टंट्या मामा को सलामी देने आज भी ट्रेन के पहिये थम जाते हैं

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मनोज कुमार
स्वाधीनता के सात दशक बाद भी किसी योद्धा को सलामी देने के लिए गुजरने वाले ट्रेन के पहिये कुछ समय के लिए थम जाए, यह जानकर मन रोमांचित हो जाता है। यह शायद उन लोगों के लिए एक पहेली के समान भी हो जिन्होंने किताबों में तो स्वाधीनता संग्राम का इतिहास पढ़ा है लेकिन इतिहास आज भी लिखा जा रहा है, यह अपने किस्म का अलग अनुभव है। लेकिन सच है कि अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने वाले जनजाति वीर योद्धा टंट्या मामा की वीरता को सलाम करने के लिए पातालपानी रेल्वे स्टेशन से गुजरने वाली हर रेलगाड़ी के पहिये कुछ समय के लिए आज भी थम जाता है। जनपदीय लोक नायकों का स्मरण तो हम समय-समय पर करते हैं लेकिन वीर योद्धा टंट्या मामा को प्रतिदिन स्मरण करने का यह सिलसिला कभी थमा नहीं, कभी रूका नहीं। अब जब हम आजादी के 75वां वर्ष का उत्सव मना रहे हैं तब ऐसे अनेक प्रसंग से हमारी नयी पीढ़ी को रूबरू कराने का स्वर्णिम अवसर है। मध्यप्रदेश ऐसे जाने-अनजाने सभी वीर योद्धाओं का स्मरण कर आजादी के 75वें वर्ष को यादगार बना रहा है।
स्वाधीनता का 75वां वर्ष पूरे राष्ट्र का उत्सव है। एक ऐसा उत्सव जो हर पल इस बात का स्मरण कराता है कि ये रणबांकुरे नहीं होते तो हम भी नहीं होते। गुलामों की तरह हम मरते-जीते रहते लेकिन दूरदर्शी लोकनायकों ने इस बात को समझ लिया था और स्वयं की परवाह किये बिना भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हमारा इतिहास ऐसे वीर ही नायकों की कथाओं से लिखा गया है। इतिहास का हर हर्फ हमें गर्व से भर देता है कि हम उस देश के वासी हैं जहां अपने देश के लिए मर-मिटने वालों का पूरा समाज है। ऐसे वीर नायकों का स्मरण करते हुए हम पाते हैं कि स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय समाज के वीर नायकों की भूमिका बड़ी है लेकिन जाने-अनजाने उन्हें समाज के समक्ष लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। आजादी के इस 75वें वर्ष में देश ऐसे ही वीर नायकों का स्मरण कर रहा है। कोई भी वीर शहीद किसी भी क्षेत्र या राज्य का हो लेकिन उसकी पहचान एक भारतीय की रही है। बिरसा मुंंडा से लेकर टंट्या भील हों या गुंडाधूर। इन सारे वीर जवानों ने कुर्बानी दी तो भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए। यह सुखद प्रसंग है कि देश का ह्दय प्रदेश कहे जाने वाला मध्यप्रदेश ऐसे सभी चिंहित और गुमनाम जनजाति समाज के वीर योद्धाओं को प्रणाम कर उन्हें स्मरण कर रहा है। मध्यप्रदेश की कोशिश है कि नयी पीढ़ी ना केवल अपने स्वाधीनता के इतिहास को जाने बल्कि अनाम शहीदों के बारे में भी अपनी जानकारी पुख्ता करे। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश शासन द्वारा विद्रोही कहा गया है और उन्हें अपराधी भी साबित करने की कोशिश की गई है और इन्हीं गलत तथ्यों को सुधारने का समय आ गया है।
बिरसा मुंडा का जन्मोत्सव के बाद ट्ंटया भील जो समाज के लिए टंट्या मामा हैं, का स्मरण किया जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान आजादी के इस 75वें वर्ष को जनजाति योद्धाओं को समर्पित करते हुए दिखते हैं। मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि वह एक राष्ट्र की चर्चा कर रहा है। बिरसा मुंडा के स्मरण से जो यात्रा आरंभ हुई है, वह सिलसिला आगे बढ़ेगा। यह महज संयोग है कि महज 20 दिनों के अंतराल में देश के दो महान योद्धा का स्मरण करने का अवसर हमें मिला है। बिरसा मुंडा के बाद 4 दिसम्बर को जननायक टंट्या मामा के बलिदान दिवस पर हम सब स्मरण कर रहे हैं। यह उल्लेख करना भी गर्व का विषय है कि अविभाजित मध्यप्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में ऐसे वीर शहीदों की लम्बी सूची है जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम को स्वर्णिम बनाया।
‘इंडियन रॉबिन हुड’ के नाम से चर्चित टंट्या मामा की वीरता की कहानी का कालखंड है 1878 से लेकर 1889 का जब अंग्रेजों ने उन्हें एक अपराधी के रूप में प्रचारित किया। टंट्या को उन क्रांतिकारियों में से एक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने 12 साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था। रिपोर्टों में कहा गया है कि वह ब्रिटिश सरकार के खजाने और उनके अनुयायियों की संपत्ति को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने के लिए लूटता था। इन आंदोलनों से बहुत पहले आदिवासी समुदायों और तांत्या भील जैसे क्रांतिकारी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। वह आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बन गए। लगभग एक सौ बीस साल पहले तांत्या भील जनता के एक महान नायक के रूप में उभरा और तब से भील जनजाति का एक गौरव बन चुका है। उन्होंने अदम्य साहस, असाधारण चपलता और आयोजन कौशल का प्रतीक बनाया। टंट्या भील का वास्तविक नाम तांतिया था, जिन्हे प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था। उल्लेखनीय है कि टंट्या भील की गिरफ्तारी की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स के 10 नवंबर 1889 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। इस समाचार में उन्हें ‘भारत के रॉबिन हुड’ के रूप में वर्णित किया गया था।
इतिहासकारों के अनुसार खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन् 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ था। कहते हैं कि टंट्या का मतलब झगड़ा या संघर्ष होता है और टंट्या के पिता ने उन्हें ये नाम दिया था, क्योंकि वे आदिवासी समाज पर हो रहे जुल्म का बदला लेने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। बचपन में ही तीर कमान, लाठी और गोफल चलाने में पारंगत हो चुके टंट्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही जमींदारी प्रथा के खिलाफ अंग्रेजों से लोहा लेना शुरु कर दिया था। इंडियन रॉबिनहुड टंट्या भील, जिन्होंने अंग्रजों के छक्के छुड़ा दिए थे। सन् 1870 से 1880 के दशक में तब के मध्य प्रांत और बंबई प्रेसीडेंसी में टंट्या भील ने 1700 गांवों में अंग्रेजों के खिलाफ समानांतर सरकार चलाई थी। तब महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने टंट्या से प्रभावित होकर उन्हें छापामार शैली में हमला बोलने की गौरिल्ला युद्धकला सिखाई थी। इसके बाद टंट्या ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। जनश्रुति के अनुसार मान्यता थी कि मामा टंट्या के राज में कोई आदिवासी भूखा नहीं सो सकता। टंट्या से मुंह की खा रहे अंग्रेजों को टंट्या से लडऩे के लिए ब्रिटिश सेना की खास टुकड़ी भारत बुलानी पड़ी थी। हालांकि टंट्या को ब्रिटिश सेना ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया था।
इतिहासकारों के अनुसार 11 अगस्त सन् 1889 को रक्षाबंधन के दिन जब टंट्या अपनी मुंहबोली बहन से मिलने पहुंचे थे तो उसके पति गणपतसिंह ने मुखबिरी कर उन्हें पकड़वा दिया था। जबलपुर में अंग्रेजी सेशन कोर्ट ने 19 अक्टूबर को टंट्या को फांसी की सजा सुना दी थी। उन्हें 4 दिसम्बर 1889 को फांसी दी गई। ब्रिटिश सरकार भील विद्रोह के टूटने से डरी हुई थी। आमतौर पर यह माना जाता है कि उसे फांसी के बाद इंदौर के पास खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया गया था। जिस स्थान पर उनके लकड़ी के पुतले रखे गए थे, वह स्थान तांत्या मामा की समाधि मानी जाती है। आज भी सभी ट्रेन टंट्या मामा के सम्मान में ट्रेन को एक पल के लिए रोक देते हैं।
ऐसे वीर जवानों के लिए कृतज्ञ मध्यप्रदेश उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयासरत है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को घोषणा की है कि इंदौर में पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर टंट्या भील के नाम पर रखा जाएगा। साथ ही इंदौर बस स्टैंड का नाम टंट्या मामा के नाम पर रखा जाएगा। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि हर आयु वर्ग के लोगों को यह स्मरण आता रहे कि हमें आजादी दिलाने के लिए ऐसे महान योद्धाओं ने अपने जीवन का उत्र्सग किया। टंट्या मामा जैसे सभी वीर योद्धाओं को हम नमन करते हैं।

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मनोज कुमार
सन् उन्नीस सौ पैंसठ के अक्टूबर माह की सात तारीख को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्म। शिक्षा रायपुर में। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर लगातार अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मे पुस्तकाकार में प्रकाशन। हॉल ही में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा संचालित आठ सामुदायिक रेडियो के राज्य समन्यक पद से मुक्त.

1 COMMENT

  1. dhanyad aap sabhi bndhuo ka ham sab ko itni mahatwapurn jankari dene ke liye… padne ke bad garv se sina chauda ho gya.

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