लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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मीडिया में खासकर फिल्मों में सारी दुनिया में यह देखा गया है कि अभिनय के क्षेत्र में स्त्रियों की तुलना में मर्द ज्यादा उम्र तक अभिनय करते हैं। हॉलीवुड फिल्मों के बारे में किए गए अनुसन्धान बताते हैं कि औरतों की अभिनय उम्र तीस साल के आसपास जाकर खत्म हो जाती है जबकि मर्द की औसत अभिनय उम्र चालीस साल है। टीवी में बूढ़े चरित्रों का नकारात्मक रूपायन युवाओं में बढ़ी हुई उम्र के कलाकारों के प्रति आकर्षण घटा है। टीवी पर बूढ़ी उम्र के स्त्री चरित्रों का कम आना या उनकी नकारात्मक प्रस्तुति के कारण भी प्रौढ़ स्त्री चरित्रों का प्रयोग घटा है।

मीडिया में मर्द की सफलता का पैमाना इस बात से तय होता है कि वह क्या करता है ? जबकि औरत की सफलता का पैमाना उसके लुक से तय होता है। मर्द की तुलना में औरत का शारीरिक तौर पर आकर्षक होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। सौन्दर्य और जवानी को स्त्री के साथ जोड़कर देखा जाता है, इसके कारण ही स्त्री की ज्यादा उम्र को नकारात्मक तत्व के रूप में लिया जाता है। मर्द की उम्र उसकी सफलता और ज्ञान या अनुभव के रूप में देखी जाती है जबकि स्त्री ज्योंही अपनी जवानी के दौर को पार कर जाती है। उसका सौन्दर्य खण्डित मान लिया जाता है। वह सामाजिक तौर पर या कार्य क्षेत्र में अपना सामाजिक मूल्य खो देती है।

समाचारों में स्त्री एंकर या प्रवाचिका मूलत: अपनी एपीयरेंस के कारण बनी रह पाती है। जबकि मर्द एंकर को अनुभव और विशेषज्ञता के आधार पर देखा जाता है।मर्द का चेहरा झुर्रियों रहित,सफेद बालों वाला भी आकर्षक माना जाता है, जबकि औरत को एक सामान्य स्टैण्डर्ड के हिसाब से युवापन को दर्शाना होता है।

टीवी पत्रकारिता पर यदि मर्द और औरत के लिए एक ही मानक लागू किया जाए तो ज्यादातर मर्द बेरोजगार हो जाएंगे। कार्य क्षेत्र की प्रस्तुतियों में टीवी चरित्रों में स्त्रियां कुछ ही किस्म के काम करती नजर आती हैं। तुलनात्मक रूप से मातहत पदों पर काम करती नजर आती हैं। जबकि मर्द व्यापक क्षेत्र में काम करता नजर आता है ,कर्ता के रूप में नजर आता है। अपने पद पर काम करते हुए औरतें यदि अपनी क्षमता का इस्तेमाल करती हैं तो उन्हें खतरों का सामना करना पड़ता है, यहां तक कि नौकरी जाने का भी खतरा रहता है।

सफल स्त्री चरित्र हमेशा अस्थिर, चंचल, जड़ से कटे हुए, स्त्रीत्व और मर्दानगी से विच्छिन्न नजर आते हैं। इस तरह के स्त्री चरित्रों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि यदि आप असली औरत हैं तो रीयल में जो कार्य है उसे नहीं कर सकती हैं। और यदि रीयल कार्य कर लेती हैं तो रीयल औरत नहीं है। जबकि इस तरह का वर्गीकरण मर्द चरित्रों के संदर्भ में पेश नहीं किया जाता। सामान्य तौर पर साठ साल से ऊपर की औरत का चरित्र टीवी कार्यक्रमों में बहुत कम  नजर आता है।

पोर्न और अर्द्ध पोर्न फिल्मों या धारावाहिकों में पुरूष को अमूमन सेक्स के अति आग्रहशील दिखाया जाता है। पुरूष को अनेक बार अनेक औरतों से सेक्स करते हुए दिखाया जाता है। वहीं दूसरी ओर औरत को सेक्स के चौकीदार के रूप में पेश किया जाता है। पुरूष का ध्यान आकर्षित करने वाली के रूप में चित्रित किया जाता है। मीडिया में मूल्यवान सेक्स वह है जब औरत रोमैंटिक संबंध के प्रति वचनबद्ध हो। इस तरह की आकांक्षाएं आम तौर पर दर्शकों में यथार्थ रूप ग्रहण कर लेती हैं। इस तरह की आकांक्षाओं, एटीट्यूट्स और मूल्यों को स्टीरियोटाईप रूपों में पेश किया जाता है।

सामान्यत: मर्द सेक्स के प्रति प्रतिगामी विचार रखते हैं। वे अनेक से सेक्स करना चाहते हैं,विभिन्न रूपों में सेक्स करना चाहते हैं।बार-बार कामोत्तेजना चाहते हैं। जबकि औरतें ऐसा नहीं सोचतीं। सामान्यत: सेक्स के बारे में व्यक्ति अनेक स्रोतों से सूचनाएं प्राप्त करता है। इनमें से एक स्रोत पत्रिकाएं भी हैं। अनुसंधान से पता चला है कि तरूणों और युवाओं में पत्रिकाओं के जरिए काम -क्रियाओं के विविध रूपों और पद्धतियों, वैकल्पिक सेक्सरूपों आदि के बारे में सूचनाएं हासिल करने की प्रवृत्ति पायी जाती है। इनफोरमेशन प्रोसेसिंग मैथड और कल्टीवेशन थ्योरी के अनुसार यह सिद्ध किया जा चुका है कि पत्रिकाओं में प्रकाशित कामुक सामग्री का ज्यादा गहरा असर होता है।

एक अध्ययन से यह तथ्य भी सामने आया है कि स्वतंत्र रूप से सेक्स के बारे में यदि किसी सामग्री का तरूण अध्ययन करते हैं तो उनमें सेक्स संबंधी अनेक किस्म के रूझान देखे गए हैं। मसलन् स्वतंत्र रीडिंग करने वालों में संभोग, मुख मैथुन, कामुक स्वप्न आदि की गति बढ़ जाती है।

प्लेबॉय के पाठकों में प्रेमरहित सेक्स का रूझान देखा गया है। कामोत्तेजक सामग्री के जरिए सेक्स, सेक्स के बदले सेक्स के लक्षण देखे गए हैं। महिला पत्रिकाओं में सेक्स का स्टीरियोटाईप रूप ज्यादा नजर आता है।

एक अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि पत्रिकाओं में प्रकाशित गैर-पोर्नोग्राफिक सामग्री बलात्कार के भावबोध को निर्मित करती है। महिला पत्रिकाओं में सेक्स संबंधी जिन मसलों पर ज्यादा सामग्री होती है, वे हैं परिवार नियोजन की विधियां, कामुकता की पद्धतियां,कामुकलत,अथवा यों कहें कि कामुक तकनीकी और कामुक आनंद के रूप आदि।

युवा लड़कियों को सम्बोधित पत्रिकाओं में रोमैण्टिक संबंध बनाने के उपायों , कामुकता संबंधी फैसले लेने, कामुक स्वास्थ्य संबंधी विषयों की सामग्री होती है। कुछ पत्रिकाएं ऐसी सामग्री पेश करती हैं जिनमें युवा लडकियों से रोमैण्टिक संबंध बनाने, सेक्सी दिखने,युवा लड़कों को कैसे खुश रखें इन तत्वों पर जोर रहता है साथ ही ये पत्रिकाएं बताती हैं कि औरतों को धैर्य और नियंत्रण से काम लेना चाहिए। अधिकांश स्त्री पत्रिकाओं में औरत को सेक्स की वस्तु के रूप में पेश किया जाता है।

महिला पत्रिकाओं में स्त्री के कामुक अंगों के विकास , सेक्स-संतुष्टि , गैर-परंपरागत कामुक व्यवहार और स्थितियां, एटीट्यूट्स एच आई वी / एड्स, अन्य सेक्स संक्रमित बीमारियां, बलात्कार, सुरक्षित सेक्स, प्रजनन, कण्डोम, स्त्री का शारीरिक स्वास्थ्य, गर्भपात आदि विषयों पर प्रमुखता से सामग्री रहती है। इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा सेक्स कैसे पाएं, सेक्स संतुष्टि कैसे पाएं, कैसे प्यार करें, कैसे अपने पति और प्रेमी को वश में रखें या उसका दिल कैसे जीतें। स्त्रियां क्या चाहती हैं, वे कैसा सजना चाहती हैं, किस तरह की सुंदरता पसंद करती हैं, किस तरह का शरीर पसंद करती हैं, प्रेम की पद्धतियां, स्त्रियों को किस तरह के पार्टनर की जरूरत है इत्यादि विषयों की सामग्री भी महिला पत्रिकाओं में रहती है।

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

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