‘उरी’ भारतीय स्वाभिमान से भर देनेवाली फिल्म

: डॉ. मयंक चतुर्वेदी 
फिल्मों की मनोरंजनात्मक दुनिया में मूवी आती हैं और चली जाती हैं, किेंतु कुछ फिल्म और किरदार ऐसे होते हैं जो सदैव जीवन्त बने रहते हैं, ठीक उसी तरह से जैसे हमारे अंतरमन में वे सुख-दुख की यादें जो कभी नहीं भुलाई जा सकती। सर्जिकल स्ट्राइक की सच्ची घटना पर बनी फिल्म ‘उरी’  भी कुछ इसी तरह की है, जिसके बारे में यही कहना होगा कि इसे हम सभी अपने जहन में सदैव जिंदा रखेंगे। अपने समय की तत्कालीन सरकार के सभी प्रमुख राजनीतिक एवं फौजी चरित्रों को जीवन्त करती और भारतीय स्वाभिमान से आत्मविभोर कर देनेवाली इस मूवी को देखने के बाद जैसा जोश शरीर के रोम-रोम में अनुभूत होता है, वह अपने आप में अद्भुत है। 
वस्तुत: वह बुरा दिन भारत की सेना और जनता कभी नहीं भूलती जब 18-19 सितम्बर 2016 को उरी हमले में भारतीय सेना के 19 जवान शहीद हुए थे। चुपके से सोते हुए जवानों पर किया गए हमले ने हर भारतीय को पाकिस्तान के प्रति क्रोध से भर दिया था, दूसरी ओर हर उस आतंकी सोच के प्रति भी जिसके लिए यह कोई धर्म युद्ध है। इसके प्रतिउत्तर में सितम्बर 2016 को भारतीय सेना ने एलओसी क्रॉस करके पाकिस्तान की सरजमीं पर उसी उरी अटैक का बदला लिया था । यहां फिल्म के निदेशक आदित्य धर भारतीय जनता को जो संदेश देना चाहते हैं,  वह इस फिल्म के माध्यम से सीधे तौर पर देने में सफल रहे हैं। वे इस फिल्म से न केवल देशभक्ति बल्कि अपनी सेना और भारतीय जन की चुनी हुई सरकार के प्रति विश्वास का भाव पैदा करने में कामयाब रहे। 
फिल्म में हमारे पाकिस्तानी दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने का प्रयास सफल स्ट्राइक की दास्तां के जरिए हुआ है । इसका आरम्भ भी बहुत मार्मिक और खुशनुमा अंदाज में होता है जो कुछ इस तरह का है कि उत्तर-पूर्व के एक जंगल से गुजरती सैनिकों से खचाखच भरी आर्मी बस। बस के अंदर अंताक्षरी और उससे उठते वर्दीधारियों के आपसी संवाद, गुनगुनाते गीत, कहीं घर जाने की खुशी, कहीं सजनी का मुंह देखने का इंतजार और इस इंतजार का अपना शृंगार रस। इस बीच अपने प्रमोशन की खुशी जाहिर करनेवाले जवानों की भी कोई कमी नहीं। अचानक, सड़क पर पड़ी कुछ कीलों के टायर में धंसते ही बस का रुकना और उसके रुकते ही मानो एक झटके में सब कुछ समाप्त हो जाना। आतंकियों ने कई सैकिनों को गोलियों का निशाना बना डाला।  वस्तुत: सैनिकों पर होने वाले आतंकी हमलों की ओर ध्यान खींचते इस दृश्य के साथ फिल्म ‘उरी: दि सर्जिकल स्ट्राइक’ की शुरूआत होती है। उसके बाद फिल्म चार अध्यायों के जरिये आगे बढ़ती है। मणिपुर में आतंकी बस पर हमले के बाद भारतीय सेना एक मिशन के तहत भारत-म्यानमार बॉर्डर के पास इकट्ठा उत्तरपूर्व के सारे आतंकियों को मार गिराती है। फिल्म का अंतिम अध्याय ‘सर्जिकल स्ट्राइक’  है । 
यहां संदेश साफ है, भारत को कोई किसी भी कीमत पर कम न आंके। देश में जिस तरह से राजनीतिक एवं सामाजिक व आर्थिक आधार में कुछ लोगों द्वारा भय पैदा कर भयाक्रान्त करने का प्रयास होता है, वास्तव में यह फिल्म हमें उससे मुक्ति का मार्ग प्रदान करती है तथा स्पष्टत: भारतीय सेना की शौर्य गाथा खुलकर बयां करती है। 
फिल्म में अपने समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, विदेशमंत्री, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, जैसे तमाम दायित्वों का निर्वहन सफलता से हुआ है। । इसमें परेश रावल देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के रोल में नजर आ रहे हैं। यहां न केवल विकी कौशल की बेहतरीन ऐक्टिंग है बल्कि कीर्ति कुल्हारी, यामी गौतम, मोहित रैना, रजत कपूर ने अपने किरदार में जान डाल दी है। 
आर्मी ऑफिसर विहान शेरगिल ( विकी कौशल ) के इस जैसे संवाद  ‘वे कश्मीर चाहते हैं और हम उनके सर’ इस फिल्म की यूएसपी है । विक्की जब अपनी सैनिक टुकड़ी से चिल्लाकर पूछते हैं,‘हाउ इज दि जोश?’ तो जवाब में ‘हाई सर’ बोलते सैनिकों के साथ दर्शकों के जोश का पारा भी चढ़ जाता है। मोहित की बेटी बनी बाल कलाकार जब अपने पिता की शहादत के बाद उनका सिखाया हुआ ‘वॉर क्राई’ (सैनिकों में जोश भरने वाला खास स्लोगन) बोलती है, तो रोंगटे खड़े होते हैं और आँसू भी आते हैं इतना ही नहीं तो भारतीय सेनिकों के पराक्रम, उनकी शहादत एवं उनके परिवार पर गर्व भी होता है। पूरी फिल्म में कहीं भी अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन या डायलॉग नहीं, सीधे सादे तरीके से फिल्म अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय करते हुए आगे बढ़ती है। कहा जा सकता है कि फिल्म की डायलॉग डिलीवरी परफेक्ट है। 
सच पूछिए तो फिल्म हमें भारतीय होने की श्रेष्ठतम आभा से भर देती है। भले ही फिर सिनेमा में देशभक्ति विषय पर बनने वाली यह फिल्म कोई नई न हो किंतु ‘उरी’ हमें अपने विश्वास से परिचित कराती है। ‘उरी’  का शिल्प उम्दा है, जिसके लिए यह फिल्म आगे वर्षों तक याद की जाती रहेगी। 

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