लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

(१)

बचपन में सोचा,

हुन्नर चुनुं, कोई, आसान।

पैसा ही पैसा हो, शोहरत भी हो।

शहादत भी न करनी पडे।

चित्र-तारिकाएं, भी चाहती रहे ।

तो—-मुझे ”चित्रकार” पसंद आया,

—-

वह भी ”मॉडर्न” हो,

तो, एम. एफ़. एच. सेन को, आदर्श मान,

चित्र बनाया।

बडों को दिखाया।

देर तक देख, पूछा ; किसका चित्र है?

(लगा, सफल हो गया।)

—चार पैर ? पूंछ ?

बोले जानवर लगता है !

मैंने कहा ; हां ! घोडा है।

—-

-”यह तो, गधा दिखाई देता है।”

तो ! मैंने—चित्र के नीचे, -’घोडा’ लिख दिया।

गधे को, घोडा- कह, दिया,

सोचा, काम चल जाएगा,

(२)

वैसे, घोडे को गधा, और, गधे को घोडा,

कह देने से, घोडा गधा,

और गधा घोडा, न बन पाएगा।

पर आदमी ज़रूर उलझ जाएगा।’

आज कल यही तो होता है।

आदमी को उलझाया जाता है।

(३)

कर को ’कर’ कहा जाता है,

कि करोंसे काम ”करा” जाता है।

चरण को ”चरण” भी कहते हैं।

कि चरणोंसे ”विचरण” किया करते हैं।

वैसे ही भाई!

मन को भी ”मन” इसी लिए कहते हैं

कि मनसे ”मनन” किया जाता है।

श्रवणों से वचन ”श्रवण” होता हैं।

–अब-

तेरे, मनसे थोडा ”मनन” करने कहूं,

तो नाराज़ मत हो।

चुनाव में खडा हूं,- नहीं,– मत मांगू !

कहो!

कि घोडे को, ”गधा”,

और गधे को ”घोडा” कहने से,

गधे-घोडे का भेद क्या, मिट जाएगा ?

पास को फैल, और फैल को पास कहने से,

क्या ”फैल” भी ”विद्वान” हो जाएगा?

और ”पास” भी ”बुद्धु” कहलाएगा?

कुछ नहीं होगा !

खां-मो-खां आदमी उलझ जाएगा।

शब्द तो वेदों से निकल आए हैं।

अपना अर्थ ढोते चले आए हैं।

भेद गर मिटाना है, तो मनसे मिटा।

तो?

मनुज संस्कारित हो जाएगा।

सारा ”समाजवाद” ”साम्यवाद” अरे !

समस्त वाद और वेदांत समझ जाएगा।

और -विवाद ही मिट जाएगा।

(४)

भाषा बिगाड कर तो, — शब्द-संकर हो जाएगा।

भाषा को उलझाकर,–क्या काम सुलझ जाएगा?

आदमी को उलझाकर,—क्या क्रांति आ जाएगी?

तू भी उलझ जाएगा,

हम भी उलझ जाएंगे।

सदियों सदियों की तपस्या पूरखों की

खाक में मिल जाएगी।

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5 Comments on "क्या ”फैल” भी ”विद्वान” हो जाएगा?"

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लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
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आपको नव बरस की बधाई आपकी कविता अच्छा लगा आप को हार्दिक बधाई
लक्ष्मी नारायण लहरे पत्रकार छत्तीसगढ़

Dharam Baaria
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आपकी कविता पसंद आई , आपको बधाई !

डॉ. मधुसूदन
Guest

दिवस जी, और अभिषेक जी आपकी सराहना के लिए धन्यवाद। कवि को प्रेरित, कविता पढने वाले पाठक ही करते हैं। कविता का आनंद दो प्रकारका होता है।
एक, कवि को कविता का आनंद तो तभी ही प्राप्त हो गया होता है, जब कविता के शब्द चेतना में अवतरित होने तैय्यार बैठे होते हैं।
दूसरा, उसका मानधन उसे प्राप्त तब होता है, जब रसिक पाठक उस कविता से, आनंद पाते हैं, और व्यक्त करते हैं, रसग्रहण करते हैं।
आपका कविता को पढना ही मेरा मानधन है। अनुगृहित पाता हूं।

दिवस दिनेश गौड़
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आदरणीय मधुसुदन जी अति संदर कविता|
इस सुन्दर कविता के लिए बधाई व धन्यवाद|

अभिषेक पुरोहित
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सुन्दर सुन्दर सुन्दर भाई -उत्तम उत्तम उत्तम भाई

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