घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी

-अनिल अनूप

घरेलू हिंसा की जड़ें हमारे समाज तथा परिवार में गहराई तक जम गई हैं.  इसे व्‍यवस्‍थागत समर्थन भी मिलता है. घरेलू हिंसा के खिलाफ यदि कोई महिला आवाज मुखर करती है तो इसका तात्‍पर्य होता है अपने समाज और परिवार में आमूलचूल परिवर्तन की बात करना.  प्राय: देखा जा रहा है कि घरेलू हिंसा के मामले दिनों-दिन बढ्ते जा रहे हैं. परिवार तथा समाज के संबंधों में व्‍याप्‍त ईर्ष्‍या, द्वेष, अहंकार, अपमान तथा विद्रोह घरेलू हिंसा के मुख्‍य कारण हैं.  परिवार में हिंसा की शिकार सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि वृद्ध और बच्‍चे भी बन जाते हैं. प्रक़ति ने महिला और पुरूष की शारीरिक संरचनाएं जिस तरह की हैं उनमें महिला हमेशा नाजुक और कमजोर रही है, वहीं हमारे देश में यह माना जाता रहा है कि पति को पत्नि पर हाथ उठाने का अधिकार शादी के बाद ही मिल जाता है.  इसी तारतम्‍य में वर्ष 2006 में भारत में घरेलू हिंसा से पीडित महिलाओं, बच्‍चों अथवा वृद्धों को कुछ राहत जरूर मिल गयी है.

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आये दिन किशोरियों-महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के तहत मारने पीटने की घटनाएं पढ़ने और सुनने को मिलती हैं.  मारने-पीटने के अलावा भी तीन तरह की और हिंसा होती हैं जिसका जिक्र कभी-कभार ही सुनने को मिलता है.

आखिर घरेलू हिंसा है क्या?

चारदीवारी के भीतर होने वाली हर हिंसा घरेलू हिंसा की श्रेणी में आती है. दो लोगों के बीच जब प्यार, सम्मान और सहानुभूति की भावना समाप्त होकर नफरत और क्रूरता में तब्दील हो जाती है तो वो घरेलू हिंसा बन जाती है.

ये शारीरिक, सेक्सुअल और व्यवहारिक तीनों ही तरह की हो सकती है. ऐसे में ये जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि घरेलू हिंसा के क्या-क्या कारण हो सकते हैं. आंकड़ों के आधार पर देखें तो घर में पद, पैसे और दूसरे भौतिक सुखों के चलते ही ज्यादातर मामले घरेलू हिंसा का रूप ले लेते हैं. कई बार बदले की भावना भी इसे जन्म देने का काम करती है.

उत्तर प्रदेश में घरेलू हिंसा पर काम कर रही ब्रेकथ्रू संस्था की स्टेट समन्वयक कृति प्रकाश बताती हैं, “हर महिला और लड़की को अपने लिए खुद आवाज़ उठानी होगी.  घरेलू हिंसा सिर्फ शादी के बाद मारपीट ही नहीं होती बल्कि अगर आपके परिजन आपको पढ़ने से रोकते हैं, आपकी मर्जी के खिलाफ शादी तय करते हैं, आपके पहनावे पर रोकटोक लगाते हैं तो ये भी घरेलू हिंसा के अंतर्गत आता है.”

घरेलू हिंसा के क्षेत्र में वर्ष 2005 से उत्तर प्रदेश के कई जिलों में काम कर रही कृति बताती हैं, ‘अगर कोई पति पत्नी की मर्जी के खिलाफ शारीरिक सम्बन्ध बनाता है तो ये भी हिंसा के अंतर्गत आता है.  ये हिंसा है ये कोई मानने को तैयार ही नहीं. महिलाओं को पता ही नहीं हैं कि उनके साथ हिंसा हो रही हैं.’

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले चार वर्षों से 2015 तक महिलाओं के खिलाफ अपराध में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है जिसमें पीड़ित महिलाओं द्वारा पति और रिश्तेदारों के खिलाफ सबसे अधिक मामले दर्ज हुए हैं.

उत्तर प्रदेश और झारखंड में महिला अधिकार के लिए कार्य करने वाली संस्था ‘आली’ की कार्यकारी निदेशक रेनू मिश्रा जो महिला अधिकार के मामलों की विशेषज्ञ हैं उनका कहना है, “अगर किसी के साथ घरेलू हिंसा होती है, जैसे खाना न देना, किसी से मिलने न देना, मायके वालों को ताना मारना, दहेज की मांग करना, चेहरे को लेकर ताना मारना, शक करना, घरेलू खर्चे उपलभ्ध न कराना जैसे तमाम मामले शामिल हैं. ” वो आगे कहती हैं, “ये सभी हिंसाएं घरेलू हिंसा क़ानून 2005 के अंतर्गत आती हैं इसके तहत महिला जिले में तैनात सुरक्षा अधिकारी के पास आईपीसी की धारा 498ए के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकती है.”

घरेलू हिंसा चार प्रकार की होती है

शारीरिक हिंसा – किसी महिला को शारीरिक पीड़ा देना जैसे मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, लात-घूसा मारना, किसी वस्तु से मारना या किसी अन्य तरीके से महिला को शारीरिक पीड़ा देना शारीरिक हिंसा के अंतर्गत आता है.

यौनिक या लैंगिक हिंसा – महिला को अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना, बलात्कार करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना इसके अंतर्गत आता है.

मौखिक और भावनात्मक हिंसा – किसी महिला या लड़की को किसी भी वजह से उसे अपमानित करना, उसके चरित्र पर दोषारोपण लगाना, शादी मर्जी के खिलाफ करना, आत्महत्या की धमकी देना, मौखिक दुर्व्यवहार करना.

आर्थिक हिंसा – बच्चों की पढ़ाई, खाना, कपड़ा आदि के लिए धन न उपलब्ध कराना, रोजगार चलाने से रोकना, महिला द्वारा कमाए जा रहे धन का हिसाब उसकी मर्जी के खिलाफ लेना.

एक सामाजिक संस्‍था द्वारा कराये गये अध्‍ययन के अनुसार भारत में लगभग पांच करोड़ महिलाओं को अपने घर में ही हिंसा का सामना करना पड़ता है. इनमें से मात्र 0.1 प्रतिशत ही हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आगे आती हैं.

घरेलू हिंसा के प्रमुख कारण

पालन-पोषण में पितृसत्‍ता अधिक महत्‍व रखती है इसलिए लड़की को कमजोर तथा लड़के को साहसी माना जाता है. लड़की स्‍वातंत्र्य व्‍यक्तित्‍व को जीवन की आरम्‍भ अवस्‍था में ही कुचल दिया जाता है. घरेलू हिंसा के प्रमुख कारण निम्‍न माने जाते हैं:-

1.  समतावादी शिक्षा व्‍यवस्‍था का अभाव

2. महिला के चरित्र पर संदेह करना

3. शराब की लत

4. इलेक्‍ट्रानिक मीडिया का दुष्‍प्रभाव

5. महिला को स्‍वावलम्‍बी बनने से रोकना

घरेलू हिंसा का दुष्‍प्रभाव

महिलाओं तथा बच्‍चों पर घरेलू हिंसा के शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्‍मक दुष्‍प्रभाव पड़ते हैं.  इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है. परिवार में आपसी रिश्‍तों और आस-पड़ौस के साथ रिश्‍तों व बच्‍चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्‍प्रभाव देखा जा सकता है.

घरेलू हिंसा के कारण देहज मृत्‍यु, हत्‍या और आत्‍महत्‍या बढ़ी हैं. वेश्‍यावृत्ति की प्रवृत्ति भी इसी कारण बढ़ी है.

महिला की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा होती है। महिलाओं का कार्य क्षमता घटती है, सा‍थ ही वह डरी-डरी भी रहती है. परिणामस्‍वरूप प्रताडि़त महिला मानसिक रोगी बन जाती है जो कभी-कभी पागलपन की हद तक पहुंच जाती है. पीडित महिला की घर में द्वितीय श्रेणी की स्थिति स्‍थापित हो जाती है.

पुलिस की भूमिका

घरेलू हिंसा के प्रकरणों में कई बार पुलिस द्वारा एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की जाती, सिर्फ रोजनामचे में लिखा जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रताडित महिलाओं को एफ.आई.आर. की नकल नहीं दी जाती. मांगने पर अकारण परेशान किया जाता हैं. आंकडे बढ़ जाएंगे इस कारण प्रकरण पंजीबद्ध करने से पुलिस बचती है.

पति द्वारा महिलाओं को पीटने अथवा मानसिक यंत्रणा देने को पुलिस बड़ा मुद्दा नहीं मानती.  अक्‍सर उसका कहाना होता है कि ‘पति ने ही तो पीटा है ऐसी क्‍या बात हो गई, पति मारता है तो प्‍यार भी करता है.‘ यह कहकर पुलिस प्रताडित महिला को टाल देती है. चूंकि महिला की शारिरिक चोट पुलिस को दिखाई नहीं देती इसलिए भी वह उसे गंभीरता से नहीं लेती.

थाने में सिर्फ एक यो दो महिला सिपाही पदस्‍थ की जाती हैं. महिला या घरेलू हिंसा से संबंधित प्रकरणों में प्राय: उनका हस्‍तक्षेप कम कर दिया जाता है, क्‍योंकि उनका अधिकारी सहित बहुमत पुलिस का है. यही कारण है कि महिला पुलिसकर्मी भी घरेलू हिंसा की शिकार महिला की ज्‍यादा मदद नहीं कर पाती हैं. कई बार तो उनका ही शोषण कर लिया जाता है.

थाना स्‍तर पर संवेदनशील लोग नहीं हैं. पुलिसकर्मी रिश्‍वत लेकर प्रताडित महिला को समझौते के लिए विवश करते हैं अथवा प्रकरण को कमजोर कर देते हैं. पुलिस का कहना होता है कि दहेज तथा घरेलू हिंसा के झूठे प्रकरण ही अधिक होते हैं.

डाकन, नाता आदि मानसिक यंत्रणाओं के मुद्दे पर पुलिस असंवेदनशील है. पुलिस का कहना है कि यह सामाजिक मुद्दा है, पुलिस का नहीं.

98, मामले में पुलिस बिना किसी प्रशिक्षित पारिवारिक परामर्शदाता के सलाह देती है अथवा समझौता करा देती है.  न तो इस समझौते में घटना का ब्‍यौरा होता है और न ही पति द्वारा यह लिखाया जाता है कि भविष्‍य में वह ऐसा नहीं करेगा.

महिलाओं को अधिकारों की सुरक्षा को अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दशक (1975-85) के दौरान एक पृथक पहचान मिली थी. सन् 1979 में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में इसे अंतर्राष्‍ट्रीय कानून का रूप दिया गया था. विश्‍व के अधिकांश देशों में पुरूष प्रधान समाज है. पुरूष प्रधान समाज में सत्‍ता पुरूषों के हाथ में रहने के कारण सदैव ही पुरूषों ने महिलाओं को दोयम दर्जे का स्‍थान दिया है.  यही कारण है कि पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं के प्रति अपराध, कम महत्‍व देने तथा उनका शोषण करने की भावना बलवती रही है. ईरान, अफगानिस्‍तान की तरह अमेरिका जैसे विकासशील देश में भी महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्‍यवहार किया जाता है. अमेरिका में एक नियम है, जिसके अनुसार महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्‍यवहार किया जाता है. अमेरिका में एक नियम है, जिसके अनुसार यदि एक परिवार में मॉं और बेटा है तो वे एक ही शयन कक्ष के मकान के हकदार होंगे.  इससे स्‍पष्‍ट है कि अमेरिका जैसे देश में भी महिलाओं के प्रति भेदभाव किया जाता है. दुनिया के सबसे अधिक शक्तिशाली व उन्‍नत राष्‍ट्र होने के बावजूद अमेरिका में अनेक क्षेत्रों में महिलाओं को पुरूषों के समान अधिकार प्राप्‍त नहीं हैं.

महिलाओं को अधिकारों की सुरक्षा को अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दशक (1975-85) के दौरान एक पृथक पहचान मिली थी. सन् 1979 में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में इसे अंतर्राष्‍ट्रीय कानून का रूप दिया गया था.  विश्‍व के अधिकांश देशों में पुरूष प्रधान समाज है. पुरूष प्रधान समाज में सत्‍ता पुरूषों के हाथ में रहने के कारण सदैव ही उन्होंने महिलाओं को दोयम दर्जे का स्‍थान दिया है. यही कारण है कि पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं के प्रति अपराध, कम महत्‍व देने तथा उनका शोषण करने की भावना बलवती रही है.

क्या कहता है कानून

वर्ष 2006 में बने इस कानून से भारत में घरेलू हिंसा से महिलाओं को कुछ राहत मिली है. घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 उसे घरेलू हिंसा के विरूद्ध संरक्षण और सहायता का अधिकार प्रदान करता है.

यह भारत में पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को अपने घर में रहने का अधिकार देता है. घरेलू हिंसा विरोधी कानून के तहत पत्नी या फिर बिना विवाह किसी पुरुष के साथ रह रही महिला मारपीट, यौन शोषण, आर्थिक शोषण या फिर अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल की परिस्थिति में कार्रवाई कर सकती है.

ये अधिनियम मुख्य रूप से पति, पुरुष लिव इन पार्टनर या रिश्तेदारों द्वारा एक पत्नी, एक महिला लिव इन पार्टनर या फिर घर में रह रही किसी भी महिला जैसे मां या बहन पर की गई घरेलू हिंसा से सुरक्षा करने के लिए बनाया गया है.

घरेलू हिंसा एक अपराध है पर बावजूद इसके इससे जुड़े ज्यादातर मामले सामने आ ही नहीं पाते हैं. कई बार घर-परिवार के डर से तो कई बार समाज में इज्जत खोने के डर से लोग इसे जाहिर नहीं होने देते हैं. ऐसे में पीड़ित प्रता‍ड़ित होता रहता है और पीड़ा देने वाला अपनी बर्बरता करता रहता है.

रिलेशनशिप से जुड़े मामलों के विशेषज्ञों की मानें तो बीते कुछ समय में इस तरह के मामलों में काफी तेजी आई है. विशेषज्ञ मानते हैं कि पार्टनर्स के बीच आपसी भरोसे और प्यार के खत्म हो जाने से ही चीजें इस मुकाम पर पहुंच जाती हैं.

घरेलू हिंसा के प्रभाव:

घरेलू हिंसा के प्रभावों का जिक्र करने से पहले ये बात समझ लेना बहुत जरूरी है कि परिवार समाज की इकाई है और अगर परिवार में कलह है तो इसका सीधा असर समाज पर पड़ेगा.ज्यादातर मामलों में महिलाएं ही घरेलू हिंसा की श‍िकार होती हैं लेकिन ऐसा नहीं है पुरुष वर्ग इससे अछूता है.

घरेलू हिंसा का शिकार हुआ शख्स कभी भी अपने डर से बाहर नहीं आ पाता है. अगर किसी शख्स ने अपने जीवन में घरेलू हिंसा झेली है तो उसके लिए इस डर से बाहर आ पाना बेहद मुश्क‍िल होता है. लगातार हिंसा का शिकार होने के बाद उसकी सोच में नकारात्मकता इस कदर हावी हो जाती है कि उसे अपने को स्थिर करने में सालों लग जाते हैं.

मानसिक आघात इंसान को भीतर से तोड़कर रख देता है. घरेलू हिंसा का एक सबसे बुरा पहलू ये है कि इसका पीड़ित मानसिक आघात से बाहर नहीं आ पाता है. ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि लोग या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं या फिर अवसाद का शिकार हो जाते हैं.

ये एक ऐसा दर्द है जिसकी दवा शायद ही किसी के पास हो . ऐसे मामले जिनमें शारीरिक यातना भी शामिल है, पीड़ित को बेइंतहा दर्द सहना पड़ता है. कई मामलों में शारीरिक असमर्थता की भी स्थिति आ जाती है या फिर कोई अंग ही काम करना बंद कर देता है. इसके साथ ही कुछ चोटें ऐसी होती हैं जो जानलेवा भी साबित हो जाती हैं.

मनोरोग की स्थिति में पहुंच जाता है पीड़ित. घरेलू हिंसा का ये सबसे खतरनाक और दुखद पहलू है. जिन लोगों पर हम इतना भरोसा करते हैं और जिनके साथ रहते हैं जब वही अपने इस तरह का दुख देते हैं तो इंसान का रिश्तों पर से भरोसा उठ जाता है और वो खुद को अकेला बना लेता है. वो कहीं न कहीं ये तय कर लेता है कि इस दुनिया में उसका कोई नहीं और उसे अपने सहारे ही रहना होगा. कई बार इस स्थिति में लोग आतमहत्या भी कर लेते हैं.

ऐसे में ये बेहद जरूरी है कि न तो घरेलू हिंसा को बढ़ावा दें और न ही उसके शिकार बनें. किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा, हिंसा ही है और उसके खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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