लेखक परिचय

डॉ0 शशि तिवारी

डॉ0 शशि तिवारी

लेखिका सूचना मंत्र पत्रिका की संपादक हैं।

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यूं तो भारत का संविधान जाति, धर्म, लिंग, भाषा के आधार पर किसी भी वर्ग में भेद नहीं करता। लेकिन आज वो सब कुछ हो रहा है जो नही होना चाहिये मसलन जाति, धर्म लिंग भाषा के आधार पर ही हमारे चतुर नेता आदमी-आदमी के बीच महिला-महिला के बीच खाई बढ़ाने की पुरजोर कोशिश में दिन रात जुटे हुए हैं। फिर बात चाहे दंगे भड़काने के आरोपों की हो, चुनाव में टिकिट बांटने की हो, या आरक्षण की हो। संविधान निर्माण बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने सपने में भी नहीं सोचा होगा जिन दबे कुचले लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए जो 10 वर्ष का संकल्प लिया था उसे आजीवन जारी रख भविष्य में लोग इसी के इर्द-गिर्द राजनीति करेंगे।

यूं तो सुप्रीम कोर्ट नौकरियों पदोन्नति में आरक्षण को ले एवं तय सीमा से ज्यादा आरक्षण को लें समय-समय पर राज्य सरकारों को हिदायत देता रहा है एवं आरक्षण के पुनः रिव्यू की बात कह चुका है ताकि केवल जरूरतमदों को इसका न केवल वास्तविक लाभ मिल सके बल्कि नेक नियत की मंशा भी पूरी हो स्वतंत्रता के पश्चात् आरक्षण बढ़ा ही है जबकि समय-समय पर परीक्षण कर इसको कम करना चाहिए था।

हाल ही में जाट समुदाय के लोगों के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द करते हुए जाति आधारित आरक्षण ही मूलतः गलत है यदि केाई एक गलती लंबे समय से चलती आ रही इसका मतलब ये कतई नहीं है कि अब इसे नहीं सुधारा जा सकता।

आज आरक्षण एक प्रिव्लेज है जो आरक्षण की मलाई खा रहे हैं वे इस दायरे से निकलना नहीं चाहते और जो इस दायरे में नहीं आते वे केवल इससे जुड़ने के लिए गृहयुद्ध की स्थिति को निर्मित करने पर उतारू है।

आज आरक्षण प्राप्त एक अभिजात्य वर्ग है जिसमें सांसद, विधायक, आई.ए.एस. प्रोफेसर, इंजीनियर, डाॅक्टर एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की लम्बी फौज है जो तीन पीढ़ियों से इस पर अपना हक जमाए बैठा है। 8 अगस्त 1930 को शोषित वर्ग के सम्मेलन में डाॅ. अम्बेडकर ने कहा था ‘‘हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्या का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित हैं उनको अपना बुरा रहने का बुरा तरीका बदलना होगा, उनको शिक्षित होना चाहिए।’’

बाबा साहेब ने इस वर्ग के लोगों को शिक्षित होने पर ज्यदा जौर दिया वनस्पत थ्योरी के सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले से फिर एक नई बहस सी छिड़ गई है। मसलन आरक्षण क्यों? किसे, कैसे? कब तक जातिगत आरक्षण के जगह जाति रहित आरक्षण कैसे हो, इस पर विधायिका को जाति धर्म, वर्ग से ऊपर उठ सोचना चाहिए।

केवल जाति कैसे आरक्षण का आधार हो सकती हैं? पिछड़ापन क्या जातिगत हैं? आज आरक्षण को ले सामान्य वर्ग अर्थात् खुला संवर्ग क्या इन्हें भारत में जीने का अधिकार नहीं हैं? क्या ये भारत के नागरिक नहीं हैं? क्या इनके हितों की रक्षा सरकार का दायित्व नहीं हैं? क्या वर्ग संघर्ष का सरकार इंतजार कर रही हंै? फिर क्यों नहीं जाति रहित आरक्षण पर सभी नेता राजनीतिक पाटियों में एका होता?

आज मायावती, पासवान, मुलायम सिंह यादव जैसे अन्य समृद्ध शक्तिशाली किस मायने में अन्य से कम है। इन जैसे लोग जो शक्तिशाली हैं, क्यों नहीं जाति रहित आरक्षण की आवाज बुलन्द करते?

निःसंदेह आज जाति आधारित आरक्षण समाज में द्वेष फैलाने का ही कार्य कर रहा है। यह स्थिति एवं परिस्थिति न तो समाज के लिए शुभ है और न ही सरकारों के लिए। होना तो यह चाहिए गरीब, वास्तविक पिछड़े दलित लोगों को शिक्षा फ्री कर देना चाहिए ताकि बाबा भीमराव अम्बेडकर की मंशा के अनुरूप ये शिक्षित हो न कि केवल आरक्षण की वैशाखी हो। इसमें सभी माननीय सांसद, विधायक, बुद्धजीवियों को मिलकर एक मुहीम चला। संविधान में आवश्यक संशोधन कर स्वस्थ्य जाति रहित समाज के निर्माण में महति भूमिका निभानी होगी।

-डाॅ. शशि तिवारी

(लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हेैं)

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7 Comments on "आरक्षण क्यों और किसे"

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Suresh Kumar rajak
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सवर्णों का तर्क है कि आरक्षण खत्म होना चाहिए क्योकि पिछड़ों ने अपनी प्रगति सुनिश्चित कर ली है । लेकिन जनगणना और तमाम सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट है कि जिस गति से उनका सामाजिक पिछड़ापन दूर करके उन्हें मुख्य धारा में शामिल करना था , वह आजादी के छः दशकों में भी न हो सका । किन्तु फिर भी यदि सरकार आरक्षण से छेड़खानी कर अभिजातों/संभ्रांतों को लाभान्वित करना चाहती है तो उसे कुछ सुझाव मानने होंगे । इन सुझावों में, मैं दावा करता हूँ कि जाति/ वर्ग संघर्ष समाप्त हो जाएगा । बस सरकार इन सुझावों को लागू करने… Read more »
Suresh Kumar rajak
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आरक्षण क्यों होना चाहिए ? यदि नहीं तो क्या होगा उचित उपाय ? आरक्षण पिछडो के लिए जरूरी ? आरक्षण का आधार सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक पिछड़ापन क्यों कहा ? आरक्षण हटे तो सरकार को क्या करने होंगे प्रबंध ? इन्ही मुद्दों पर एक समग्र चिंतन । आरक्षण : एक स्वस्थ समाज का आधार ? मैं शुरुवात करता हूँ – “ सुप्रीम कोर्ट के तमाम उन वक्तयों से जिनमें माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का आधार सामाजिक पिछड़ापन है , इसे आर्थिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता है । “ सुप्रीम कोर्ट… Read more »
Suresh Kumar rajak
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आपका नजरिया- आरक्षण क्या है? और क्यों जरूरी है? आरक्षण व्यवस्था भारतीय इतिहास के लिए कोई नई बात नहीं है। यह इस देश में तब से है जब आर्यों ने इस देश पर अपना शासन स्थापित किया और इस देश के मूल निवासी बहुसंख्यक लोगों पर वर्ण व्यवस्था लागू की। अतः भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था प्रारम्भ से ही विवाद का विषय रही है। देश की 15 प्रतिशत प्रभुसत्ता ब्राह्मण, 3.5 प्रतिशत क्षत्रिय, 5.56 प्रतिशत, वैश्य 6 प्रतिशत समाज ने यहां के 85 प्रतिशत आदिवासी मूल निवासी बहुजन समाज को जातीय भेदभाव का शिकार बनाकर सभी संसाधनों से वंचित… Read more »
क्षेत्रपाल शर्मा
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डॉ शशि तिवारी जी का लेख पढा है , समीचीन है . पूना पैक्ट में, कुछ सीटें( विधान सभाओं और केंद्र स्तर पर ) आरक्षित कर देने , एवं शिक्षा के लिए धन देने की ही बात थी , अब हर स्तर पर नौकरी , प्रमोसन आदि में आरक्षण क्या और क्यों जायज़ है ? न्यायालय में क्रीमी लेयर की परिभाषा तय करके क्यों अब तक प्रस्तुत नहीं की गई ? समाज की समरसता का यथार्थ सच से आंखें नटेरना नहीं हो सकता . कुछ लोगों की स्वार्थ प्रेरित जो भी ओछी ज़बान है , वह क्यों और किस आधार… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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चिरजीवी आरक्षण समाज को पंगु बना देता है।
उस समाजका भाग्य स्वयं गढने का स्वातंत्र्य छीन लेता है।
उसका साहस नष्ट करता है।
परावलम्बिता के कारण उसको सम्मानित होने में भी बाधा बनता है।
आरक्षण कुछ समय के लिए सहा जा सकता है।
सदा के लिए, आरक्षण आरक्षित प्रजा को आरक्षण की गुलामी में रख कर उसका विकास अवरुद्ध करता है।
आरक्षण दिखने में सहायता दिखता है, पर अधिकतः उससे विकास रूक जाता है।
कुछ अपवाद अवश्य होते हैं। पर वैसे अपवाद तो पहले भी थे।

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