लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

Posted On by &filed under धर्म-अध्यात्म.


भारतीय नवजागरण का अग्रदूत यदि स्वामी विवेकानेद को कहा जाय, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने सदियों की गुलामी में जकड़े भारतवासी को मुक्ति का रास्ता सुझाया। जन-जन के मन में भारतीय होने के गर्व का बोध कराया। उन्होंने मानव समाज को अन्याय, शोषण और कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़े होने का साहस प्रदान किया और पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में दिशाभ्रमित भारतीय नौजवानों के मन-मस्तिष्क में स्वदेश-प्रेम एवं हिन्दुत्व-जीवन दर्शन के प्रति अगाध विश्वास पैदा किया। अपनी विद्वतापूर्ण एवं तर्क आधारित भाषण से दुनिया भर के बुध्दिजीवियों के बीच भारत के प्रति एक जिज्ञासा पैदा की। भारत की एक अनोखे ढंग से व्याख्या की। उन्होंने भारतीय बौध्दिक क्रांति का सूत्रपात किया। स्वामी विवेकानंद ने उद्धोष किया कि समस्त संसार हमारी मातृभूमि का ऋणी है। स्वामीजी ने अध्यात्म को अंधविश्वास एवं कालबाह्य हो चुके कर्मकांड से मुक्त कराया एवं हिन्दुत्व की युगानुकूल व्याख्या की तथा अध्यात्म को मानव के सर्वांगीण विकास का केन्द्र-बिन्दु बताया।

भारतवर्ष में ‘गुरू-शिष्य’ की अभिनव परंपरा रही है। हम सब जानते है कि छत्रपति शिवाजी, सम्राट चन्द्रगुप्त, प्रभु श्री रामचन्द्र जैसे कर्मशील एवं प्रतापी योध्दाओं के निर्माण और सफलता के पीछे समर्थ गुरू रामदास, चाणक्‍य, विश्वामित्र जैसे गुरूजनों का स्नेह और आशीर्वाद का अप्रतिम योगदान रहा है। ठीक इसी प्रकार कलकत्ता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर के संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस के स्नेहिल सान्निध्य और आशीर्वाद से स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति एवं हिन्दू धर्म का प्रचार करके संसार का आध्यात्मिक मार्गदर्शन किया।

स्वामी विवेकानंद के जीवन में शिकागो धर्म सम्मेलन एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस सत्रह दिन के धर्म सम्मेलन ने इस तीस वर्षीय हिन्दू संन्यासी को जगत में सुविख्यात कर दिया। 11 सितंबर, 1893 से प्रारंभ हुए इस सम्मेलन में उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। भाषण प्रारंभ करते हुए जैसे ही उनके मधुर कंठ से ‘अमरीकी निवासी बहनों और भाइयों’ संबोधन निकला, सभा भवन काफी देर तक तालियों से गूंजता रहा। वहां उपस्थित हजारों प्रतिनिधि इस आत्मीय संबोधन को सुनकर अभिभूत हो गए। सवामीजी ने आगे कहा-‘ मुझको ऐसे धमार्वलंबी होने का गौरव है, जिसने संसार को ‘सहिष्णुता’ तथा सब धर्मों को मान्यता प्रदान करने की शिक्षा दी है। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलंबियों को आश्रय दिया।…….सांप्रदायिकता, संकीर्णता और इनसे उत्पन्न भयंकर धार्मिक उन्माद हमारी इस पृथ्वी पर काफी समय तक राज कर चुके है। इनके घोर अत्याचार से पृथ्वी थक गई है। इस उन्माद ने अनेक बार मानव रक्त से पृथ्वी को सींचा है, सभ्यताएं नष्ट कर डाली है तथा समस्त जातियों को हताश कर डाला है। यदि यह सब न होता तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता, पर अब उनका भी समय आ गया है और मेरा दृढ़ विश्वास है कि जो घंटे आज इस सभा के सम्मान के लिए बजाए गए, वे समस्त कट्टरताओं, तलवार या लेखनी के बल पर किए जाने वाले समस्त अत्याचारों तथा मानवों की पारस्परिक कटुताओं के लिए मृत्युनाद सिध्द होंगे।’

स्वामीजी के लिए राष्ट्र सर्वोपरि था। वे स्वदेश-प्रेम को सबसे बड़ा धर्म मानते थे। इसलिए भारत की स्वाधीनता के लिए निरंतर युवा-वर्ग को अपने बौध्दिक आख्यायनों से जगाते रहे। उनकी रचनाओं को पढ़कर नवयुवकों में स्वाधीनता प्राप्त करने की तीव्र प्रेरणा जागृत हुई। क्रांतिकारियों के बीच वे सर्वमान्य आदर्श रहे। उनके जीवन कर्म से प्रभावित होकर अनेक क्रांतिकारी, अंग्रेजों के अत्याचार से क्रुध्द हो उनकी हत्या कर देते तथा हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लेते। स्वामीजी ने कहा-‘आगामी पचास वर्षों के लिए हमारा केवल एक ही विचार-केन्द्र होगा और वह है हमारी महान मातृभूमि भारत। दूसरे सब व्यर्थ के देवताओं को कुछ समय तक के लिए हमारे मन से लुप्त हो जाने दो। हमारी जाति-स्वरूप केवल यही एक देवता है जो जाग रहा है। जिसके हर जगह हाथ है, हर जगह पैर है, हर जगह कान है, जो सब वस्तुओं में व्याप्त है। दूसरे सब देवता सो रहे है। हम क्यों इन व्यर्थ के देवताओं के पीछे दौड़े और उस देवता की, उस विराट की, पूजा क्यों न करे जिसे हम अपने चारों ओर देख रहे है। जब हम उसकी पूजा कर लेंगे तभी हम सभी देवताओं की पूजा करने योग्य बनेंगे।

आज समाज-जीवन में जो विकृतियां पनप रही है, उसके बारे में उन्होंने काफी पहले सावधान कर दिया था। आज यह सहज ही देखने को मिल रहा है कि विश्वविद्यालयों, कैम्पसों में ड्रग-ड्रिंक-डिस्को की कचरा संस्कृति में सराबोर आज का युवक स्व-विस्मृति के कगार पर है। उन्होंने पाश्चात्य जीवन शैली के अंधानुकरण को खतरनाक बताया। उन्होंने कहा था, ‘ऐ भारत! यही तेरे लिए एक भयानक खतरे की बात है-तुम्हें पाश्चात्य जातियों की नकल करने की इच्छा ऐसी प्रबल होती जा रही है कि भले-बुरे का निश्चय अब विचार-बुध्दि, शास्त्र या हिताहित ज्ञान से नहीं किया जाता। गोरे लोग जिस भाव और आचार की प्रशंसा करे या जिसे न चाहे, वही अच्छा है और वे जिसकी निंदा करे तथा जिसे न चाहे, वही बुरा! खेद है, इससे बढ़कर मूर्खता का परिचय भला और क्या होगा? यह कथन आज भी प्रासंगिक लगता है।

स्वामी विवेकानंद राष्ट्रीय स्तर की गतिविधियों पर अपना ध्यान तो रखते ही थे साथ ही साथ वैश्विक स्तर पर भी होने वाले सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का अध्ययन और विचार करते थे। उन दिनों समाजवाद के विचार बड़ी तेजी से फैल रहे थे। उनका मानना था कि ‘भारत को समाजवाद-विषयक अथवा राजनीतिक विचारों से प्लावित करने से पहले यह आवश्यक है कि उसमें आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ ला दी जाए। सर्वप्रथम हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य निहित है, उन्हें इन सब ग्रंथों के पृष्ठों के बाहर लाकर, मठोें की चहारदीवारियां भेदकर, वनों की नीरवता से दूर लाकर, कुछ संप्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें-उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सब जगह फैल जाए- हिमालय से कन्याकुमारी और सिंधु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र वे धधक उठें।’

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषणों व रचनाओं से जन-जन में प्रबल इच्छाशक्ति व स्वाभिमान तो जगाया ही, लेकिन उन्हें अपने लक्ष्य को पाने में एक सुदृढ़ संगठन की आवश्यकता हुई। वे ‘संघे शक्ति कलौयुगे’ के सूत्र की महत्ता को भलीभांति जानते थे। वे चाहते थे कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के कार्य में आम जन भी हाथ बंटाये। 1 मई, 1897 के दिन उन्होंने स्वामी रामकृष्ण देव के कुछ शिष्यों के सम्मुख एक योजना रखी। उन्होंने कहा कि ‘विश्व के कई देशों का भ्रमण करके मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि हमें पवित्र धर्म एवं गुरूदेव के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक सुदृढ़ संगठन बनाना ही होगा।’ आज सर्वविदित है कि देश के कोने-कोने में ‘रामकृष्ण मिशन’ द्वारा संचालित सैकड़ों अस्पताल, विद्यालय व सेवाकार्य राष्ट्र के नवोन्मेष व परम वैभव प्राप्त करने की दृष्टि से अपनी प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।

स्वामीजी ने मात्र 39 वर्ष की आयु में ही अपना भौतिक देह त्याग दिया और इतनी कम उम्र में ही अनथक प्रवास करते हुए एक बेहतर भारत व विश्व के निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय रहे। अपने जीवन का क्षण-क्षण मातृभूमि की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने सशक्त और समृध्दिशाली भारत का जो सपना देखा, उसे आज भी अनेक राष्ट्रवादी संस्थाएं पूरा करने में जुटी हुई हैं। ऐसे वक्तृत्व व कर्तृत्व के धनी एवं तेजस्विता के प्रतीक स्वामी विवेकानंद जन-जन के आदर्श पुरूष है। उनका संपूर्ण जीवन-कर्म व विचार हम सबके लिए पाथेय है।

-संजीव कुमार सिन्‍हा

Leave a Reply

8 Comments on "भारतीय नवजागरण के अग्रदूत : स्वामी विवेकानंद"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'
Guest

अति उर्जावान लेख के लिए धन्यवाद

shishir chandra
Guest
vivek ji aap ne swami viveka nand par koi tippani nahi ki hai? bas beman se unko manna pad raha hai? aapki lekhan ke liye shaayad ye sahi jagah nahi hai. ye swami vivekanand ko smaran karne aur unke bataye raste ko amal karne ka jagah hai. swami vivekanand par her bharatwasi ko garv hai. chahe wah kisi bhi dharm aur jaati ka anuyayi hai. sanjeev ji aapkyon tippaniyon ka jawab nahi dete. ye to aapka hi lekh hai na. aapka bhasha me ek shuchita jhalakti hai. jo aajkal sansanikhej banane ke chakkar me kam hone lagi hai. pathakon aur… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
Guest
स्वामी विवेकानंद जी के पवित्र, प्रेरक स्मरण के लिए साधुवाद ! सशक्त, प्रभावी लेखन. देश की ज़रूरत हैं स्वामी विवेकानंद. * एक पाठक विवेक जी से निवेदन है की ज़रा थोड़ा सा विवेकानंद जी को पढ़ लेते तोअनर्गल न लिखते. ज़रा पढ़ कर देखें कि आपने एक स्वर से ईश्वर, मंदिर,पूजा सबको नकारने का अवसर बना डाला इस पवित्र स्मरण को. स्वामे विवेकानंद के नाम पर नास्तिक वाद को बढ़ावा तो बड़ा अटपटा है. वे तो काली के परम भक्त थे और उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण भी. इतना तो आपको पता है न ? नास्तिक होने पर भारत में कोई… Read more »
munna rajak
Guest

बहुत बढ़िया लेख लिख लिखा है !

vivek
Guest
सौ साल पहले इतने उन्नत विचारधारा वाले स्वामी विवेकानंद जी को प्रणाम करने का दिल करता है ! लेकिन दुःख इस बात का है की भारत में लोग अभी भी बे बुनियादी धार्मिक विचारधारा को और पाखंड ता को बढ़ावा देते नजर आयेंगे ! यहांके मंदिर दरगाह ,मठ में , कोई पाखंडी बाबा के आश्रम में लाखो -करोडो रुपये लुटाये जाते है , कुछ दक्षिण राज्योंमे बालाजी मंदिर जैसे अनगिनत मंदिर है वहां चढ़ावे में जमा हुए रुपये गिननेके लिए १०-१२ लोग है ! सोने -चांदी की भी बरसात होती रहती है ! इतने मंदिर -मस्जिद दरगाह ,मठ है फिर… Read more »
wpDiscuz