लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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बीनू भटनागर

अजीब सा शीर्षक है,अजीब सा प्रश्न है कि हिन्दी किसकी है। पूरे भारत की,सभी हिन्दी भाषियों की या फिर हिन्दी के गिने चुने विद्वानों की। इसी प्रश्न का उत्तर सोचते सोचते मै अपने विचार लिखने का प्रयास कर रही हूँ। स्वतन्त्रता प्राप्त हुए 64 वर्ष हो चुके हैं,परन्तु हिन्दी को वह सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिये था। यह स्थिति उन राज्यों की है जिनका जनाधार हिन्दी भाषी है। अहिन्दी भाषी राज्यों मे हिन्दी की क्या स्थिति है इस पर विचार करना भी अभी कोई मायने नहीं रखता, जब तक हिन्दी भाषी राज्यों मे हिन्दी की जड़ें मज़बूत नहीं होंगी उसकी शाखाये अहिन्दी भाषी राज्यों मे कैसे फैलेंगी और फलें फूलेंगी। सिर्फ आंकड़े गिनाने से कि कितने राज्यों मे किस कक्षा तक हिन्दी पढाई जा रही है या कितने विश्वविद्यालयो मे हिन्दी विभाग हैं या विश्व मे हिन्दी बोलने वालों की संख्या कितनी है सोचने से कोई लाभ नहीं, जब तक कि भाषा का स्तर न सुधरे और उसका सम्मान न हो। यहाँ मै केवल भाषा की बात कर रही हूँ साहित्य की नहीं।

हिन्दी भारत की राजभाषा है, जो अत्यन्त समृद्ध है। संसकृत ,पाली और प्राकृत से विकसित होकर अनेक विदेशी भाषाओं के शब्दों को समेटती हुई अपने आधुनिक रूप मे पंहुंची है।

पिछले कुछ दशकों मे देश का माहौल कुछ ऐसा बना कि सबको लगने लगा कि अंग्रेज़ी मे शिक्षा प्राप्त किये बिना कोई अच्छी नौकरी नहीं पा सकता। हम अंग्रेज़ी की ओर झुकते चले गये। अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों की संख्या दिनों दिन बड़ती गई और हिन्दी माध्यम से शिक्षा देने वाले विद्यालयों की शिक्षा का स्तर गिरता चला गया।

हिन्दी मे अंग्रज़ी की इतनी मिलावट हो गई कि हम समय को टाइम कहने लगे, इस्तेमाल या उपयोग के स्थान पर यूज़ ज़बान पर बैठ गया। यदि विदेषी शब्द भाषा को समृद्ध बनायें तो उन्हें ग्रहण करने मे कोई हर्ज नहीं है।

अंग्रज़ी मे भी बाज़ार, गुरू और जंगल जैसे शब्द समा गये हैं। आजकल जो भाषा बोली जा रही है विशेषकर महानगरों मे उसमे हिन्दी और अंग्रेज़ी का इतना सम्मिश्रण हो रहा है जो भाषा को उठा नहीं रहा। हम जो भाषा बोल रहे हैं,वो न हिन्दी का मान बड़ा रही है न अंग्रेज़ी का। ना ही हिन्दी और अंग्रज़ी के सम्मिश्रण से किसी नई साफ़ सुथरी भाषा के जन्म के आसार नज़र आ रहे हैं ,जिसे कुछ लोग हिंगलिश कहने लगे हैं वह सिर्फ़ खिचड़ी है,वह भी अधपकी।

जैसा कि मैने कहा अंग्रजी के शब्द हिन्दी मे लेने मे कोई हर्ज नहीं है। “इंटरनैट” को “अंतरजाल” न कहें पर “खिलौनो” को तो हिन्दी मे “खिलौना” ही रहने दें “टौय” क्यों कहें। वाक्य के आगे पीछे “यू नो”, “आई नो” का तड़का लगाकर हिन्दी को विकृत तो न करें। यह हमारी हीन मानसिकता का परिचायक है कि हम एक वाक्य भी बिना अंग्रेज़ी के शब्द पिरोये नहीं बोल सकते। हिन्दी के सरलीकरण की बात जब उठती है तो उसका अर्थ होता है कि उसमे और अंग्रेज़ी मिलाओ। रेडियो, टैलिविजन और पत्रिकायें भी इसी तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। किसी महिला पत्रिका के लेख का शीर्षक होगा “ब्यूटी टिप्स”, हिन्दी फ़िल्म का नाम होगा “वन्स अपौन ए टाइम इन मंबुई”। अंग्रेज़ी की प्रतिष्ठित पत्रिका “इन्डिया टुडे” ने जब अपना हिन्दी संसकरण निकाला तो अंग्रेजी पत्रिका की लोकप्रियता को भुनाने के लोभ मे उन्हें यह आवश्यक नहीं लगा कि हिन्दी पत्रिका का नाम तो हिन्दी मे ही होना चाहिये। उन्होंने उसका नाम “इन्डिया टुडे” ही रहने दिया।

अंग्रेज़ी क्या किसी भी भाषा से मेरा कोई दुराग्रह नहीं है। हिन्दी को बढावा देने के लये अक्सर कहा जाता है कि उच्च शिक्षा का माध्मम हिन्दी होना चाहिये। इसके लियें चीन, जापान और रूस सहित कई देशों के नाम लिये जाते हैं, परन्तु छात्रों को यदि उच्च माध्यमिक स्तर तक हिन्दी पढने लिखने का व्यावाहरिक ज्ञान नहीं होगा तो उन्हें उच्च शिक्षा हिन्दी माध्यम मे कैसे दी जा सकती है।

इसके लियें तो प्राथमिक ,माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों मे हिन्दी स्तर और पाठयक्रम को व्यावाहरिक बनाना पड़ेगा। यहाँ मै एक रोचक उदाहरण देना चाहूँगी, एक बार मैने अपनी कुछ रचनायें लिफ़ाफ़े मे रखकर पता भी हिन्दी मे लिख दिया और अपने पति से कहा कि उसे कोरियर करवा दें। वे कहने लगे कि कम से कम मुझे पता तो इंगलिश मे लिखना चाहये था, जो पत्र सही जगह पर पंहुच जाय, कोरियर वाले ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं होते। इसका अर्थ तो यही हुआ कि एक कम पढ़ा लिखा शहरी व्यक्ति इंगलिश तो पढ़ लेगा पर हो सकता है उसे हिन्दी पढने मे दिक्कत हो। ये स्थिति किसी अहिन्दी भाषी राज्य की नहीं है राजधानी दिल्ली की है। संभव है कि बहुत छोटे शहरों मे ऐसी स्थिति न हो,परन्तु उत्तर भारत के अन्य बड़े शहरों मे भी कुछ ऐसा ही हाल है। दुख होता है, पर सत्य को स्वीकार तो करना ही पड़ेगा, तभी तो कुछ प्रयास किया जा सकेगा हिन्दी को सम्मान दिलाने की दिशा मे। छात्र हिन्दी को बोझ समझने लगे हैं। यह तो होना ही था,जब आकार और प्रकार मे पाठ्यक्रम उनकी आयु और रुचि के अनुकूल नहीं है। हमने अन्य विषयों के साथ हिन्दी का भी इतना वृहद पाठ्यक्रम बच्चों पर लाद दिया है कि उनमे उसके प्रति अरुचि पैदा हो गई है। इसमे उनका कोई दोष नहीं है। जो भाषा वो सुनते बोलते हैं, उसमे और पाठ्यक्रम की पुस्तकों मे प्रयुक्त भाषा मे ज़मीन आसमान का अन्तर है, मै मानती हूँ कि बोलचाल की भाषा लिखित भाषा से थोड़ी अलग होती है पर यहाँ इस अंतर की खाई बहुत बडी़ है। इस अंतर को कम करना होगा ।

आरंभिक वर्षों मे बच्चो को अंग्रज़ी से पहले हिन्दी सिखानी चाहिये। तीसरी या चौथी कक्षा से पहले अंग्रेज़ी सिखा ना उचित नहीं होगा। इस आयु तक बच्चे का मस्तिष्क दो भाषाऔं को एक साथ ग्रहण करने मे सक्षम नहीं होता माता पिता को बच्चों से सरल हिन्दी बोलनी चहये। कठिन शब्दों का प्रयोग न करें पर कुत्ते को कुत्ता ही रहने दे डौगी क्यों कहें, गुड़िया को भी डौल कहने की ज़रूरत नहीं है। जब अंग्रेज़ी सीखेंगे तो इन शब्दों को भी सीख लेंगे, शुरू से ही हिन्दी मे अंग्रजी की मिलावट करना क्यों सिखाया जाय। हिन्दी को मातृ भाषा की तरह और अंग्रेज़ी को विदेशी भाषा की तरह सिखाने पर जो़र होना चाहिये। यदि इसका उल्टा होता है, जो कि हो ही रहा है तो हमारे बच्चे दोनो ही भाषाऔं से न्याय नहीं कर पायेंगे।

मातृभाषा सीखने के लियें व्याकरण या भाषाविज्ञान सीखना ज़रूरी नहीं है। यदि बच्चों ने माता पिता से स्वच्छ भाषा सुनी होगी तो वे आयु के अनुसार सरल विषयों को पढने, लिखने और समझने लगेंगे। उनके पाठ्यक्रम मे आरंभिक वर्षों मे सचित्र पुस्तकें होनी चाहियें जिनमे भालू बन्दर की कहनियाँ हों जो उन्होंने अपनी नानी और दादी से सुनी थीं। धीरे धीरे भाषा का स्तर बढ़े तो शिक्षक उन्हें नये शब्दों के अर्थ बतायें। हिन्दी के उच्चस्तरीय साहित्यकारों की गूढ विषयों पर लिखी गई रचनाओं को बच्चे आठवीं-दसवीं कक्षा तक भी पचा नहीं पायेंगे। वास्तविक स्थिति यह है कि हमने उन पर ढेर सारे विलोम शब्द, पर्यायवाची शब्द, मुहावरे और लोकोत्तियाँ रटने का बोझ भी डाल दिया है,जिससे विषय के प्रति अरुचि पैदा होती है और कुछ नहीं। जब पाठ मे नये शब्द आयेंगे और शिक्षक उनको उनका अर्थ बतायेंगे तो स्वतः उनका शब्दकोष बढेगा। यदि उन्होंने अपनी नानी दादी की मुहावरेदार भाषा सुनी होगी और आयु के अनुसार कहानियाँ पढेगे तो मुहावरे भी अपने आप समझ मे आने लगेंगे, परन्तु यही नहीं दसवीं कक्षा तक आते आते तो उन पर वाक्य संश्लेषण और वाक्य विश्लेषण के साथ भाषा विज्ञान का बोझ भी डाल दिया गया है। अब परीक्षा उत्तीर्ण करनी है, तो जैसे तैसे बाजारू कुँजियों से रट रटा कर ली जाती है,पर अधिकतर बच्चे दसवीं के बाद हिन्दी से तौबा कर लेते हैं वह उसका सम्मान करना भी भूल जाते हैं। अपनी मातृभाषा को हीन समझने लगते हैं। इससे दुर्भाग्य पूर्ण किसी स्वतन्त्र राष्ट्र की भाषा के लियें और क्या हो सकता है।

बारहवीं कक्षा तक हिन्दी, हिन्दी भाषी राज्यों मे अनिवार्य होनी चाहिये। उन्हें गूढ, गहन और कठिन साहित्य पढाने की आवश्यकता नहीं है। किशोरों की रुचि के अनुसार खेलकूद से संबन्धित लेख, सरल कहानियाँ, प्रेरक प्रसंग, देश प्रेम वाली कवितायें और प्रारंभिक व्याकरण ही पाठ्यक्रम मे होनी चाहियें। निबन्ध लेखन और परिच्छेद लेखन भी आवश्यक है पर यहाँ भी ज़रूरी है कि बच्चों को अपनी भाषा लिखने के लिये प्रोत्साहित किया जाय रट कर उगलने के लियें नहीं। सब बच्चे हिन्दी साहित्य पढें यह तो ज़रूरी नहीं है। कुछ इंजीनियर कुछ डाक्टर वकील या कुछ और बनेंगे। हिन्दी मे रुचि बनी रहेगी तो कम से कम हिन्दी पढने लिखने मे वो अटकेंगे तो नहीं। हिन्दी मे अच्छी पुस्तकें और पत्रिकायें पढना चाहेंगे। इन्ही मे से भविष्य मे कोई साहित्यकार भी उभरेगा। यदि हिन्दी का व्यवाहरिक ज्ञान सबको होगा तो समय आने पर उच्च शिक्षा का माध्यम हिन्दी करने पर विचार हो सकता है।

आजकल जहाँ विभिन्न विषयों मे 90-95 प्रतिशत अंक पाकर भी विद्यार्थी अपनी पसन्द के कालिज मे पसन्द के विषय मे प्रवेष पाने के लियें संघर्ष करते रह जाते हैं, वहीं हिन्दी मे 60 – 65 अंक लेकर अच्छे कालिज मे दाख़िला मिल जाता है। ज़ाहिर है वो मजबूरी मे हिन्दी पढेंगे, रुचि से हिन्दी पढने वालो की संख्या तो बहुत कम होती है। स्नातक होना है तो हिन्दी ही सही…। डिग्री भी रटरटा कर मिल जाती है, ऐसे विद्यार्थियों का हिन्दी का ज्ञान फिर भी शून्य पर टिका रहता है। मै दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए.आनर्स हिन्दी पास किये ऐसे लोगों को जानती हूँ जिन्हें “सामंजस्य”, “समन्वय”, “विकल्प” या “दीर्घ” जैसे मामूली शब्दो के अर्थ नहीं मालूम। वे यह भी भूल चुके होंगे कि “कामायनी” या “साकेत” किस कवि ने लिखे थे। उन्होंने तो कुँजियों से रटा था, परीक्षा गई बात गई।

हिन्दी के साथ विकृतियाँ कई प्रकार से हो रहीं हैं। पढ़ा लिखा शहरी तथाकथित संभ्रान्त वर्ग अंग्रेजी की मिलावट करते नहीं थकता, दूसरी ओर एक वर्ग बिना गालिय़ों के बात नहीं कर सकता। ये शब्द गंदे हैं ,भाषा का रूप बिगाड़ रहे हैं, इनको भाषा से बाहर निकालना सभ्य समाज के लियें ज़रूरी है। कुछ फिल्मो मे इनका धड़ल्ले से प्रयोग हुआ है। निर्माता कहतें है कि उन्होने सच्चाई दिखाई है, ऐसी भाषा बोली जाती है। क्या यह गंद युवाओं को परोसना ज़रूरी था। अपने आर्थिक लाभ के लियें इस प्रकार की भाषा का सिने माध्यम से प्रचार करना अनुचित है। फ़िल्मों की नक़ल तो युवा बहुत करते है।

क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभाव स्वरूप भी कुछ अशुद्धियाँ भाषा में आ जाती है, बंगला मे कर्ता के लिंग से क्रिया प्रभावित नहीं होती है, पर हिन्दी मे होती है, इसलियें “राम आती है” और “सीता जाता है” हो जाता है। पंजाबी मे केवल “तुसी” होता है, हिन्दी मे “तू”, “तुम” और “आप” भी होता है, तीनों के साथ क्रिया का रूप बदल जाता है। “तू देदे”, “ तुम देदो” और “आप दे दीजिये” होना चाहिये, अक्सर लोग “आप देदो” या “आप लेलो” कहते है जो सही नहीं है। कारक की भी त्रुटियाँ बहुत होती हैं, “ मैने जाना है” सही नहीं है “मुझे जाना है” सही है। शब्दो के चुनाव मे भी कुछ सामान्य ग़ल्तियाँ होती है, जैसे भोजन “परोसा” जाता है “डाला” नहीं जाता, कपड़े भी “पहने” जाते हैं “डाले” नहीं जाते। इन त्रुटयों को दूर करने के लियें छात्रों पर व्याकरण का बोझ डालना उचित नहीं है, बस शिक्षक ख़ुद सही बोलें और बच्चे ग़ल्ती करें तो उसे सुधार दें। धीरे धीरे वे सही बोलना और लिखना सीख जायेंगे। अच्छी किताबें पढ़ने से भी भाषा सुधरती है। कम से कम जिन बच्चों की मातृभाषा हिन्दी है, उन्हे तो सही साफ सुथरी भाषा बोलना, पढना और समझना आना ही चाहये।

इन छोटी छोटी त्रुटियों का बोलचाल की भाषा मे ज़्यादा महत्व भले ही इतना न हो पर लिखने मे ये ग़ल्तियाँ खटकती हैं। खेद का विषय है, कि भले ही व्याकरण का विस्तृत पाठ्यक्रम विद्यालयों मे है, फिर भी ख़ुद शिक्षक ही शुद्ध भाषा नहीं बोलते। शुद्ध भाषा से मेरा तात्पर्य क्लिष्ट या कठिन भाषा से बिल्कुल नहीं है। मेरा अपना अनुभव है कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों मे भी बहुत से शिक्षकों का न तो उच्चारण सही होता है और ना ही वो व्याकरण सम्मत भाषा का प्रयोग करते हैं। शिक्षकों का चयन करते समय केवल उनकी डिग्रियाँ देख लेना ही पर्याप्त नही है, उनका उच्चारण और लेखन भी देखना आवश्यक है। शिक्षकों की भाषा अच्छी होगी तो छात्रों की भाषा अवश्य सुधरेगी।

पाठ्यक्रम के अतिरिक्त छात्रों व सभी आयुवर्ग के लियें हिन्दी मे अच्छी पत्रिकायें उपलब्ध होनी चाहियें। य़हाँ भी एक विषम चक्र है। हिन्दी मे पाठकों की निरंतर कम होती रुचि के कारण पत्रिकाओं को विज्ञापन नहीं मिलते, उनके अभाव मे किसी पत्रिका को चला पाना आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक कठिन होता है। तथापि हिन्दी मे कई पत्रिकायें हैं, कुछ साहित्यिक कहलाने के लोभ मे पुराने प्रसिद्ध लेखको और कवियों की समीक्षायें प्रकाशित करती हैं या साहित्य जगत के समाचार छापते रहती हैं। कुछ लाइफ़स्टाइल मैगज़ीन है जो फ़ैशन जगत की जानकारी देती है या बाज़ार मे उपलब्ध मंहगे मंहगे सामान की चर्चा करती हैं। ऐसी पत्रिकायें जो चिंतन के लियें प्रेरित करें बहुत कम हैं। इंटरनेट पर कुछ अच्छी पत्रिकायें हैं, परन्तु प्रिन्ट मे स्टैन्ड पर मिलने वाली पत्रिकाऔं की बहुत कमी है।

पत्रिकाओं के महत्व को हम नकार नहीं सकते। नये लेखकों की रचनायें कोई भी प्रकाशक प्रकाशित करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। यह सर्वविदित है कि जाने माने अधिकतर साहित्यकार अपने प्रारंभिक दिनों मे किसी न किसी पत्रिका से जुड़े थे। पत्रिकाओं के लियें लिखना किसी का व्यवसाय नहीं हो सकता इसलियें आरंभ के दिनों मे उन्हें ग़रीबी से जूझना पड़ा था। पत्रिकाओं से पहचान बनने के बाद ही उनकी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। हिन्दी मे साठ के दशक के बाद कोई बहुत बड़ा साहित्यकार नहीं उभरा, जिसकी चर्चा अंर्तराष्ट्रीय क्या राष्ट्रीय स्तर पर हुई हो, जिसकी रचनायें बहुत सी भाषाओं मे अनुवादित हुई हों। ऐसा भी नहीं है कि 120 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश मे कोई अच्छा लिख ही नहीं रहा होगा, पर ऐसी पत्रिकायें कहाँ हैं जो उन्हें उनकी पहचान बनाने मे मदद कर सकें। पिछले कुछ दशकों मे जो पुस्तकें छपी हैं, वह उन लोगों की हैं जो या तो किसी विश्विद्यालय मे व्यख्याता हैं, या किस उच्च पद पर हैं या किसी बड़ी संस्था से जुड़े हैं। केवल प्रतिभा पर आजकल पुस्तकें छापने वाले प्रकाशक कहाँ है। यदा कदा कोई अपवाद हो सकते है। कुछ भारतीय लेखकों जैसे “,अरुन्धति राय” ,, “झुम्पा लहरी” और “चेतन भगत” ने इंगलिश मे लिखकर विश्व मे अपनी एक पहचान बनाई है।

हिन्दी के उत्थान के लियें जो सरकारी प्रयास हुए है वह दिशाहीन हैं। तकनीकी शब्दो के कुछ अनुवाद हो जाते है, जो ज़्यादातर व्यावाहरिक नहीं होते। हर जगह दोनो भाषाओं के प्रयोग की बात होती है पर व्यवहार मे सरकारी काम काज की भाषा हिन्दी नहीं है। हिन्दी अकादमी एक पत्रिका निकाल देती है जिसमे जनमानस की रुचि तो होने से रही। हिन्दी दिवस पर कुछ भाषण हो जाते हैं, बस, बात वहीं की वहीं रह जाती है।

कुछ लोग जो हिन्दी मे रुचि रखते हैं, अपने वयक्तिगत स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों मे साहित्य सभायें कर लेते हैं। एक दूसरे की रचनाओं को सुनने और पढ़ने का अवसर मिल जाता है, उन पर टिप्पणियाँ भी होती है, विचारों का आदान प्रदान हो जाता है। इन प्रयासों से राषट्रीय स्तर पर कोई बदलाव लाना मुमकिन नहीं है।

हिन्दी के उत्थान के लियें कुछ चुनी हुई अच्छी पत्रिकाऔ को सरकार से कुछ आर्थिक संरक्षण मिलना चाहिये नही तो विज्ञापनो के अभाव मे वे दम तोड़ देंगी। उभरते हुए लेखको को भी कुछ आर्थिक सहायता मिले और प्रकाशन मे मदद मिले तो अच्छा होगा।

शिक्षा के स्वरूप और पाठ्यक्रम मे मूलभूत परिवर्तन करने होंगे हिन्दी को पूरे राष्ट्र की संपर्क भाषा और राष्ट्र भाषा के रूप मे सम्मानित करने के लियें हिन्दी भाषी लोगो को अपनी सोच बदल कर पहला क़दम बढ़ाना होगा।

अपने बच्चों को “a” से पहल “अ” सिखाना होगा “cat” , “rat”, “dog” , से पहले “चल हट पनघट पर चल” पढ़ाना होगा।

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6 Comments on "हिन्दी किसकी है"

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KARN
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Ye लेख मुझे बहुत पसंद आया , बिनु जी को साधुवाद.
हिंदी भारतियों की मौलिक प्रतिभा को अभिव्यक्ति देती है.हमरे बुध्हिजिवी और बैग्य्निकों को भी हिंदी के इस्तेमाल कर इसे बढ़ावा देना चाहिए.
हमें दक्षिण भारतियों और अन्य अहिन्दी भाषियों को हिंदी अपनाने मैं सहायता करनी चाहिए.

इंसान
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“हिंदी किसकी है?” और प्रवक्ता.कॉम पर ऐसे ही दूसरे कई विषयों पर आलेख मात्र कुशलतापूर्वक निर्मित रेल के डिब्बे इंजन की अनुपस्थिति में सदैव के लिए पटड़ी पर खड़े रह जाते हैं| मेरे विचार से भारत में तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात से ही अच्छे स्वदेशीय इंजनों का अकाल ही रहा है| स्वार्थी तत्व अपने लक्ष्य के अनुकूल इन डिब्बों को धकेल कर दाएं बाएं अवश्य ले जाने में सफल हो जाते हैं| परिणाम स्वरूप चारों ओर अव्यवस्था और अराजकता ही दिखाई देती है| इंजन से मेरा तात्पर्य समाज में सभी क्षेत्रों में कुशल राष्ट्रवादी नेतृत्व से है| मैंने देश विदेश… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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भाषा के विषय में, गाँधी जी की हुकुमशाही, जानते हो? पढ़िए| गांधी उवाच==> “यदि मेरे पास एक हुकुमशाह की क्षमता होती, तो आज मैं हमारे बच्चों की पढाई परदेशी माध्यम द्वारा तुरंत बंद करवा देता| और सारे शिक्षकों और प्राध्यापको को बरखास्तगी के भय पर, निम्न बदलाव तुरंत ला देता| यह एक ऐसा कलंक है जो आपातकालीन उपाय योजना योग्य है|<=== "If I had the power of a despot, I would today stop the tuition of our boys and girls through a foreign medium, "And require all the teachers and professors on pain of dismissal to introduce the change forthwith.… Read more »
dharmendra Kumar Gupta
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dharmendra Kumar Gupta
सुश्री बीनू भटनागर का लेख “हिन्दी किसकी है “पढ़ा . उन्होंने कई मुद्दे उठाए हैं .आज सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है की हिन्दी के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव गहन चिंतन का विषय है. संसदीय राजभाषा समिति , जिसपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है अपने कर्तव्य निभाने में बड़े पैमाने पर असफल रही है. मेरे कुछ सुझाव हैं, जो इस लेख में उठाए गए मुद्दों का समाधान सुझाने की दिशा में सहायक हो सकते हैं- १) इन्टरनेट, एस एम् एस की भाषा के रूप मैं हिन्दी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग आम आदमी करे. ऐसी सुरुआत खुद से होनी चाहिए,भाषानबाजी… Read more »
GGShaikh
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बीनू भटनागर जी,

“हिन्दी किसकी है”
एक सघन भावपूर्ण आलेख है.
बीनू जी अगर आप अपनी शुरुआती उम्र में यह आलेख लिखते तो इतनी
विषय प्रचूरता, भाव प्रचूरता न आती. हमारी राष्ट्र भाषा को लेकर सदा सर्वदा
एक आवकार्य व उपयोगी चिंतन…
बेहद सरलता से शुरु किया गया आलेख, कित-कितनी बारीक़, शोचनीय व निर्णायक
जानकारी दे गया…जो महत्वपूर्ण भी उतनी ही है, राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रचार, प्रसार व
उपयोगिता को लेकर…!
राष्ट्र भाषा के विकास में सही योगदान और सही बल प्रदान करता एक आलेख…

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