लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य

परिवेश का व्यक्ति और समुदाय पर खूब फर्क पड़ता है। परिवेश की हवाएँ और स्थितियाँ हर किसी को प्रभावित करती रहती हैं। आस-पास के हालातों से हर कोई किसी न किसी रूप में प्रभावित होता ही है चाहे वह मानव हो या पशु या फिर पेड़-पौधे।

जिन क्षेत्रों में घर या प्रतिष्ठान के आस-पास अथवा गाँव-शहर में जहाँ-तहाँ काँटों के पेड़ पसरे हुए होते हैं उन क्षेत्रों में निश्चय ही कलह और कुटिलता का माहौल बना रहता है इसकी बजाय जिन इलाकों में हरे-भरे छायादार और फल-फूलदार पेड़ पौधे हुआ करते हैं वहाँ का परिवेश सुकूनदायी होने के साथ ही लोगों में भी भावनात्मक संवेदनशीलता और सहजता के साथ ही प्रेम से सिक्त भावनाओं की सुगंध के कतरे अपने आप फैले हुए अनुभव किए जा सकते हैं।

हम जहाँ रहते हैं उन्हीं क्षेत्रों को सामने रखकर यह अनुपात देखें और अपने इलाके के लोगों की मनःस्थिति और भावनाओं का अध्ययन करें तो अपने आप हमें यह पता चल जाएगा कि यह बात कितनी सही है।

मन और परिवेश की हलचलों का सीधा तथा गहरा संबंध है। जिन गाँवों में विलायती बबूल और दूसरे कंटीले झाड़ व झाड़ियां खूब ज्यादा मात्रा में होते हैं उन इलाकों में शांति की बजाय अशांति ज्यादा होती है और आए दिन झगड़े-फसाद तथा ईर्ष्या और द्वेष जैसी करतूतें होना आम बात है।

इन काँटों वाले पेड़ों की वजह से कई समस्याएं अपने आप पैदा हो जाती हैं। ये काँटें क्षेत्र के वास्तु को प्रभावित करने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा को नकारात्मक ऊर्जा में बदल देते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि हर कहीं बेवजह कलह और कुटिलता का माहौल बना रहता है जिससे कुटुम्ब और समुदाय में तनाव बना रहता हैै।

गीलें काँटों की वजह से नई दुश्मनी पैदा होती रहती है वहीं पुराने और सूखे हुए काँटे पुरानी दुश्मनी की जड़ों को और अधिक गहरी करते रहते हैं। अपने क्षेत्र में घर के आस-पास अथवा गाँव-कस्बे और शहर की कॉलोनियों व मोहल्लों में जिस अनुपात में काँटेदार पेड़ होंगे, उसी अनुपात में कलह का साम्राज्य पसरा हुआ होता है।

वानस्पतिक संतुलन बिगड़ जाने की वजह से कलह और कटुता का माहौल हर कहीं पनपने लगा है। परम्परागत प्रजातियों के छायादार, फलदार और फूलदार पेड़ों के मुकाबले जहाँ कहीं काँटेदार पेड़ ज्यादा होंगे, वहाँ कभी भी न तो शांति हो सकती है, न किसी को सुकून की प्राप्ति।

इसकी बजाय काँटेदार पेड़-पौधे और कंटीली झाड़ियाँ और घास जहाँ नहीं होगी और दूसरे अच्छी प्रजातियों के पौधे ज्यादा हांेगे वहाँ शांति, आनंद और सुकून स्वतः पसरा हुआ होता है। ऐसे स्थानों पर भावात्मक आत्मीयता ज्यादा होती है तथा कलह की संभावनाएँ बिल्कुल नहीं हुआ करती।

यों भी लोगों के मन में जो होता है वह बाहर अभिव्यक्त हुए बगैर नहीं रह सकता। जिन लोगों के मन में कलह और ईर्ष्या रहती है उन्हें भी वे ही पौधे पसंद होते हैं जो काँटेदार हुआ करते हैं जबकि शांति और आनंद की प्राप्ति के इच्छुक लोग विभिन्न पुष्पों वाले और छायादार पेड़-पौधे पसंद करते हैं।

जिन लोगों की वाटिकाओं और बगियाओं में जात-जात के कैक्टस और काँटेदार पेड़-पौधों का बाहुल्य होता है उनकी मानसिकता का अध्ययन किया जाए तो साफ पता चलता है कि या तो उनके मन में ईर्ष्या-द्वेष है अथवा ऐसे किसी माहौल के मारे हुए हैं और मन में खूब प्रतिशोध भरा हुआ है। कुछ लोग इस मामले में अपवाद जरूर हो सकते हैं। यों भी काँटेदार पेड़ों को अपने यहाँ पनपाने को बड़ा वास्तु दोष माना जाता है।

जिन-जिन इलाकों में काँटेदार पेड़ विद्यमान हैं उन्हें साफ किया जाकर इस दोष से मुक्ति पायी जा सकती है। लेकिन इसके लिए काँटेदार पेड़ों को समूल इस प्रकार नष्ट किया जाना जरूरी है कि ये फिर दोबारा पनप न सकें।

इसके साथ ही जिस संख्या में काँटेदार पेड़ हों, उन्हें हटाकर उससे अधिक संख्या में फल-फूल और छायादार पेड़ों को लगा देने से पुराने सारे दोष समाप्त हो जाते हैं और वातावरण में शांति व आनंद का संचार हो जाता है।

बात सिर्फ अपने घरों और प्रतिष्ठानों तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने कार्यालय, स्कूल तथा विभिन्न सार्वजनिक स्थलों में अथवा आस-पास भी काँटेदार पेड़ों का होना इन क्षेत्रों में रहने वालों तथा इलाके के लोगों के लिए घातक होता है। जहाँ काँटेदार पेड़ होंगे वहाँ का माहौल हमेशा दूषित रहेगा ही। इसलिए काँटों से बचें और काँटेदार पेड़-पौधों और झाड़ियों से भी।

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