कीटाणुओं पर प्रहार करेगा अदालत से सीधा प्रसारण

विवेक पाठक
पारदर्शिता हमेशा पर्दे और कोनों में छिपी बुराइयों पर प्रहार करती है। दुनिया की तमाम बुराइयां पारदर्शिता के अभाव में पनपती हैं। हमें लोग देख रहे हैं, हमें दुनिया देख रही है ये भाव हमें गलत भाव को आगे बढ़ाने से रोकता है। न्यायालय न्याय के मंदिर हैं मगर उनमें न्याय का दान हमारे आप जैसे मानवीय स्वभाव के न्यायधीश दे रहे हैं। न्यायालयों से न्याय भी वकीलों के माध्यमों के जरिए मांगा जाता है तो हैं तो आखिर मानव ही। मानवीय गुण दोषों में न्याय का अंश मात्र भी प्रभावित नहीं हो इसके लिए न्यायालयों में पारदर्शिता के लिए सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला स्वागत योग्य है। गुरुवार को भारत के मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने न्याय प्रक्रिया को पारदशी बनाने अहम फैसला दिया है। फैसले के तहत अब अब अदालती कार्रवाइयों का सीधा प्रसारण देश में देखा जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट की इस मंजूरी के बाद पायलट प्रोजेक्ट के तहत संविधान पीठ के समक्ष होने वाली राष्ट्रीय और संवैधानिक महत्व के चुनिंदा मामलों का देश के सवा अरब लोग जल्द ही दूरदर्शन पर देख सकेंगे। भारत की न्यायपालिका की जवाबदेही की दिशा में यह अहम फैसला है। सरकार के तीनों अंगों में जब कभी देशवासी विधायिका के बनाए कानून के हिसाब से कार्यपालिका को काम न करते देखते हैं तो सवाल उठाते हैं। लोग दो स्तंभों से संतुष्ट न होने पर सबसे अंत में न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाते हैं। यह दरवाजा भारत के नागरिकों हर अन्याय में आवाज बना है। रुल ऑफ लॉ के हिसाब से देश चले इसके लिए देश की अदालतें काम कर रही हैं। ये न्याय के मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र हैं इसलिए यहां अंश मात्र की कमजोरी सवा अरब देशवासियों को निराश कर सकती है। हर जगह से हारा इंसान न्यायालयों से सत्य की उम्मीद करता है ऐसे में न्यायालयों और न्यायधीशों को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला देश के नागरिकों के लिए एक उपहार जैसा है। आज हम अपने चुने हुए सांसदों के कामकाज और उनके उठाए मुद्दों को आए दिन सीधे प्रसारण में परख पाते हैं। हम अपने प्रति उनकी जवाबदेही को संसद में उनकी आवाज और तर्कों को देख सुनकर मापते हैं। ऐसे में देश की न्यायपालिका के कामकाज का सजीव प्रसारण देखना नागरिकों के लिए बहुत उम्मीद भरा फैसला है। यह फैसला लिए जाने के अपने कारण हैं और सुप्रीम कोर्ट ने अपनी गरिमापूर्ण भाषा में बहुत कुछ कह दिया है। मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा की अगुआई में तीन जजों की बेंच ने अपने फैसले में बेबाकी से कहा है कि यह फैसला व्यापक जनहित में लिया गया है। जैसे धूप में सारे कीटाणु मर जाते हैं वैसे ही सीधे प्रसारण के बाद अदालती कार्रवाही में ज्यादा जवाबदेही और पारदर्शिता आने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग (सीधा प्रसारण) से पारदर्शिता बढ़ेगी और यह ओपन कोर्ट का सही सिद्धांत होगा । फैसले में मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि अयोध्या और आरक्षण जैसे मुद्दों की लाइव स्ट्रीमिंग  नहीं होगी।  इस दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हम खुली अदालत को लागू कर रहे हैं। ये तकनीक के दिन हैं, हमें पॉजीटिव सोचना चाहिए और देखना चाहिए कि दुनिया कहां जा रही है। कोर्ट में जो सुनवाई होती है न्यूज बेबसाइटें उसे कुछ देर बाद ही बताने लगती हैं।  इसमें कोर्ट की टिप्पणी भी होती हैं। साफ है कि तकनीक उपलब्ध है, हमें इसका इस्तेमाल करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सीधे प्रसारण की मांग करने वाली कई जनहित याचिकाओं का निराकरण करते हुए दिया है। इस फैसले से पहले जब कोर्ट ने केन्द्र सरकार का पक्ष जानना चाहा तो भारत के अटार्नी जनरल ने बेंच के समक्ष कहा कि लाइव स्ट्रीमिंग पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चीफ जस्टिस की कोर्ट से शुरू हो। इसमें संवैधानिक मुद्दे और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे शामिल हों। वैवाहिक विवाद, नाबालिगों से जुड़े मामले, राष्ट्रीय सुरक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द से जुड़े मामलों की लाइव स्ट्रीमिंग न हो। लाइव स्ट्रीमिंग के लिए एक मीडिया रूम बनाया जा सकता है जिसे वादी प्रतिवादी, पत्रकार और वकील इस्तेमाल कर सकेंगे। एटार्नी जनरल के मुताबिक इससे कोर्ट में भीड़ कम की जा सकेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने जवाबदेही और पारदर्शिता का जिक्र करके इशारों में ऐसा बहुत कुछ कह दिया है जिस पर लंबे समय से बहस होती रही हैं। लंबे समय से कई स्वयंसेवी संगठन अदालती कार्रवाइयों का सीधा प्रसारण का मुद्दा उठा रहे थे। कई देशों में ऐसा सीधा प्रसारण वहां के नागरिक पहले से देख पा रहे हैं। न्यायालयों की कार्रवाही देखने का अधिकार नागरिकों को देना असल में जवाबदेह न्यायपालिका का गुण है। फक्र की बात है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए देश के नागरिकों को यह महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार दिया है। ये अधिकार पर्दे में पैदा होने वाली बुराइयों पर प्रहार करेगा।
हम सब जानते हैं अदालतों में न्याय का रास्ता वकीलों की जिरह से पाया जा सकता है। पक्ष और विपक्ष के वकील अपनी पैरवी से अपने मुवक्किल को न्यायालय के समक्ष खड़ा करते हैं। कई अहम मुद्दों पर सार्वजनिक राय कुछ अलग बन रही होती है मगर वकीलों की जिरह और सबूतों के आधार पर फैसला उस राय से अलग होता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अदालती कार्रवाई का सीधा प्रसारण देश के सवा अरब नागरिकों की सोच और समक्ष विकसित करेगा। नागरिक वे तर्क और रुलिंग खुद भी सुन सकेंगे जिनके आधार पर अदालत ने फैसला लिया है। ऐसे में अदालतें नागरिकों को अप्रत्यक्ष रुप से विधि का ज्ञान भी कराएंगी। न्याय प्रक्रिया को देखने सुनने से देश के नागरिकों के मन मस्तिष्क से वे धुंधले आवरण हटाए जा सकेंगे जो आजकल बड़े मामलों में अभियान पूर्वक सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों से आंखों पर लगाए जा रहे हैं। नागरिक पक्ष और विपक्ष के चश्मे की जगह न्याय की दृष्टि को देख सकेंगे और उसे शनै शनै अपने अंतर्मन में अपना भी सकेंगे। संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं मगर उन अधिकारों का ज्ञान दशकों से वकीलों के भरोसे देशवासियों ने कर रखा है। न्याय के लिए पक्षकारों की तरफ से लड़ना वकीलों का व्यवसाय है मगर असल कानून क्या है और उस कानून से न्याय पाने का रास्ता उस रास्ते को देख समझकर बेहतर जाना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला नागरिकों को न्याय का मार्ग और उस पर पहुंचने की प्रक्रिया के दर्शन कराता नजर आएगा। पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में न्यायपालिका का गहना साबित होगा।

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