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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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सुरेश गोयल

टीम अन्ना के सहयोगी अरविंद केजरीवाल का ग्रेटर नोयडा में दिए गए भाषण से राजनीतिक क्षेत्रों में नाराज़गी व तिलमिलाहट का होना स्वभाविक है। देश की सभी राजनीतिक पार्टियां व सभी राजनेता भ्रष्ट है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। आज देश में ऐसे त्यागी तपस्वी लोग राजनीतिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं जिनका व्यक्तिगत राजनीतिक स्वार्थ एक प्रतिशत भी नहीं है। केजरीवाल के शब्दों में कहीं चूक आवश्य हुई है जिसके कारण उन्हें आलोचना का शिकार होना पड़ा। परंतु कुल मिलाकर उनके द्वारा दिया गया भाषण देश की जनता की भावनाओं का ही प्रतिनिधित्व करता है। आज देश की जनता का वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से मोह लगभग खत्म हो चुका है।

हम अपने देश भारत को दुनियां का सबसे लोकतांत्रिक देश कहे जाने पर गौरव की अनुभूति करते है। यह हमारे लिए गर्व करने की बात है भी परंतु विचारनीय विषय यह है कि क्या हम अपने राष्ट्र को स्वंतत्रता मिलने के पश्चात् वैसा राष्ट्र बना पाये जिसकी कल्पना स्वतंत्रता आंदोलन के समय भारत माता के उन वीर सपूतों ने की थी जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। क्या कभी गांधी बापू ने स्वपन में भी सोचा था कि भारत माता के सपूत भारत की लोकतांत्रिक मर्यादाओं को पैरों तले कुचल देंगे। क्या वीर दामोदर सावरकर ने कल्पना की थी कि भारत माता के पुत्र अपनी ही मां का चीर हरण करेंगे। क्या भगतसिंह, सुखदेव, चन्द्रशेखर इसी स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते इसी दिन के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए थे। क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस का ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का वचन निरर्थक नहीं चला गया क्योंकि उन्होंने ऐसी आजादी की कल्पना ही नहीं की थी। भारत के संविधान निर्माता डा0 भीमराव अम्बेडकर ने भारत के संविधान की रचना बड़ी सूझबूझ, दूरदर्शिता, कड़ी मेहनत व गहन तपस्या के साथ की थी। उन्होंने नहीं सोचा था कि हमारे देश के राजनीतिक इसी संविधान की कसमें खाकर देश को लूटने-खसूटने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। यह बात कहने में ज़रा भी हिचक नहीं कि वर्तमान परिस्थितियों में हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह अप्रांसगिक हो गई है। आज लठ बल, धन बल, जातिवाद, वंशवाद, भाषावाद, भाई-भतीजावाद का पूरी तरह बोलबाला हो गया है। चुनाव लड़ना करोड़ो का खेल हो गया है। आज योग्य इमानदार व्यक्ति जनसेवा की भावना से राजनीतिक क्षेत्र में काम करना चाहे तो कहीं अपवाद को छोड़कर बहुत मुश्किल है। देश को सुसाशन देने की बात अब नहीं की जाती। धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर वोट बटोरने का काम अब राजनीति हो गया है। आज राजनीति में लोग देश सेवा की भावना से नहीं व्यपारी के रूप में आने शुरू हो गये हैं। राजनीति का पूरी तरह व्यापारीकरण कर दिया गया है।

अब कुल मिलाकर एक ही बात बार-बार मन मस्तिषक में कोंध रही है कि देश की वर्तमान संविधानिक व्यवस्था को ही क्यों न बदल दिया जाए। वर्तमान व्यवस्था मूल रूप से ब्रिटिश संविधान पर आधारित है और यह व्यवस्था पूरी तरह से असफल सिद्ध हो रही है। बहुदलीय व्यवस्था हमारे देश के लिए ज्यादा उपयोगी सिद्ध नहीं हो पायी। यदि देश में अध्यक्षिय शासन प्रणाली (राष्ट्रपति शासन) की रूपरेखा तैयार की जाए तो हमारे देश की दशा और दिशा बदलने में कारगार साबित हो सकती है। परैजीडैंट सिस्टम के बारे में देश में कई बार इस तरह का विचार आया भी है परंतु ना जाने क्यों इस विचार को ठोकर मार दी जाती है और तर्क यह दिया जाता है कि वर्तमान व्यवस्था भी अच्छी है। केवल नीयत के द्वारा क्रियान्वित की आवश्यक्ता है परंतु नीयत के साथ इस व्यवस्था को क्रियान्वित कौन करेगा यह आज तक समझ से परे है।

संविधान में संशोधन करके ढांचा ही इस प्रकार खड़ा करना होगा कि देश व राज्यों के मुख्याओं का चुनाव सीधे देश की जनता करे। देश व प्रांत के मुख्या चुने जाने पर लोकसभा या विधानसभा के सदस्यों में से अपना मंत्रिमंडल का गठन अपने विवेक से करे तो जहां अनिश्चिता की स्थिति समाप्त हो जाएगी। त्रिशंकु लोकसभा व विधानसभा का भय भी समाप्त हो जाएगा। छोटे दलों या निदर्लय चुने गए सांसदों के द्वारा ब्लैकमेल करने का रास्ता भी अपने आप समाप्त हो सकता है। समर्थन वापिस लेने व समर्थन देने की होने वाली सौदे बाजी से जो देश की जनता पर बहुत मंहगा बोझ है। यह व्यवस्था जनलोक-कल्याणकारी निर्णय लेने में अधिक सक्षम और उर्जावान सिद्ध हो सकती है।

सुरेश गोयल धूप वाला

भारतीय जनता पार्टी, जिला महामंत्री, हिसार

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1 Comment on "व्यवस्था परिवर्तन के द्वारा ही होगा राष्ट्र का कल्याण"

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CAPT. ARUN G. DAVE.
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श्रीमान सुरेश गोयल साब, में आपके इस कथन से पूरी तरह सहमत नहीं कि, ” आज देश में ऐसे त्यागी तपस्वी लोग राजनीतिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं जिनका व्यक्तिगत राजनीतिक स्वार्थ एक प्रतिशत भी नहीं है। केजरीवाल के शब्दों में कहीं चूक आवश्य हुई है जिसके कारण उन्हें आलोचना का शिकार होना पड़ा।” मैं समझता हूँ कि राजनीती में ऊंचे ओहदों पर बैठे व्यक्ति जोकि ९९% भी स्वयं ईमानदार हों , कोई भी नहीं….. और फिर भ्रष्ट तंत्र में रह कर ओहदे पर बैठ कर नीचे वालों को देश लूटने देना और कुर्सी पर आंख मूंदे बैठे रहना… Read more »
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