लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

Posted On by &filed under धर्म-अध्यात्म.


-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच का जब से फैसला आया है। रामभक्त अब लखनऊ बैंच के भक्त हो गए हैं। मैं उन्हें लखनऊभक्त के रूप में ही चिह्नित करूँगा। वे लखनऊ बैंच के जजमेंट को यूनीवर्सल बनाने में लगे हैं। आस्था के सिद्धांत को कानून का सिद्धांत बनाना चाहते हैं। यह लखनवी न्याय है। इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने की सोच रहे हैं। वे लखनऊ बैंच के जजमेंट को न्याय का आदर्श आधार बता रहे हैं।

लखनवी न्याय में अनेक संभावित खतरे छिपे हैं। पहला खतरा तो यही है कि इसमें न्याय बुद्धि से काम नहीं लिया गया। यह भारत के अब तक के न्याय पैमाने को अमान्य करके लिखा गया फैसला है। दूसरी बात यह है कि इस फैसले को अंतिम फैसला नहीं मान सकते। तीसरी बात यह कि इसमें विविधता के सिद्धांत की उपेक्षा हुई है। चौथी बात यह है कि इस फैसले का आधार रामकथा और उससे जुड़ी मान्यताएं हैं।

उपरोक्त चारों बातों की रोशनी में लखनऊ बैंच का जजमेंट न्याय नहीं है, राय है। उस पर पक्ष-विपक्ष में जो कुछ बोला जा रहा है वह भी न्याय नहीं है राय है। यह अतीत को आधार बनाकर, धार्मिक मान्यताओं को आधार बनाकर दी गई राय है। इसने न्याय की बहस को कानून के बाहर कर दिया है।

अब लोग न्याय पर नहीं राय पर बातें कर रहे हैं। राय के आधार पर मंदिर-मसजिद का तर्क रचा जा रहा है। बाबरी मसजिद के गिराए जाने के बाद से न्याय की बातें नहीं हो रही हैं आस्था की बातें हो रही हैं। बाबरी मसजिद के अस्तित्व के बारे में रथयात्रा के पहले न्याय और विविधता पर केन्द्रित होकर ज्यादा बातें होती थीं लेकिन बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद विविधता और न्याय की बजाय आस्था और राय पर बातें होने लगीं। लखनऊ बैंच के जजों का फैसला इसी अर्थ में न्याय नहीं राय है।

लखनवी राय को राम के जन्म के साथ कम राम के राज्य या एंपायर के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। जिन जजों ने रामजन्मस्थान के रूप में बाबरी मसजिद की विवादित जमीन को रामजन्म स्थान चिह्नित किया है। उन्होंने राजा दशरथ, उनके पुत्र राम, अयोध्या राजधानी और राम के शासन को ध्यान में रखकर फैसला लिखा है। न्याय बुद्धि में राम के एंपायर का आना स्वयं में ही समस्यामूलक है। न्यायबुद्धि किसी राजा के देश के आधार पर जब फैसलादेने लगे तो कम से कम उसे न्याय नहीं कहते राय कहते हैं।

राम के एंपायर को आधार बनाते समय न्यायाधीशों ने अपने लिए धार्मिक मुक्ति का मार्ग चुन लिया। वे अपना फैसला राम के एंपायर को, उनके भक्त समुदाय को सुनाकर चले गए। वे इस बात को भूल गए कि न्याय को एंपायर का आधार नहीं बनाया जा सकता। रामभक्त जब बाबर के युग की बातें करते हैं राममंदिर के पक्ष में तर्क गढ़ते हैं तो वे भूल ही जाते हैं कि बाबर के बहाने न्याय को नहीं एंपायर को आधार बना रहे हैं। एंपायर के आधार पर न्याय नहीं किया जा सकता। फैसले का आधार तो न्याय और विविधता ही हो सकती है।

जज यह जानते थे कि बाबरी मसजिद का फैसला एक राजनीतिक फैसला है और राजनीतिक फैसले एंपायर के आधार पर नहीं न्याय और विविधता के आधार पर ही किए जाने चाहिए। एंपायर के आधार पर फैसला करने के कारण ही लखनवी न्याय में आधुनिककाल, आधुनिकबोध, भारत का संविधान और न्याय सब एकसिरे से गायब है। इस फैसले में राय की एकता और भाषा की एकता भी है। इस अर्थ में जजों ने भाषिक वैविध्य को भी अस्वीकार किया है।

इस जजमेंट के बाद जिस तरह की राय राजनीतिक सर्किल से आई है उसे राजनीतिक राय ही कह सकते हैं न्यायकेन्द्रित राय नहीं कह सकते। यहां तरह-तरह की राजनीतिक राय व्यक्त की गई है। कांग्रेस से लेकर कम्युनिस्टों तक, आरएसएस से लेकर मुलायम सिंह तक सबने राजनीतिक राय व्यक्त की है। न्याय को आधार बनाकर राय नहीं दी है। इसमें राजनीतिक विचारों की चर्चा खूब हो रही है।

लखनवी राय के पक्ष-विपक्ष में जो कुछ भी बोला जा रहा है वह राजनीतिक विचारों की अभिव्यक्ति है। लखनऊ बैंच का फैसला जजमेंट नहीं राजनीतिक राय है। न्याय में कनवर्जेंस नहीं होता। विविधता होती है। लखनऊ बैंच ने डायवर्जेंस को अस्वीकार किया है। वहां तीन जजों की राय में कनवर्जंस हुआ है।

जो लोग अल्पसंख्यकों की बात कर रहे हैं। मुसलमानों की बात कर रहे हैं वे भी मुसलमानों को सामाजिक इकाई के रूप में नहीं देख रहे हैं बल्कि भाषिक इकाई के रूप में देख रहे हैं। अल्पसंख्यक या मुसलमान को सामाजिक इकाई मानने की बजाय भाषिक इकाई मानना स्वयं में इस समुदाय का अवमूल्यन है। भारत की सामाजिक विविधता को अस्वीकार करना है।

सब जानते हैं भारत में एक नहीं अनेक अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन वे सिर्फ अब हमारे भाषिकगेम का हिस्सा मात्र हैं। हिन्दू संगठनों के द्वारा रथयात्रा के साथ अल्पसंख्यकों को भाषिकगेम में तब्दील करने की जो प्रक्रिया आरंभ हुई थी उसने अल्पसंख्यकों की सामाजिक इकाई के रूप में पहचान ही खत्म कर दी,लखनवी न्याय उस प्रक्रिया की चरम अभिव्यक्ति है। इस फैसले ने अल्पसंख्यकों पर हिन्दुओं के प्रभुत्व की मुहर लगा दी है।

हमारे देश की समग्र राजनीति ने अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का वर्गीकरण कुछ इस तरह किया है कि उससे कोई भी अल्पसंख्यक समूह कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन सकता है। अब अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े होने के लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है उसका राजनीतिक दलों से लेकर न्यायाधीशों तक में जबर्दस्त अभाव दिखाई देता है। अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आधार पर वर्गीकृत राजनीति ने न्याय की नजर से अल्पसंख्यकों को देखने का नजरिया ही छीन लिया है। हमें साठ साल के बाद सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद पता चला कि मुसलमानों को 60 सालों में हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने किस रौरव नरक में ठेल दिया है। लखनऊ बैंच का फैसला उसी बृहत्तर प्रक्रिया हिस्सा मात्र है। अब हमारे देश में अल्पसंख्यक हैं लेकिन वे भाषिकगेम में हैं, सामाजिक समूह के रूप में उन्हें विमर्श और न्यायपूर्ण जीवन से बेदखल कर दिया गया है।

अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक केटेगरी में बांटकर देखने के कारण ही धीरे-धीरे अल्पसंख्यक हाशिए पर गए हैं और आज स्थिति इतनी बदतर है कि अल्पसंख्यकों के पक्ष में खुलकर बोलने वाले को बेहद जोखिम उठाना पड़ता है। खासकर जब न्याय देने का सवाल आता है तो अल्पसंख्यकों को भारत में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। अल्पसंख्यकों को अपने समुदाय के अंदर और बाहर दोनों तरफ से खतरा है। मजेदार बात यह है कि लखनऊ बैंच में तीन जज थे, दो की एक राय और एक जज की अलग राय थी लेकिन तीनों की भाषा एक ही है। भाषिकगेम में उनकी अंतर्वस्तु में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। तीनों जज बाबरी मसजिद के बारे में राम कथा की विवरणात्मक -कथात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। न्याय में इस तरह के भाषिकखेल के अपने अलग नियम हैं। उत्तर आधुनिक विचारक जे.एफ.ल्योतार के अनुसार इस तरह के भाषाखेल और कथानक के बारे में न्याय के आधार पर विचार नहीं किया जा सकता।

राम हमारे कथानक का हिस्सा हैं, कथानक में राम इतने ताकतवर हैं कि उनकी सत्ता को अस्वीकार करना मुश्किल है। लखनऊ बैंच के जजों ने रामकथानक को जजमेंट का आधार बनाकर न्याय की ही विदाई कर दी। कथानक के आधार पर न्याय नहीं हो सकता। कथानक भाषिक खेल का हिस्सा होता है न्याय का नहीं। जब आप कथानक के खेल में फंसे हैं तो उसे तोड़ नहीं सकते। न्याय पाने के लिए कथानक के खेल के बाहर आना जरूरी है लेकिन तीनों जज और उनके लिए जुटे वकीलों का समूचा झुंड रामकथानक को त्यागकर बाबरी मसजिद की बातें नहीं कर रहा है।

संघ परिवार की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने बाबरी मसजिद विवाद को न्याय के पैराडाइम के बाहर कथानक के पैराडाइम में ठेल दिया है। अब राम कथानक के पैराडाइम में घुसकर आप संघ परिवार को पछाड़ नहीं सकते। राम कथानक के पैराडाइम के कारण ही बाबरी मसजिद का विवाद भाषिकगेम में फंस गया। कोई भी दल रामकथा को अस्वीकार नहीं कर सकता। रामकथा का भाषिकगेम सभी रंगत की राजनीति को हजम करता रहा है। यह टिपिकल पोस्ट मॉडर्न भाषिकगेम है। इस भाषिकगेम के बाहर निकलकर ही न्याय की तलाश की जा सकती है। लेकिन यदि रामकथानक के आधार पर बातें होंगी तो भाषिकगेम में फसेंगे और ऐसी अवस्था में जज कोई भी हो जीत अंततः संघ परिवार की होगी।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषिकगेम हमेशा मिलावटी होता है। उसमें शुद्धता नहीं होती। रामजन्म के भाषिकखेल में भी मिलावट है। यह बहुस्तरीय मिलावट है। इस गेम में तैयार राम कहानी में न्याय के लिए भी सुझाव हैं और वे ही सुझाव लखनऊ बैंच ने माने हैं। राम कहानी का भाषिकगेम जिन्होंने तैयार किया उन्होंने अपने विरोधियों को भी अपनी बातें मानने के लिए मजबूर किया ।

कथा का भाषिकखेल छलियाखेल है। वे इसके जरिए कांग्रेस को छल चुके हैं,राजीव गांधी को छल चुके हैं। अब उसी भाषिकगेम ने जजों को भी छला है। रामकथा के भाषिकगेम को संघ परिवार और भारत के पूंजीपतिवर्ग ने वैधता प्रदान की है और संघ परिवार ने रामगेम में जो कहा उस पर अपनी सिद्धाततः सहमति दी है व्यवहार में निर्णय लिया है। रामकथानक के भाषिकखेल की यह विशिष्ट उपलब्धि है।

न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और जनता से कहा जा रहा है कि राममंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो क्या पाकिस्तान में बनेगा। न्यायपालिका की जिम्मेदारी बनती है कि वह रामकथा की पवित्रता की रक्षा करे। यही वह दबाब है जिसके गर्भ से लखनवी न्याय आया है।

लखनवी न्याय के आने के साथ ही रामकथा पर न्याय की भी मुहर लग गयी है। अब राम कथा भी कानूनी हो गयी है। अब राम जन्म को कानूनी मान्यता मिल गयी है। इस कानूनी मान्यता के बड़े दूरगामी परिणाम होंगे। यह न्याय की भाषा के बदलने की सूचना भी है।

रामकथानक की आंतरिक प्रकृति है ‘रिपीट मी’, संघ परिवार ने बड़े ही कौशल के साथ रामकथा को अपना विचारधारात्मक अस्त्र बनाया है और रामकथा को बार-बार दोहराने के लिए सबको मजबूर किया और उसका प्रभाव जजमेंट में भी पड़ा है अब भविष्य में अन्य जजों पर यह दबाब रहेगा कि ‘रिपीट मी’।

आप राम कहानी को पढ़ने जाते हैं तो उसे दोहराने को मजबूर होते हैं। अब रामकथा और आस्था के आधार पर न्याय आया है तो यह भी दोहराने की मांग करेगा और अब हम भविष्य में एक नए किस्म के न्याय से मुखातिब होंगे जिसका आधार रामकथा या ऐसी ही कोई पौराणिक या मिथकीय कथा होगी जिसके आधार पर न्याय का पाखंड रचा जाएगा। इस तरह की बेबकूफियां अनेक इस्लामिक देशों में होती रही हैं। धार्मिक कथानकों और मान्यताओं के आधार पर वहां पर न्याय होता रहा है और इससे न्याय घायल हुआ है। संभवतः हम राम मंदिर बनाने के बहाने फंडामेंटलिज्म के मार्ग पर चल पड़े हैं।

Leave a Reply

26 Comments on "‘हम राम मंदिर बनाने के बहाने फंडामेंटलिज्म के मार्ग पर चल पड़े हैं’"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
सुरेश व्यास
Guest
प्रणाम। यहा मे पहलि बार लिखता हु। जो व्यक्ति वेदिक है – हिन्दु है – वो कभि fundamentalist नहि हो सकता। इस मुद्दे पर श्री वामदेव शास्त्री ने अंगरेजि मे एक लेख लिखा है वो यहा है : http://skanda987.wordpress.com/2011/06/25/hindu-fundamentalism-what-is-it/ हम वेदिक लोग – हमारी सभ्यता या वेदिच् धर्म – जो धर्म या विचारधारएं सहिष्णु है वे दब से सहुष्णु है। जो धर्म असहिष्णु है – जो वेदिक धर्म को सदन्तर मिटा देना चाहता है उन धर्मो को सहन करने का वेदिक धर्म नहि सिखाता है। याद रहे कि जब अर्जुनने कहा कि वो नहि लडना चाहता है तो भगवान कृष्ण… Read more »
vikas singhal
Guest
“अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक केटेगरी में बांटकर देखने के कारण ही धीरे-धीरे अल्पसंख्यक हाशिए पर गए हैं और आज स्थिति इतनी बदतर है कि अल्पसंख्यकों के पक्ष में खुलकर बोलने वाले को बेहद जोखिम उठाना पड़ता है।” —– झूठ, बल्कि सच्चाई तो यह है की हिन्दुओ की बात करने वालों को इस देश मैं अच्छुत समझा जाता है. और मुसलमानों की खुल कर बात करने वालों को सराखों पर बैठाया जाता है. “कोई भी दल रामकथा को अस्वीकार नहीं कर सकता” ——– वामपंथी दल खुले आम अस्वीकार करते है. “लखनवी न्याय के आने के साथ ही रामकथा पर न्याय की भी… Read more »
Tilak
Guest
4 प्रश्न 4 उत्तर! पहला. इसमें न्याय बुद्धि से काम नहीं लिया गया, इसे अंतिम फैसला नहीं मान सकते, विविधता के सिद्धांत की उपेक्षा, फैसले का आधार रामकथा और उससे जुड़ी मान्यताएं हैं,… प्रश्न ही अविवेकी हैं। जगदीश्वर जी, क्या अपने वह निर्णय पड़ा है? ASI, पुरावेताओं के प्रस्तुत प्रपत्र जिनमें ढांचे के नीचे से निकले मंदिर अवशेष के प्रमाण दिए गए, उन्हें देखा होता तो ऐसा शायद न कहते। शायद शब्द इसलिए कहा कि जब कोई शर्मनिरपेक्ष हो जाये तो किसी सीमा तक गिर सकता है। बस मानवाधिकारवादी , शर्मनिरपेक्ष, बुद्धिभोगियों की तो भारतीय संस्कृति का विरोध करने की… Read more »
mukesh
Guest

शुक्रिया तिलक जी…. अपने सही कहा हमें तो चतुर्वेदी जी बाबर के संबंधी लगते हैं…………..

आर. सिंह
Guest
chaturvediji, is pahalu par aap belagaam itnaa kuchh likh rahe hain ki aap ke aalekhon par tippani karnaa ham jaison ke liye jaraa muskil pad rahaa hai aur jab uska jawaab nahi de pate to kisi ko bhi ap andh bhakt karaar dekar bach nikalate hain,atah is baar main koi tippani ke pahle apni sthiti saaf kar denaa chaahataa hoon. Main ishwar ke kisi roop mein viswaas nahi kartaa.Ve hinduon ke ishwar hon ya unke vibhin awataar.Allah hon ya God. Par Ram ko ek Rajputra aur baad mein ek Raja ke roop mein main maanyataa detaa hoon aur uskaa kaaran… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
Guest
पंकज जी का निर्णय दूरदर्शितापूर्ण और सुनिश्चित परिणामकारी मुझे लगता है. निसंदेह बेचारे वामपंथी बुरी तरह बौखला ही नहीं गए , पगला गए हैं. बुझता दीपक अधिक तेज़ी से जलता है. इनको भी शायद अपने अवसान का आभास हो गया है जिसके कारण अंतिम छट -पटाहट प्रकट हो रही है. – हमारे विद्वान लेखक-विश्लेषक पंकज जी का निर्णय अनुकरणीय है. इन पगला गए वामपंथियों के लेखों पर टिप्पणी न करके इनकी उपेक्षा के जाये और प्रवक्ता.काम को भी सन्देश मिले कि इस प्रकार के निम्न कोटी के पूर्वाग्रही लेखन को जो वे इतना अधिक प्रकाशन का अवसर दे रहे हैं,… Read more »
wpDiscuz