लेखक परिचय

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर जैन ने भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक, रोमानिया के बुकारेस्त विश्वविद्यालय के हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर तथा जबलपुर के विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विभाग के लैक्चरर, रीडर, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष तथा कला संकाय के डीन के पदों पर सन् 1964 से 2001 तक कार्य किया तथा हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार-विकास के क्षेत्रों में भारत एवं विश्व स्तर पर कार्य किया।

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-प्रोफेसर महावीर सरन जैन-
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मैं दस पंद्रह दिन पहले अमेरिका से भारत लौटा तो मेरे अनेक मित्रों ने मुझे टेलिफोन करके यह सूचना दी कि महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा ने ´वर्धा हिन्दी शब्दकोश’ का प्रकाशन किया है। मैंने कहा कि यह तो अच्छी सूचना है। मगर उनका कहना था कि यह कोश हिन्दी की प्रकृति और गरिमा के विरुद्ध है। यह कोश हिन्दी को ‘हिंग्लिश´ बनाने की कुटिल योजना है। आप इसके विरुद्ध लिखिए। मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि उन्होंने उस कोश के खिलाफ लिखा है तथा उसमें यह भी लिखा है कि वर्धा के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय ने यह काम किसी रामप्रकाश सक्सेना से कराया है और उसकी सहायक सम्पादक कोई शोभा पालिवाल है। उन्होंने किसी भाषावैज्ञानिक को यह काम नहीं सौंपा। जब मैंने उन्हें सूचित किया कि मैं राम प्रकाश सक्सेना को जानता हूँ। वे नागपुर की यूनिवर्सिटी में भाषाविज्ञान विभाग में अध्यापक थे तथा भाषाविज्ञान का ज्ञान रखते हैं। उनका कहना था कि उसके सम्पादक मंडल में जो पाँच नाम हैं उनमें कोई भी देश का प्रसिद्ध भाषाविद् नहीं है। इसके बाद उन्होंने तीर चलाया कि मैंने अपने लेख में लिखा है कि विभूतिनारायण राय को देश के प्रसिद्ध भाषाविद् प्रोफेसर महावीर सरन जैन तथा प्रसिद्ध कोशकार बदरीनाथ कपूर एवं विमलेश कांति वर्मा को बुलाना चाहिए था। मैंने मित्र से निवेदन किया कि मैंने उक्त कोश देखा नहीं है। बिना देखे टिप्पण नहीं किया जा सकता। कोश को लेकर चर्चाएँ गरम हैं। सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि उसमें अंग्रेजी के विपुल शब्दों का घालमेल किया गया है। मैं उक्त कोश के बारे में कोई टिप्पण नहीं कर सकता। इसका कारण यह है कि मैंने उक्त कोश देखा तक नहीं है, पढ़ना तो दूर की बात है। भले ही मैं कोश के सम्बंध में कोई टिप्पण नहीं कर सकता मगर मैं विद्वानों से यह जरूर पूछना चाहता हूँ कि ब हम अपने रोजाना के व्यवहार में अंग्रेजी के जिन शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं उनको कोश में क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए।

अंग्रेजी के जिन शब्दों को हिन्दी के अखबारों एवं टीवी चैनलों ने अपना लिया है तथा प्रचलन में आ गए हैं, उनको कोश में क्यों नहीं शामिल किया जाए। क्या केवल इस कारण कि उन शब्दों को भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने नहीं अपनाया है और भारत सरकार का आदेश है कि राजभाषा हिन्दी में आयोग की शब्दावली का तथा निदेशालय की मानक हिन्दी वर्तनी के नियमों का पालन किया जाए। यह नियम सरकार के राजभाषा अधिकारियों पर थोपा जा सकता है। मेरा मानना है कि यह भी गलत है। मैं भारत सरकार के राजभाषा विभाग के तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के भाषा एकक के अधिकारियों तथा उक्त कोश में अंग्रेजी के विपुल शब्दों को शामिल करने के कारण उसकी आलोचना एवं भर्तस्ना करनेवाले विद्वानों से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि वे पहले राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जो जबाब भारत के नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों में दिया उसको सुनलें एवं पढ़ लें। मैंने भाषण सुना तथा प्रयुक्त अंग्रेजी के शब्दों को अपनी शक्ति-सीमा के दायरे में लिखता गया। बहुत से शब्द छूट भी गए। मैं उस भाषण में बोले गए अंग्रेजी के जिन शब्दों को लिख पाया, वे शब्द निम्नलिखित हैं – (1) स्कैम इंडिया (2) स्किल इंडिया (3) एंटरप्रेन्योरशिप (4) स्किल डेवलपमेंट (5) एजेंडा (6) रोडमैप (7) रेप (8) एफ आई आर (9) रेंज (10) कॉमन (11) ब्रेक (12) इंडस्ट्रीज़ (13) फोकस (14) मार्केटिंग (15) प्रोडक्ट । हिन्दी को लोक की भाषा बनाएँ। जो शब्द चल गए हैं, उनको अपनालें। यदि लोक प्रचलित शब्द नहीं अपनाएँगे तो भाषा शब्दकोश की चीज़ बनकर रह जाएगी। चलेगी नहीं।

स्वाधीनता के बाद हमारे राजनेताओं ने हिन्दी की घोर उपेक्षा की। पहले यह तर्क दिया गया कि हिन्दी में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली का अभाव है। इसके लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग बना दिया गया। काम सौंप दिया गया कि शब्द बनाओ। आयोग ने तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दों के निर्माण के लिए जिन विशेषज्ञों को काम सौंपा उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े। शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं। आयोग ने जिन शब्दों का निर्माण किया उनमें से अधिकांशतः अप्रचलित, जटिल एवं क्लिष्ट हैं। सारा दोष आयोग एवं विशेषज्ञों का भी नहीं है। मैं उनसे ज्यादा दोष मंत्रालय के अधिकारियों का मानता हूँ। प्रशासनिक शब्दावली बनाने के लिए अलिखित आदेश दिए गए कि प्रत्येक शब्द की स्वीकार्यता के लिए मंत्रालय के अधिकारियों की मंजूरी ली जाए। अधिकारियों की कोशिश रही कि जिन शब्दों का निर्माण हो, वे बाजारू न हो। सरकारी भाषा बाजारू भाषा से अलग दिखनी चाहिए। मैं अपनी बात को एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहता हूँ । प्रत्येक मंत्रालय में सेक्रेटरी तथा एडिशनल सेक्रेटरी के बाद मंत्रालय के प्रत्येक विभाग में ऊपर से नीचे के क्रम में अंडर सेक्रेटरी होता है। इसके लिए निचला सचिव शब्द बनाकर मंत्रालय के अधिकारियों के पास अनुमोदन के लिए भेजा गया। अर्थ संगति की दृष्टि से शब्द संगत था। मंत्रालयों के अधिकारियों को आयोग द्वारा निर्मित शब्द पसंद नहीं आया। आदेश दिए गए कि नया शब्द बनाया जाए। आयोग के चेयरमेन ने विशेषज्ञों से अनेक वैकल्पिक शब्द बनाने का अनुरोध किया। अंडर सेक्रेटरी के लिए नए शब्द गढ़ने में विशेषज्ञों ने व्यायाम किया। जो अनेक शब्द बनाकर मंत्रालय के पास भेजे गए उनमें से मंत्रालय के अधिकारियों को “अवर” पसंद आया और वह स्वीकृत हो गया। अंडर सेक्रेटरी के लिए हिन्दी पर्याय अवर सचिव चलने लगा। मंत्रालयों में सैकड़ों अंडर सेक्रेटरी काम करते हैं और सब अवर सचिव सुनकर गर्व का अनुभव करते हैं। शायद ही किसी अंडर सेक्रेटरी को अवर के मूल अर्थ का पता हो। स्वयंबर में अनेक वर विवाह में अपनी किस्मत आजमाने आते थे। जिस वर को वधू माला पहना देती थी वह चुन लिया जाता था। जो वर वधू के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाते थे उन्हें अवर कहते थे। चूँकि शब्द गढ़ते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि वे सामान्य आदमी को समझ में आ सकें, इस कारण आयोग के द्वारा निर्मित कराए गए लगभग 80 प्रतिशत शब्द प्रचलित नहीं हो पाए। वे कोशों की शोभा बनकर रह गए हैं।

भारत सरकार के मंत्रालय के राजभाषा अधिकारी का काम होता है कि वह अंग्रेजी के मैटर का आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली में अनुवाद करदे। अधिकांश अनुवादक शब्द की जगह शब्द रखते जाते हैं। हिन्दी भाषा की प्रकृति को ध्यान में रखकर वाक्य नहीं बनाते। इस कारण जब राजभाषा हिन्दी में अनुवादित सामग्री पढ़ने को मिलती है तो उसे समझने के लिए कसरत करनी पड़ती है। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि लोकतंत्र में राजभाषा आम आदमी के लिए बोधगम्य होनी चाहिए। एक बात जोड़ना चाहता हूँ। कोई शब्द जब तक चलन में नहीं आएगा, प्रचलित नहीं होगा तो वह चलेगा नहीं। लोक में जो शब्द प्रचलित हो गए हैं उनके स्थान पर नए शब्द गढ़ना बेवकूफी है। रेलवे स्टेशन का एक कुली कहता है कि ट्रेन अमुक प्लेटफॉर्म पर खड़ी है। सिग्नल डाउन हो गया है। ट्रेन अमुक प्लेटफॉर्म पर आ रही है।बाजार में उसी सिक्के का मूल्य होता है जो बाजार में चलता है। हमें वही शब्द सरल एवं बोधगम्य लगता है जो हमारी जबान पर चढ़ जाता है। “भाखा बहता नीर”। लोक व्यवहार से भाषा बदलती रहती है। यह भाषा की प्रकृति है।.राजभाषा हिन्दी में अधिकारी अंग्रेजी की सामग्री का अनुवाद अधिक करता है। मूल टिप्पण हिन्दी में नहीं लिखा जाता। मूल टिप्पण अंग्रेजी में लिखा जाता है। अनुवादक जो अनुवाद करता है, वह अंग्रेजी की वाक्य रचना के अनुरूप अधिक होता है। हिन्दी भाषा की रचना-प्रकृति अथवा संरचना के अनुरूप कम होता है। मैं उदाहरण देता हूँ ताकि अपनी बात स्पष्ट कर सकूँ।हम कोई पत्र मंत्रालय को भेजते हैं तो उसकी पावती की भाषा की रचना निम्न होती है –

´पत्र दिनांक – – – , क्रमांक – – – प्राप्त हुआ’।
सवाल यह है कि क्या प्राप्त हुआ। क्रमांक प्राप्त हुआ अथवा दिनांक प्राप्त हुआ अथवा पत्र प्राप्त हुआ। अंग्रेजी की वाक्य रचना में क्रिया पहले आती है। हिन्दी की वाक्य रचना में क्रिया बाद में आती है। इस कारण जो वाक्य रचना अंग्रेजी के लिए ठीक है उसके अनुरूप रचना हिन्दी के लिए सहज, सरल एवं स्वाभाविक नहीं है। क्रिया (प्राप्त होना अथवा मिलना) का सम्बंध दिनांक से अथवा क्रमांक से नहीं है। पत्र से है। हिन्दी की रचना प्रकृति के हिसाब से वाक्य रचना निम्न प्रकार से होनी चाहिए।
´आपका दिनांक – – – का लिखा पत्र प्राप्त हुआ। उसका क्रमांक है – – – – ‘ ।
हिन्दी की वाक्य रचना भी दो प्रकार की होती है। एक रचना सरल होती है। दूसरी रचना जटिल एवं क्लिष्ट होती है। सरल वाक्य रचना में वाक्य छोटे होते हैं। संयुक्त एवं मिश्र वाक्य बड़े होते हैं। सरल वाक्य रचना वाली भाषा सरल, सहज एवं बोधगम्य होती है। संयुक्त एवं मिश्र वाक्यों की रचना वाले वाक्य होते हैं तो भाषा जटिल हो जाती है, कठिन लगने लगती है, जटिल हो जाती है और इस कारण अबोधगम्य हो जाती है।

मुझे विश्वास है कि यदि प्रशासनिक भाषा को सरल बनाने की दिशा में पहल हुई तो राजभाषा हिन्दी और जनभाषा हिन्दी का अन्तर कम होगा। सरल, सहज, पठनीय, बोधगम्य भाषा-शैली का विकास होगा। ऐसी राजभाषा लोक में प्रिय होगी। लोकप्रचलित होगी। यहाँ इसको रेखांकित करना अप्रसांगिक न होगा कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिन्दीतर भाषी राष्ट्रीय नेताओं ने जहाँ देश की अखंडता एवं एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार की अनिवार्यता की पैरोकारी की वहीं भारत के सभी राष्ट्रीय नेताओं ने एकमतेन सरल एवं सामान्य जनता द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी का प्रयोग करने एवं हिन्दी उर्दू की एकता पर बल दिया था। इसी प्रसंग में एक बात और जोड़ना चाहता हूँ। प्रजातंत्र में शुद्ध हिन्दी, क्लिष्ट हिन्दी, संस्कृत गर्भित हिन्दी जबरन नहीं चलाई जानी चाहिए। जनतंत्र में ऐसा करना सम्भव नहीं है। ऐसा फासिस्ट शासन में ही सम्भव है। हमें सामान्य आदमी जिन शब्दों का प्रयोग करता है उनको अपना लेना चाहिए। यदि वे शब्द अंग्रेजी से हमारी भाषाओं में आ गए हैं, हमारी भाषाओं के अंग बन गए हैं तो उन्हें भी अपना लेना चाहिए। मैं हिन्दी के विद्वानों को बता दूँ कि प्रेमचन्द जैसे महान रचनाकार ने भी प्रसंगानुरूप किसी भी शब्द का प्रयोग करने से परहेज़ नहीं किया। उनकी रचनाओं में अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। अपील, अस्पताल, ऑफिसर, इंस्पैक्टर, एक्टर, एजेंट, एडवोकेट, कलर, कमिश्नर, कम्पनी, कॉलिज, कांस्टेबिल, कैम्प, कौंसिल, गजट, गवर्नर, गैलन, गैस, चेयरमेन, चैक, जेल, जेलर, टिकट, डाक्टर, डायरी, डिप्टी, डिपो, डेस्क, ड्राइवर, थियेटर, नोट, पार्क, पिस्तौल, पुलिस, फंड, फिल्म, फैक्टरी, बस, बिस्कुट, बूट, बैंक, बैंच, बैरंग, बोतल, बोर्ड, ब्लाउज, मास्टर, मिनिट, मिल, मेम, मैनेजर, मोटर, रेल, लेडी, सरकस, सिगरेट, सिनेमा, सिमेंट, सुपरिन्टेंडैंट, स्टेशन आदि हजारों शब्द इसके उदाहरण हैं। प्रेमचन्द जैसे हिन्दी के महान साहित्यकार ने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में अंग्रेजी के इन शब्दों का प्रयोग करने में कोई झिझक नहीं दिखाई है। शब्दावली आयोग की तरह इनके लिए विशेषज्ञों को बुलाकर यह नहीं कहा कि पहले इन अंग्रेजी के शब्दों के लिए शब्द गढ़ दो ताकि मैं अपना साहित्य सर्जित कर सकूँ। उनके लेखन में अंग्रेजी के ये शब्द ऊधारी के नहीं हैं; जनजीवन में प्रयुक्त शब्द भंडार के आधारभूत, अनिवार्य, अवैकल्पिक एवं अपरिहार्य अंग हैं। फिल्मों, रेडियो, टेलिविजन, दैनिक समाचार पत्रों में जिस हिन्दी का प्रयोग हो रहा है वह जनप्रचलित भाषा है। जनसंचार की भाषा है। समय समय पर बदलती भी रही है। पुरानी फिल्मों में प्रयुक्त होनेवाले चुटीले संवादों तथा फिल्मी गानों की पंक्तियाँ जैसे पुरानी पीढ़ी के लोगों की जबान पर चढ़कर बोलती थीं वैसे ही आज की युवा पीढ़ी की जुबान पर आज की फिल्मों में प्रयुक्त संवादों तथा गानों की पंक्तियाँ बोलती हैं। फिल्मों की स्क्रिप्ट के लेखक जनप्रचलित भाषा को परदे पर लाते हैं। उनके इसी प्रयास का परिणाम है कि फिल्मों को देखकर समाज के सबसे निचले स्तर का आम आदमी भी फिल्म का रस ले पाता है। मेरा सवाल यह है कि यदि साहित्यकार, फिल्म के संवादों तथा गीतों का लेखक, समाचार पत्रों के रिपोर्टर जनप्रचलित हिन्दी का प्रयोग कर सकता है तो भारत सरकार का शासन प्रशासन की राजभाषा हिन्दी को जनप्रचलित क्यों नहीं बना सकता। विचारणीय है कि हिंदी फिल्मों की भाषा ने गाँवों और कस्बों की सड़कों एवं बाजारों में आम आदमी के द्वारा रोजमर्रा की जिंदगी में बोली जाने वाली बोलचाल की भाषा को एक नई पहचान दी है।

फिल्मों के कारण हिन्दी का जितना प्रचार-प्रसार हुआ है उतना किसी अन्य एक कारण से नहीं हुआ। आम आदमी जिन शब्दों का व्यवहार करता है उनको हिन्दी फिल्मों के संवादों एवं गीतों के लेखकों ने बड़ी खूबसूरती से सहेजा है। भाषा की क्षमता एवं सामर्थ्य शुद्धता से नहीं, निखालिस होने से नहीं, ठेठ होने से नहीं, अपितु विचारों एवं भावों को व्यक्त करने की ताकत से आती है। राजभाषा के संदर्भ में यह संवैधानिक आदेश है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे। भारत सरकार का शासन राजभाषा का तदनुरूप विकास कर सका है अथवा नहीं यह सोचने विचारने की बात है। इस दृष्टि से भी मैं फिल्मों में कार्यरत सभी रचनाकारों एवं कलाकारों का अभिनंदन करता हूँ।हिन्दी सिनेमा ने भारत की सामासिक संस्कृति के माध्यम की निर्मिति में अप्रतिम योगदान दिया है। बंगला, पंजाबी, मराठी, गुजराती, तमिल आदि भाषाओं एवं हिन्दी की विविध उपभाषाओं एवं बोलियों के अंचलों तथा विभिन्न पेशों की बस्तियों के परिवेश को सिनेमा की हिन्दी ने मूर्तमान एवं रूपायित किया है। भाषा तो हिन्दी ही है मगर उसके तेवर में, शब्दों के उच्चारण के लहजे़ में, अनुतान में तथा एकाधिक शब्द-प्रयोग में परिवेश का तड़का मौजूद है। भाषिक प्रयोग की यह विशिष्टता निंदनीय नहीं अपितु प्रशंसनीय है। मुझे प्रसन्नता है कि देर आए दुरुस्त आए, राजभाषा विभाग ने प्रशासनिक हिन्दी को सरल बनाने की दिशा में कदम उठाने शुरु कर दिए हैं। जैसे प्रेमचन्द ने जनप्रचलित अंग्रेजी के शब्दों को अपनाने से परहेज नहीं किया वैसे ही प्रशासनिक हिन्दी में भी प्रशासन से सम्बंधित ऐसे शब्दों को अपना लेना चाहिए जो जन-प्रचलित हैं। उदाहरण के लिए एडवोकेट, ओवरसियर, एजेंसी, ऍलाट, चैक, अपील, स्टेशन, प्लेटफार्म, एसेम्बली, ऑडिट, केबिनेट, केम्पस, कैरिटर, केस, कैश, बस, सेंसर, बोर्ड, सर्टिफिकेट, चालान, चेम्बर, चार्जशीट, चार्ट, चार्टर, सर्किल, इंस्पेक्टर, सर्किट हाउस, सिविल, क्लेम, क्लास, क्लर्क, क्लिनिक, क्लॉक रूम, मेम्बर, पार्टनर, कॉपी, कॉपीराइट, इन्कम, इन्कम टैक्स, इंक्रीमेंट, स्टोर आदि। भारत सरकार के राजभाषा विभाग को यह सुझाव भी देना चाहता हूँ कि जिन संस्थाओं में सम्पूर्ण प्रशासनिक कार्य हिन्दी में शतकों अथवा दशकों से होता आया है, वहाँ की फाइलों में लिखी गई हिन्दी भाषा के आधार पर प्रशासनिक हिन्दी को सरल बनाएँ। जब कोई रोजाना फाइलों में सहज रूप से लिखता है, तब उसकी भाषा का रूप अधिक सरल और सहज होता है बनिस्पत जब कोई सजग होकर भाषा को बनाता है। सरल भाषा बनाने से नहीं बनती, सहज प्रयोग करते रहने से बन जाती है, ढल जाती है। ‘भाखा बहता नीर’।

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38 Comments on "वर्धा हिन्दी शब्दकोश के बहाने से हिन्दी के विकास के संबंध में कुछ विचार"

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अनुनाद सिंह
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अनुनाद सिंह
आदरणीय जैन साहब, बिना कोश को देखे उस पर इतना बड़ा लेख दिया इसे कोई ‘विद्वान’ ही कर सकता है। ‘अंग्रेजी जो जो शब्द प्रचन में आ गये हैं’ कहकर आप बडे ही छिछले तरीके से निष्कर्ष निकाल ले रहे हैं कि उन्हें हिन्दी शब्दकोश में होना चाहिये। मेरे घर काम करने वाली ‘रविवार’ नहीं ‘संडे’ कहती है, फल बेचने वाला ‘आम’ नहीं ‘मंगो’ कहता है, टैक्सी का चालक अपने को ‘चालक’ नहीं ‘ड्राइवर’ कहता है और ‘हवाई अड्डा’ नहीं ‘एयरपोर्ट’ कहता है- इसलिये सण्डे, मैंगो, ड्राइवर, एयरपोर्ट आदि हिन्दी शब्द हो गये? क्या आप नहीं जानते कि ये लोग… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

भाषा का अध्ययन यदि ऐतिहासिक दृष्टि से किया जाता है तो यह विचार किया जाता है कि शब्द किस भाषा से आगत हुआ है। किंतु संकालिक अथवा एककालिक अध्ययन में किसी भाषा के शिक्षित प्रयोक्ता जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, वे समस्त शब्द उस भाषा की शब्द सम्पदा में समाहित होते हैं। आप सम्मति देने के पहले भाषाविज्ञान के सामान्य सिद्धांतों को जानने की कृपा करें। प्रत्येक व्यक्ति भाषाविज्ञान का जानकार नहीं होता। मगर भाषा से सम्बंधित विषय पर टिप्पण लिखते समय उसे विषय की जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

इंसान
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मैं हिंदी भाषा विशेषज्ञ नहीं हूँ अतः प्रस्तुत वर्धा हिंदी शब्दकोश विवाद में सम्मिलित होने योग्य न होते हुए भी मात्र उपभोक्ता की दृष्टि से अपने विचार निवेदित करूँगा| वर्तमान राजनीतिक स्थिति व हिंदी भाषा में शब्दों के विकास, विस्तार व प्रचार के संदर्भ में वर्धा हिंदी शब्दकोश अपने में एक अच्छा प्रयास हो सकता था लेकिन विषय वस्तु में इसे मैं डॉ: हरदेव बाहरी (१९०७-२०००) के हिंदी शब्दकोश से भिन्न नहीं समझता हूँ| डॉ: बाहरी ने संभवतः समकालीन परिस्थिति और अंग्रेजी भाषा के प्रभाव के कारण शिक्षित द्विभाषी भारतीय के लिए शब्दकोश की रचना की थी| उनके हिंदी शब्दकोश… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

मैंने अपने लेख में स्पष्ट किया है कि लेखक ने वर्धा कोश देखा नहीं है। मैंने अमेरिका प्रवास से लौटने के बाद अपने कुछ मित्रों से जो चर्चाएँ सुनी, उनके आलोक में हिन्दी भाषा के विकास से संबंधित अपने विचार व्यक्त किए थे। वर्धा के कोश के बारे में, मैं कोई टिप्पण नहीं कर सकता।

इंसान
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आपने वर्धा हिंदी शब्दकोश देखा नहीं है लेकिन वर्धा हिन्दी शब्दकोश के बहाने आप विद्वानों से यह अवश्य पूछना चाहते हैं कि “हम अपने रोजाना के व्यवहार में अंग्रेजी के जिन शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं उनको कोश में क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए?” राजनैतिक संदर्भ में आज हिंदी की दुर्दशा देख भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नेतृत्व भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक रह चुके व्यक्ति से ऐसी ही अपेक्षा की जा सकती है| यदि अमरीका में आपसे भेंट हो जाती तो आपके विचार जानने से पहले मैं आपसे आपकी व्यावसायिक संबद्धता पूछता लेकिन एक ही… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN
स्वतंत्र भारत का समाज धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों का क्यों प्रयोग करता है। आपने यह सवाल किया है। स्वतंत्र भारत के समाज से यह पूछने की ताकत मेरे में नहीं है। आप भारत के नव निर्वाचित प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल कीजिए कि संघ की पाठशाला में दीक्षित होने के बावजूद उन्होंने संसद सें दिए गए प्रसिद्ध भाषण में धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग क्यों किया। आपमें सामर्थ्य है तो मोदी जी को आदेश दें अथवा नागपुर से आदेश दिलवाएँ कि वे अपने वक्तव्यों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना बंद करदें। वे तो भारत… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

अगर आप यह सोचते हैं कि भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी मेरे कार्यकाल में रचाए गए भाषाई चक्रव्यूह से पीड़ित है तो आपमें यदि सामर्थ्य है तो आप उनकी पीड़ा का हरण कीजिए। शुभकामनाएँ।

इंसान
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मैं यह क्या देखा रहा हूँ? मेरी टिप्पणी पर एक कांग्रेसी वक्तव्य दाग “देश के प्रसिद्ध भाषाविद् प्रोफेसर महावीर सरन जैन” अपने नैतिक उत्तरदायित्व से नहीं बच सकते| तथाकथित स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात से ही शासन के सभी वर्गों में मध्यमता और अयोग्यता के बीच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नेतृत्व भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक से सचमुच ऐसी ही आशा थी| नव निर्वाचित प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी आयु में आप से छोटे हैं और संभवतः स्वयं आपके कार्यकाल में रचाए भाषाई चक्रव्यूह से पीड़ित हैं| मेरे प्रश्न का उत्तर आप ही को देना होगा|

Anupam Dixit
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बचपन में हमारे पड़ोसी रहे एक परिवार के यहाँ मैं दुबारा गया तब मैं 17 वर्ष का हो चुका था। आंटी ने देखते ही बोला अरे ये लोग तो बड़े टाल टाल हो गए हैं। बहुत देर तक “टाल” का मतलब समझता रहा फिर उन्हीं ने कहा “पहले तो तुम लोग बड़े शार्ट थे अब तो खूब टाल हो गए हो” तब समझ आया की वे Tall कह रहीं हैं। अभी तक तो मैं उनकी भाषायी समझ पर तरस खाता था लेकिन आपका प्रेरक लेख पढ़ा तो आँखें खुल गईं ….. आज से टाल, शार्ट जैसे सभी प्रचलित शब्द हिन्दी… Read more »
इंसान
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बहुत सुन्दर| आप की टिप्पणी ने विषय की नीरसता को भंग करते क्षण भर के लिए अधेड़ उम्र में मेरी आँखों में मुस्कान भर दी है| विस्मयाभिभूत, अब सोचता हूँ कि नदी पर बाँध द्वारा उसके प्राकृतिक प्रवाह को नियंत्रित करते किस क्षेत्र को सींचा जा रहा है?

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

आपकी सकारात्मक टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद।

इंसान
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अनुपम दीक्षित की टिप्पणी पर उनकी सराहना करते प्रतिक्रिया में मेरी टिप्पणी के दो वाक्यों में पहला अनुपम दीक्षित व दूसरा प्रश्नवाचक वाक्य आपके लिए है| आप बहुत सरलता से पूछे हुए प्रश्नों को टाल जाते हैं| भाषाई चक्रव्यूह के कारण पीड़ा के हरण करने का काम मुझ पर सौंप आप मीठी नींद कैसे सो सकते हैं? आपके कार्यकाल में रचाए गए भाषाई चक्रव्यूह से पीड़ित किसी की पीड़ा का हरण कर पाने का मेरे में सामर्थ्य न भी हो, प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी अब इस स्थिति में हैं कि भाषाई चक्रव्यूह को भेद राष्ट्र हित में कोई स्थाई समाधान… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN
जिसको आप भाषाई चक्रव्यूह मानते हैं, वैसा मैं नहीं मानता। लगता है आप किसी विशेष विचारधारा के चक्रव्यूह से आक्रांत हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से विचार कीजिए। आपको उत्तर मिल जाएगा। सन् 1958 से लेकर सन् 1961 के दौरान हमारी मुलाकात संघ के रज्जू भैया से होती थी। उनका विचार था कि हमारे देश की मूल गंगा को आक्रांताओं की संस्कृतियों ने गंदा कर दिया है। हमें गंगा को निर्मल बनाना है। हमारी सोच अलग थी। हम उनसे कहते थे कि आगत धाराएँ हमारी गंगा की मूल स्रोत भागीरथी में आकर मिलने वाली अलकनंदा,धौली गंगा,अलकन्दा, पिंडर और मंदाकिनी धाराओं… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

जैसे नदी की धारा बहती रहती है वैसे ही भाषा भी परिवर्तित होती रहती है। कबीरदास ने इसी कारण कहा था – भाखा बहता नीर।

डॉ. मधुसूदन
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आ. जैन साहब-नमस्कार।
कबीर दास का निम्न उद्धरण भी सुना ही होगा।
“भाषा तो सन्तन ने कहिया ,
संसकिर्त्त रिषिन की बानी है जी।
ज्यों काली-पीली धेनु दुहिया,
एक हीं छीर सों जानी है जी ॥”
– कबीरदास

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN
प्रिय मधु सूदन जी आपने कबीर का दोहा उद्धृत किया है। कबीर ने अपनी रचनाओं में कहीं भी भाषा शब्द का प्रयोग नहीं किया है। कबीरदास ने सर्वत्र भाखा का प्रयोग किया है। उद्धृत दोहे का अर्थ है – संस्कृत तो वैदिक ऋषियों की वाणी है। संत तो भाखा बोलते हैं। जिस प्रकार अटल जी की राजधर्म का पालन न करने की प्रसिद्ध वाणी में से नकारात्मक प्रत्यय को हटाकर यू ट्यूब पर नकली सी. डी. डाल दी गई और आपने मुझसे उस नकली सीडी को देखने की वकालत की थी, कृपया करके वही हाल कबीर के साथ करने का… Read more »
K P TIWARI
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समाज और लोग न तो व्‍याकरण पढ़कर भाषा का प्रयोग करते हैं और शब्‍द प्रयोग के लिए भी शब्‍दकोश नहीं देखते हैं, समाज के लोग शब्‍दों पर अर्थ आरोपित करते हैं। भाषाविदों की भी जरूरत नहीं पढ़ती। गांव के लोग अंग्रेजी का नेटवर्क नहीं बोल पाते तो उन्‍होंने उसे अपनी सुविधा के मुताबिक नेटाउर, नटौर, और कहीं कहीं तो नटवर भी बना डाला है। इसी प्रकार सिमकार्ड उन्‍हें लम्‍बाा और बोझिल लगा तो इसे सिम्मिया, सिमा, सिमवा आदि बना डाला है। मैमोरी कार्ड भी ऐसा ही लगा तो इसे चिपा या चिप्पिया कह डाला। ई-टॉपअप का इटाप बनाकर अपने प्रीपेड… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. MAHAVIR SARAN JAIN
आपके विचारों से सहमत हूँ।भाषा का अन्तिम निर्णायक उसका प्रयोक्ता होता है। दूसरे काल की भाषा के आधार पर उस काल का वैयाकरण संकालिक भाषा के व्याकरण के पुनः नए नियम बनाता है। व्याकरण के नियमों में भाषा को बाँधने की कोशिश करता है। भाषा गतिमान है। पुनः पुनः नया रूप धारण करती रहती है। भाषा वह है जो भाषा के प्रयोक्ताओं द्वारा बोली जाती है। सन् 2014 में हमारी और आपकी संतति जो हिन्दी बोल रही है उस भाषा को हिन्दी के समाचार पत्र, हिन्दी के विविध टी. वी. चैनल तथा हिन्दी की फिल्मों के संवाद लेखक अपना रहे… Read more »
Pradyumna Shah Singh
Guest

Adarniya Jain Sahib, Maine apke hindi visayak vichar padhe. Anya vidvano ke bhi vichar jo apke vichar par adharit hain padhe. Main apane ko aap se sahamat is liye pata hun ki veda men bhi kaha gaya hai “let the noble thoughts come from all sides” Hamara kaam tab accha chalega jab ham aadaan bhi karen aur pradaan bhi karane ki sthiti men hon.Bhasa ko bojhil na bana kar sampresan ke gunon se yukta rakha jaaya tabhi usame svaad aayega.

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
Guest
Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

यह पढ़कर सुखद प्रतीति हुई कि आप मेरे विचारों से सहमत है। भाषा का प्रमुख गुण एवं धर्म उसकी संप्रेषण शक्ति है। इसी को लक्ष्य करके मैंने लेख में यह प्रतिपादित किया कि ‘भाषा की क्षमता एवं सामर्थ्य शुद्धता से नहीं, निखालिस होने से नहीं, ठेठ होने से नहीं, अपितु विचारों एवं भावों को व्यक्त करने की ताकत से आती है’.

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