लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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मृत्य एक शाश्वत सत्य है, जीवन की तरह, कोई नहीं जानता कब कैसे और कंहाँ किसकी मृत्यु होगी।यदि व्यक्ति अपनी गृहस्थी के संपूर्ण दायित्वों को निबटा कर जाता है तो यह सत्य स्वीकारना और सहना प्रियजनो के लियें सरल होता है पर जब कोई बचपन की अठखेलयाँ करता या यौवन की खिलती धूप मे असमय चला जाता है तो दुख सहना बेहद कठिन होता है।

हमारे समाज मे धर्म और परम्पराओं के नाम पर मृत्यु जैसे दुखद अवसर पर भी इतनी रूढ़ियाँ और पाखँड जोड़ दिये हैं जो पढ़े लिखे संभ्रांत सुसंस्कृत लोग भी बिना सोचे समझे भावुकतावश अपनाते चले आ रहे हैं, इन्हे छोड़ना तो दूर इनमे भी दिखावा और बनावट के समान जोड़ दिये हैं। इनसब बातों को देखकर विचार आता है कि परम्पराओं के नाम पर रूढ़ियों को छोड़ पाना किसी पढ़े लिखे समाज मे ही इतना कठिन होता है तो अशिक्षित और कम पढ़े लिखे लोगों की बदलाव लाने की आशा कैसे की जा सकती है।

जिस प्रियजन के घर मृत्यु दस्तक देती है वहाँ न किसी का खाना बनाने का मन होता है न खाने का, यह तो बहुत स्वाभाविक हैं, ऐसे मे पडौसी मित्र व रिश्तेदार घर के लोगों के खानेपीने ध्यान रखे तो बहुत अच्छी बात है पर कई जगह अंतिम संस्कार के बाद भी कई दिनों तक खाने पीने मे कई प्रतिबन्ध लगा दिये जाते हैं, जैसे खाना एक ही समय बनेगा या दाल मे तड़का नहीं लगेगा या फिर खाने मे हल्दी नहीं डलेगी वगैरह,ऐसे मे रीति रिवाज क्या मतलब है पता नहीं! जीना है तो खाना भी होगा ही, जो सुविधा से बन सके, जैसा बन सके खाया जा सकता है।कुछ घरों मे बहुओं के मायके वाले या रिश्तेदार 13 दिन तक खाना भेजते हैं, यह सब बडा अनुचित सा लगा है। वो दूसरे शहर मे हों तो कुछ लोगों के यहाँ बेटी की ससुराल मे ग़मी होने पर कुछ रुपये भेजने तक की प्रथा है। साड़ी पगड़ी भी वही भेजते हैं,मैने ऐसा सुना है।परम्परा के नाम पर सड़ी गली प्रथाओं के साथ जुड़ा रहना संसकृति को विकसित नहीं करता। तेरह दिन काशोक मनाना भी ज़रूरी नहीं है,3-4 दिन मे एक शोक सभा करके औपचारिक शोक का समापन हो सकता है। जिस परिवार का कोई गया है उसको सामान्य होने मे तो जो समय लगना है वह लगेगा ही, पर औपचारिक शोक समाप्त करने के बाद ही परिवार की दिनचर्या धीरे धीरे वापिस आयेगी। भविष्य को दिशा देने की कोशिश की जायेगी।

सभी लोगों को अपने जीवन काल मे अपने अंग दान करने का निर्णय लेकर आवश्यक कार्यवाही कर लेनी चाहिय घर के लोगों को मृतक के अंग दान करने की सूचना संबधित अस्पताल को देनी चाहिये।

आजकल विद्युत और गैस के द्वारा शवदाह की व्यवस्था है परन्तु उसका प्रयोग कम किया जाता है, इससे प्रदूषन कम होगा ,लकड़ी नहीं कटेंगी, पेड़ बचे रहेंगे। अस्थियों को भी नदियों मे बहाने की प्रथा को बन्द करना चाहिये क्योंकि पहले ही नदियों मे पानी कम है बहाव सुस्त है गंदगी अधिक है।अस्थियों को कंही अपने ही प्रागण मे दबाकर वहाँ कोई पेड़ लगादें जो उस व्यक्ति की यादों को ज़िन्दा रख सकता है। यह व्यवस्था अधिकारिक रूप से सार्वजनिक स्थानो पर भी होनी चाहियें, क्योंकि सबके पास पेड़ लगाने के लियें ज़मीन नहीं होती।

तेरहवीं पर बड़ा सा ब्राहम्ण भोज होता है, मरने वाले की आत्मा कितनी शाँत होती है यह तो पता नहीं पर कुछ लोग मुफ्त का खाकर अकर्मण्य अवश्य हो जाते हैं।हरिद्वार और इलाहाबाद मे मृतक के रिश्तेदारों की पंन्डो द्वारा जेबें ख़ाली करवाने की मैने कई कहानियाँ सुनी हुई हैं। मृतक के परिवार वाले मानसिक रूप से इतने टूटे हुए होते हैं कि वे उनकी ही शर्तों पर दान दक्षिणा देने पर विवश हो जाते हैं।

आमतौर पर घर मे कोई ग़मी हो जाये तो एक साल तक शादी ब्याह या और कोई शुभ कार्य नहीं कराया जा सकता, पर लोग परम्परा तो छोड़ेंगें नही पर तरकीब निकाल लेते हैं।तेरहवीं के साथ बरसी भी करदी, एक पल मे एक साल बिता दिया दोगुने ब्राह्मणों को खिलादिया, दोगुना दान दक्षिणा देदी। अब आराम से कीजिये शादी। एक साल शोक नहीं मनाना मत मनाइये,पर एक साल बाद होने वाली बरसी निबटाकर सिद्ध क्या करना है,किसे करना है, कुछ नहीं बस लकीर की फ़कीर पीटनी है।

मृतक के नाम पर कुछ करना है तो किसी होनहार छात्र की मदद कर सकते हैं, किसी ग़रीब रोगी की मदद कर सकते हैं या किसी ऐसे कामो मे लगी संस्था को कुछ धनराशि दे सकते हैं, परम्परा के नाम पर ये सब पाखंड करके किसी का भला नहीं होगा।

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15 Comments on "मृत्य पर इतना पाखँड क्यों?"

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अभिषेक पुरोहित
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अभिषेक पुरोहित
समाज बदला है और इतना बदला है की ब्रहम्न को गालिया बकना शुरू किया उसको अपने घर बुलानाबंद किया कोई तकलीफ नहीं क्योकि अधिकाश पंडित पंडिताई नहीं करते थे और जो थोड़े बहुत कराते थे उनके बच्छे भी छोड़ने लगे है पर जानते है क्या नुकसान हौवा??आपका धर्म गया ……………….ब्रहम्न भोज की बहुत कथाये प्रचलित है अरे भाई ब्रहम्न के कहा की उसको भोजन कराओ??क्या उसके घर मे खाना नहीं बनता??अष्ठियों के विसर्जन से नदी प्रदूषित होती है ??किसने कहा आपको ??नदी प्रदूषित होती है सीवरेज व औधोगिक वेस्ट से जिसको प्रवाहित करने के लिए स्मृतिकर ने नहीं कहा |… Read more »
BINU BHATNAGAR
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मैने ब्राह्मण या किसी भी जाति को कोई गाली नहीं दी है सच तो यह है कि मै जाति मे विश्वास ही नहीं करती
सामाज मे धर्म के नाम पर जो अंधविश्वास और कुरीतियाँ पनप रहीं हैं उनका विरोध करने पर कुछ लोगों का
तो आक्रोश सहना होगा यह मुझे पता है।धर्म रीति रिवाज और परम्पराओ से नहीं चलता, मेरे लियें धर्म शिष्टाचार है, ईश्वर मे आस्था है,ग़लत को ग़लत
कहने का साहस है,सबका हित चाहना है, ईमानदारी है।मेरी परिभाषा यही है धर्म की, आपकी आप जाने। 

dr dhanakar thakur
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सत्य हमेशा अति में नहीं होता .. बेटी की ससुराल में कुछ देनी है मे सम्बन्ध की जीवन्तता का भाव है (जब संपत्ति लड़कों में बंटती रही है तो इतना भी मइके से क्यों ना हो?) वैसे यह परम्परा मेरे मिथिला में नहीं है – ऐसी कोई भी परम्परा सार्वदेशिक नहीं होती – स्थानीय परिवेश के अनुसार समाज चलता रहा है संसोधन जरूर हो पर समाज को ही तोड़ देने के हद तक नहीं

BINU BHATNAGAR
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 ख़ुशी के अवसर पर देन लेन या दावत आदि ठीक  भी मान लें पर मृत्यु जैसे दुखद अवसर पर ये सब बहुत
 खटकता है। बेटी की ससुराल मे देनदारी होती है। देनदारी बोझ होती है क्योंकि ये एकतरफा होती है। ये बन्द होने से
दोनो परिवरों के रिश्तों मे सहजता ही आयेगी।

BINU BHATNAGAR
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मेरे इसलेख को पढ़ने और प्रतिक्रिया देने वाले सभी लोगों को धन्यवाद।कुछ बातें जो विरोध मे उठी हैं उनका उत्तरदे चुकी हूँ बाकी का दे रही हूँ।शादी ब्याह ख़ुशी के मौकों पर, ऐनीवर्सरी पर पार्टी देने मे या दावत देने मे क्या हर्ज है।कितना बड़ा आयोजन हो यह बहस का मुद्दा होसकता है जो इस लेख की परिधि के बाहर है।मृत्यु जैसे दुखद अवसरपर ब्राह्मण भोज से न परिवार को साँत्वना मिल सकती है, न मृतक की आत्मा को शान्ति,मेरा ऐसा मानना है।
बढ़ती हुई जनसंख्या के आवास के लियें कौंक्रीट के जंगल बने हैं यह सही है।जनसंख्या नियंत्रण पर भी इस लेख  चर्चा नहीं की जा सकती।हमारे पास यदि विद्युत और गैस के शवदाह का विकल्प है तो हम लकड़ी के उपयोगमे कुछ कमी कर सकते हैं, वायुप्रदूषण को कम करने मे थोड़ा सहयोग दे सकते हैं।ये कहना कि और लोग कारों से या फैक्ट्रियों से प्रदूषण कर रहें हैं बचकाना तर्क है,जहाँ कुछ करने की गुंजाइश बिना किसी नुकसान के है वहाँ तो कुछ करें।अस्थियों को ज़मीन मे गाढ़कर पेड़ लगाने से पर्यावरण सुधरेगा,मृतक की याद पेड़ के रूप मे ज़िन्दा रहेगी, नदियोंके पदूषण मे आपकी तरफ से इज़ाफा़ नहीं होगा।मदद किसी की  भी कर सकते हैं, पर मृतक के नाम पर कुछ दान देने का यह तरीक़ा मेरे हिसाब से बहतरहै। 

PRAN SHARMA
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अच्छे लेख के लिए आपको बधाई .

dr dhanakar thakur
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अपने समाज की धर्म और परम्पराओं को रूढ़ियाँ और पाखँड की उपमा देना हिन्दुओं में आम बात हैं जबकि ये कामो बेश सभी समाज में हैं . स्वास्थ्य की दृष्टी से देखा जाये तो सीमित खाना सब दिन ही खाना अच्छा है पर इसमें कोई प्रतिबन्ध कोई लगीये तो स्वागत के बजाय विरोध लोग करेंगे नहीं! जीना है तो खाना भी होगा ही, जो सुविधा से बन सके, जैसा बन सके खाया जा सकता है। बहुओं के मायके वाले या रिश्तेदार 13 दिन तक खाना भेजते हैं, यह अनुचित नहीं है पर इसके बदले दुसरे शहर से कुछ रुपये भेजने… Read more »
BINU BHATNAGAR
Guest

आप मेरे विचारों से सहमत नहीं है मै आपके विचारों का स्वागत करती हूँ।लड़की के घरवालों पर हर दुख सुख
मे बेटी की ससुराल मे कुछ न कुछ देने की परम्परा ग़लत है क्योकि यह एकतरफ़ा देनदारी है।मैने जो लिखा है
वह किया भी है अपने सास ससुर के निधन पर अपने मायके वालों का एक रु.भी स्वीकार नहीं किया।अपने पर स्तर पर पर्यावरण सुरक्षा के लियें जो कर सकती हूँ कूरूँगी।ब्राह्मण समाज से या किसी भी जाति से लोग पढ़लिख कर योज्ञ बने ये बहुत अच्छी बात है।

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