों पर साइन कर देते है !कोई अमेरिका का गुलाम कोई चीन का कोई रूस का तो कोई पाकिस्तान का गुलाम है देश को भगत सिग ,सुखदेव ,राजगुरु ,असफाक,या उधमसिग जेसे युवको की जरुरत मह्सुश होने लगी है !होगा वही जो राम रची रखा !!

  2. भेद भाव किस धर्म मैं नहीं हैं केवल बराबरवाद के नाम पर इस सास्वत धर्म की टांग मत खिचिये …मीत खाने वाले और साकाहारी , सराब सुतने वाले और यम-नियम पर चलने वाले बराबर कैसे हो सकते हैं, जातिओं का आधार स्वाभाव था , आज जो ब्रह्मण मुर्गा खता है वह चौथे वर्ना का ही है, संत रैदास ब्राहमण ही थे ,,रामदेव जन्म से नहीं अपने स्वाभाव के कारन सभी के पूजित हैं, हिन्दू पुस्तकों के फतवे से नहीं अपने विवेक पर जिन्दा है

  3. गौतम जी आप की चिंताओं की मैं भी कद्र करता हूँ .
    ज़रा लगे हाथों इस लिंक पर भी नज़र डालियेगा और इसके बारे में भी कुछ रौशनी डालियेगा अपने अगले लेख में की इसमें कौन सी शक्तियां षड्यंत्र रच रही हैं ? इस विषय पर मुझे आपके अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी.
    http://dailyreportsonline.blogspot.com/2011/12/blog-post_08.html?spref=fb

  4. कमी राजनैतिक व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था में है.आज भी उन सवर्ण हिन्दुओं की कमी नहीं जो दलित और आदिवासी हिन्दुओं के साथ बैठने में भी अपनी तौहीन समझते है.उनके साथ खान पान का सम्बन्ध तो दूर की बात है.आज अंतर्जाल बार हिन्दू धर्म की विभिन्न जातियों के नाम पर खुले हुए वेब साईट पर जाईये,आपको पता चल जायेगा कि हम में एक दूसरे के प्रति कितना भेद भाव है?मैं भी मानता हूँ कि हिन्दू दर्शन जिसका प्रचलित नाम प्राच्य दर्शन है,बहुत संवृद्ध है,पर उसका अनुशरण करने वाले कितने हिन्दू हैं?हिन्दू आपासी भेद भाव और छूत अछूत का झगडा छोड़ कर एक साथ तो खड़े हों,तभी आगे के कदमों पर विचार किया जा सकता है.

  5. किसी भी अच्छे धर्म का बचना ना केवल उसके धर्मावलम्बियों के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए जरूरी है.

  6. समय रहते हिन्दू जागे तो बेहतर है..वरना हिंद महासागार ही एक आसरा होगा.
    खैर, सेकुलरिज्म की अफीम खिलाकर सुलाए गए हिन्दू तब ही जागेगा, जब सेकुलरिज्म के नाम पर सोनिया दरबार की खैरात पाकर चलनेवाला मीडिया बेनकाब हो.

  7. GAUTAM JI, BAHUT ACHA LIKHA APNAI, LEKIN HAMARA DURBHAGYA YAI HAI KI HAMARE PASS EK KENDRIT SATA NAHI HAI ( JIS TARAH “SIKH DHARAM” MAI HAI), ISLIYE HER KOI APNI APNI DHAPLI BAJA RAHA HAI, NAI-NAI GUTU PEDA HO RAHAI HAI, NAI NAI SAMPARDAYE ARAHAI HAI…………..

    PHIR BHI HUM “HINDU” HAI AUR “SANATAN DHARAM” TAB TAK RAHAIGA, JAB TAK YAI “SANSAR” HAI…………….

  8. क्या बाल ठाकरे का खानदान हिन्दू है ……जिसकी पोती ने हाल ही में एक मुस्लिम से निकाह करके इस्लाम धर्म स्वीकार किया है…
    आज बाल ठाकरे से बाल ठाकरे सेकुलर कह्लाएगे हिन्दू नहीं कोई शक ?

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