लेखक परिचय

डॉ. सौरभ मालवीय

डॉ. सौरभ मालवीय

उत्तरप्रदेश के देवरिया जनपद के पटनेजी गाँव में जन्मे डाॅ.सौरभ मालवीय बचपन से ही सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण की तीव्र आकांक्षा के चलते सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए है। जगतगुरु शंकराचार्य एवं डाॅ. हेडगेवार की सांस्कृतिक चेतना और आचार्य चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि से प्रभावित डाॅ. मालवीय का सुस्पष्ट वैचारिक धरातल है। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया’ विषय पर आपने शोध किया है। आप का देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक मुद्दों पर निरंतर लेखन जारी है। उत्कृष्ट कार्याें के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है, जिनमें मोतीबीए नया मीडिया सम्मान, विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान और प्रवक्ता डाॅट काॅम सम्मान आदि सम्मिलित हैं। संप्रति- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। मोबाइल-09907890614 ई-मेल- malviya.sourabh@gmail.com वेबसाइट-www.sourabhmalviya.com

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-सौरभ मालवीय

राष्ट्र के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर वामपंथी मस्तिष्क की प्रतिक्रिया राष्ट्रीय भावनाओं से अलग ही नहीं उसके एकदम विरूध्द रही है। गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन के विरूध्द वामपंथी अंग्रेजों के साथ खड़े थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ वामपंथियों ने कहा था। मुस्लिम लीग की देश विभाजन की मांग की वकालत वामपंथी कर रहे थे। आजादी के क्षणों में नेहरूजी को ‘साम्राज्यवादियों’ का दलाल वामपंथियों ने घोषित किया। भारत पर चीन के आक्रमण के समय वामपंथियों की भावना चीन के साथ थी। अंग्रेजों के समय से सत्ता में भागीदारी पाने के लिए वे राष्ट्र विरोधी मानसिकता का विषवमन सदैव से करते रहे। कम्युनिस्ट सदैव से अंतरराष्ट्रीयता का नारा लगाते रहे हैं। वामपंथियों ने गांधीजी को ‘खलनायक’ और जिन्ना को ‘नायक’ की उपाधि दे दी थी। खंडित भारत को स्वतंत्रता मिलते ही वामपंथियों ने हैदराबाद के निजाम के लिए लड़ रहे मुस्लिम रजाकारों की मदद से अपने लिए स्वतंत्र तेलंगाना राज्य बनाने की कोशिश की। वामपंथियों ने भारत की क्षेत्रीय, भाषाई विविधता को उभारने की एवं आपस में लड़ने की रणनीति बनाई। 24 मार्च, 1943 को भारत के अतिरिक्त गृह सचिव रिचर्ड टोटनहम ने टिप्पणी लिखी कि ”भारतीय कम्युनिस्टों का चरित्र ऐसा कि वे किसी का विरोध तो कर सकते हैं, किसी के सगे नहीं हो सकते, सिवाय अपने स्वार्थों के।” भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले गांधी और उनकी कांग्रेस को ब्रिटिश दासता के विरूध्द भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन जैसे देशभक्तों पर वामपंथियों ने ‘देशद्रोही’ का ठप्पा लगाया।

10 Responses to “कम्‍युनिस्‍टों का इतिहास”

  1. yogesh dubey

    श्री रामतिवारी जी का इलाज किसी झोलाछाप डॉक्टर के द्वारा संभव नहीं है इन्हें चाइना भेजना पड़ेगा .पहले तो सिर्फ जगदीश्वर के लेख पर ही टिपण्णी करते थे अब तो पागलो की तरह रास्त्रवदियो के पीछे ही पड़ गए है .

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  2. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    पंकज जी वामपंथियों पर आपसे एक अच्छे विस्तृत लेख की उम्मीद है आशा है आप निराश नहीं करेंगे

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  3. Anil Sehgal

    कम्‍युनिस्‍टों का इतिहास – by – सौरभ मालवीय

    (१) क्या वास्तव में भारत भुखमरे देशों में टॉप पर है ?

    (२) क्या चीन एवं रूस की वर्तमान खुशहाली का आधार उनका साम्यवादी होना है ?

    यदि ऊपर दोनों प्रश्नों का उत्तर ‘ yes’ है तो कांग्रेस, भाजपा, बहुजन, समाजवादी पार्टीयाँ मिलकर भारत की सत्ता सी.पी.एम्. को देकर राजनीति से संन्यास क्यों नहीं ले लेते ?

    भारत की गरीबी दूर करने का कितना आसान ढंग है.

    (३) ऐसे में भारतीय कम्युनिस्टों की वाह-वाह सारे विश्व में फैल जायेगी, और भारत पुनः विश्व गुरु बन जाएगा.

    वाह !

    -अनिल सहगल –

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    desh bhakti to aap jiason ki kreet dasi hai ….paakistaan ne aadhaa kahmeer cheen ko de diya udhar 62 men jaisa ki aap farma rahe hain ki cheen ne aapko bahut mara …isme garv ki kya baat hai yh to rashtreey sharm ki baat hai apni ….aap hi bayaa karke kyon jag hansai pr tule ho ? jhola chhap dr ne hi is desh ko barbaad kiya hai …

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  5. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    सन 62 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण के समय इनकी वफादारी चीन के प्रती रहने को देशवासी आजतक भूले नहीं हैं. अनेकों बार साबित हो चका है की ये लोग भारत के वफादार नहीं. इनकी वफादारी चीन या रूस के लिए ही है. आज भी ये इस्लामी जेहादियों के पक्ष में पूरी ढिठाई के साथ खड़े हैं और आतंकवाद के शिकार हिन्दू समाज को आतंकवादी कहने की दुष्टता कर रहे हैं. अतः इनसे देश किसी भलाई की आशा करे तो कैसे करे ? काश ये सही और गलत को समझ पाते तो हमारे ये अपने लोग स्वयं अपनी जड़ें काटने के दुष्कर्म से बच जाते.
    – सौरभ जी ने एक सही विषय पर लिख कर देश को सचेत करने का सही प्रयास किया है. उन्हें साधुवाद.

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  6. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    रिचर्ड टेतनोहम गुलाम भारत पर कब्ज़ा किये हुयी बिर्टिश टोरी कंजर्वेटिव सरकार की ओर से भारत का शत्रु था की नहीं ?हमें ऐसे शत्रुओं से प्रमाण पत्र नहीं चाहिए ये आत्तायाई भारत की साम्यवादी विचारधारा से इसलिए नफरत करते थे की उस समय के साम्यवादी सोवियेत शाशन ने सारी दुनिया के गुलाम राष्ट्रों -जिसमें २/३ देश गुलाम थे -की पूरी आजादी का खुला समर्थन दिया था …द्वतीय युद्ध उपरांत इंग्लैंड ,जर्मनी .फ्रांस औरपुर्तगाल सबके सब पस्त हो गए थे …इसीलिए इन देशों में भुखमरी ,बीमारी अपंगता की भयावहता ने आम जनता में उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रचंड आक्रोश दर्शाया …लगभग सभी जगह साम्यवाद या लेबर पार्टियों की चुनाव में धडाधड जीत होने से विश्व पूंजीवाद ने कल्याणकारी राज्य का चोला पहिनकर अपने उपनिवेशों को लूट कर आपस में लड़ने के शगूफे छोड़े …वही इन श्रीमान रिचर्ड तोत्न्ह्म ने किया ..अंग्रेज चले गए अपनी ओरस संताने छोड़ गए जो भारत को आजादी के ६४ साल वाद भी उसी तरह गुलाम बनाए हुए हैं.इसी प्रवक्ता .कॉम पर अनेक बार देश की दुर्दशा पर लिखा गया है और अब तो सारी दुनिया में ढिंढोरा पित रहा है की भारत सबसे भुखमरे देशों में टॉप पर है ….चीन रूस क्यूबा बोलिबिया बियेत्नाम कोरिया इत्यादि साम्यवादी देश इतने सम्पन्न और ताकतवर हैं की अमरीका को आँख दिखा रहे हैं ….भारत के नेता अमरीका के चरणों में साष्ट्रांग दंडवत कर रहे हैं ….भारत में साम्यवाद का बाकई कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा है …भारत में आजादी के bad kuchh netaon ने अमरीका के ishare पर keral की pahli nirvachit सरकार को gira दिया था …अमरीका की CIA ने khulasa किया है की kai cingresi uske jarkhareed गुलाम थे .bechare moraraji deshai तो is smbandh में manhaani का mukdma भी haar गए और bhagwan को pyaare हो गए ..साम्यवाद को samjhne के liye vigyaan raajneeti arthshaastr और dharm-mazhb के bare में भी gyaan hona chahiye …kisi videshi aakranta के ghise pite muhavre प्रवक्ता .कॉम पर parosne से naahk katuta hi panapti है …

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  7. सुरेश चिपलूनकर

    सुरेश चिपलूनकर

    “…24 मार्च, 1943 को भारत के अतिरिक्त गृह सचिव रिचर्ड टोटनहम ने टिप्पणी लिखी कि ”भारतीय कम्युनिस्टों का चरित्र ऐसा कि वे किसी का विरोध तो कर सकते हैं, किसी के सगे नहीं हो सकते, सिवाय अपने स्वार्थों के।” भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले गांधी और उनकी कांग्रेस को ब्रिटिश दासता के विरूध्द भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन जैसे देशभक्तों पर वामपंथियों ने ‘देशद्रोही’ का ठप्पा लगाया…”
    एकदम सही कहा…

    इन लोगों द्वारा कहा गया “तोजो का कुत्ता” भी प्रसिद्ध शब्द है… 🙂 🙂 🙂

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  8. आर. सिंह

    R.Singh

    JAGDISHWAR CHATURVEDIJI,aap kya kahate hain?Kya Saurabh Maalviya ne kuchh galat likhaa hai?

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  9. पंकज झा

    पंकज झा.

    वाह …वामपंथ की तो बखिया उधेड़ दी सौरभ ने. बिलकुल सही कहा है लेखक ने कि भारतीय कम्युनिस्टों का चरित्र ऐसा कि वे किसी का विरोध तो कर सकते हैं, किसी के सगे नहीं हो सकते, सिवाय अपने स्वार्थों के।” तथ्यपरक लेखन करना सौरभ जी की पहचान है.अपनी धार ऐसे ही बनाये रखें….बढ़िया.

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