‘यज्ञ करने से परमात्मा की पूर्ण भक्ति हो जाती हैः डॉ. महेश विद्यालंकार’

-मनमोहन कुमार आर्य

गुरुकुल गौतमनगर दिल्ली का वार्षिकोत्सव एवं चतुर्वेद पारायण यज्ञ रविवार दिनांक 16-12-2018 को सोत्साह सम्पन्न हुआ। वेद पारायण यज्ञ के ब्रह्मा प्रसिद्ध वैदिक विद्वान डॉ. महावीर अग्रवाल थे। इस अवसर चतुर्वेद पारायण यज्ञ की पूर्णाहुति होने सहित अनेक विद्वानों के प्रवचन हुए। तीन विद्वानों का सम्मान भी किया गया। इस लेख में हम स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती, डॉ. महेश विद्यालंकार एवं दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान श्री धर्मपाल आर्य जी के व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे हैं।

आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश के यशस्वी मंत्री स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी का उपदेश

स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी ने कहा कि यज्ञ करने से हमारा परिवार, देश व समाज उन्नति को प्राप्त होगा। उन्होंने एक बस का उदाहरण दिया जो मार्ग में यात्रियों को जल पीने के लिए कहीं रुकती है। लोग वहां पास में एक हैण्ड पम्प के पास जाकर पानी पीकर अपनी पिपासा शान्त करते हैं। बस का ही एक युवक यात्री हैण्ड पम्प को चलाता है और सब यात्रियों को पानी पिलाता है। उस युवक की बस के सभी यात्री प्रशंसा करते हैं। स्वामी जी ने कहा कि उस युवक का न कोई धन खर्च हुआ न समय। इस पर भी उसने बहुत लोगों का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। उसने जो पुण्य कार्य किया वह उसके जीवन की सम्पदा बन गई।

                स्वामी धर्मेश्वरानन्द जी ने भारतीय सेना के सेवानिवृत ड्राइवर का प्रसंग भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि यह ड्राइवर मेरठ से एटा के बीच रोडवेज की बस चलाता था। इसके मन में विचार आया कि यह निर्धन ब्रह्मचारियों को छात्रवृत्ति देकर गुरुकुल में पढ़ा सकते हैं। इन्होंने अपने संकल्प को पूरा किया और कई छात्रों को विद्वान बनाया। यह स्वयं भी अष्टाध्यायी पढ़ते थे। लोग पूछते थे कि बड़ी आयु में अष्टाध्यायी पढ़ने से आपको क्या लाभ है? यह उन्हें कहते थे कि अगले जन्म के लिये संस्कार लेकर जाऊंगा। स्वामी जी ने कहा कि वृद्धावस्था में अष्टाध्यायी का अध्ययन करने से यह लाभ होता है। इन ड्राइवर महाशय का नाम संन्यास लेने के बाद स्वामी त्यागानन्द हुआ। स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी ने बताया कि स्वामी रामदेव जी के गुरु आचार्य प्रद्युम्न जी इन स्वामी त्यागानन्द जी के ही दान से पढ़े हैं। ऐसे पवित्र भाव से मनुष्य समाज व देश का कल्याण करता है।

                स्वामी धर्मेश्वरानन्द जी ने गुरुकुलों को दान देने की प्रेरणा की और कहा कि इससे आपको पुण्य प्राप्त होगा। उन्होंने कहा कि स्वामी जी देश भर में 9 गुरुकुल संचालित कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि गुरुकुलों के प्रति प्रेम समर्पण भाव स्वामी प्रणवानन्द जी में उनके पूर्वजन्मों का संस्कार है। स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती पहले आचार्य हरिदेव थे। वर्तमान में आप भारत के सभी वैदिक वा आर्यसमाज के गुरुकुलों की परिषद के अध्यक्ष हैं। देश के सारे गुरुकुल इनके व स्वामी जी सभी गुरुकुलों के हो गये हैं। इससे हम सब का सौभाग्य बढ़ा है। स्वामी धर्मेश्वरानन्द ने गुरुकुल में 8 व 9 दिसम्बर, 2018 को आयोजित देश के सभी गुरुकुलों की एक शास्त्र ज्ञान की प्रतियोगिता की भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि इस प्रतियोगिता में 35 गुरुकुलों ने भाग लिया। यह प्रतियोगिता स्वामी प्रणवानन्द जी के आशीर्वाद से सफल रही। स्वामी प्रणवानन्द जी हमारे लिये ऊर्जा के स्रोत हैं। हमें विश्वास है कि आपका सहयोग एवं मार्गदर्शन हमें प्राप्त होता रहेगा। आपके नेतृत्व में गुरुकुल की परम्परा पूरे देश में फैलेगी। आपके प्रयासों व सहयोग से कृण्वन्तो विश्वमार्यम् साकार किया जायेगा। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए स्वामी धर्मेश्वरानन्द जी ने आयोजन में उपस्थित सभी लोगों का धन्यवाद किया।

आर्य विद्वान डॉ. महेश विद्यालंकार जी का सम्बोधन

प्रसिद्ध आर्य विद्वान एवं व्याख्यान कला के मर्मज्ञ डा. महेश विद्यालंकार जी ने कहा कि जिस स्थान पर अच्छे विद्वानों का आना-जाना हो तथा जहां जाने पर अच्छे वैदिक विद्वान मिलते हों वह स्थान तीर्थ बन जाता है। उन्होंने कहा कि यज्ञ का वास्तविक स्वरूप आर्यसमाज व इसकी गुरुकुल आदि संस्थाओं में देखने को मिलता है। महर्षि दयानन्द जी ने यज्ञ का वास्तविक स्वरुप बताया है। यज्ञ की महिमा अपरम्पार है। भारत की संस्कृति यज्ञीय संस्कृति है। दुनियां में आपको यज्ञ कहीं देखने को नहीं मिलेगा। जो यज्ञ करता है उसके यज्ञ से परमात्मा की पूर्ण भक्ति हो जाती है। दुनियां के सभी श्रेष्ठ भलाई के काम यज्ञ हैं। विद्वान वक्ता ने यज्ञ से जुड़ी छोटी छोटी बातों को बताया। यदि कोई व्यक्ति किसी भूले मनुष्य को सही रास्ता बताता है तो यह भी यज्ञ होता है। यदि हमारे पास 100 ग्राम घृत हो और इसे हमें एक ही स्थान पर सैकड़ों या हजारों व्यक्तियों में वितरित करना पड़े तो ऐसा करना सम्भव नहीं है, परन्तु यही कार्य अग्निहोत्र-यज्ञ करके आसानी से हो जाता है। इसका लाभ सभी मनुष्यों को मिल जाता है। यज्ञ करने से तन व मन के सभी रोग दूर होते हैं। यज्ञ करने से सतोगुण जाग्रत होता है। यज्ञ को करने से हमारा तन, मन व आत्मा पवित्र होता है। विद्वान वक्ता ने कहा कि आर्यसमाज का दूसरा नाम गुरुकुल है। आर्यसमाज को पुरोहित, वैदिक विद्वान, प्रचारक तथा भजनोपदेशक आदि गुरुकुलों से ही प्राप्त होंगे। डॉ. महेश विद्यालंकार ने कहा कि गुरुकुलों की रक्षा करना हम सब आर्यों का पुनीत कर्तव्य है।

                आर्य विद्वान डॉ. महेश विद्यालंकार ने कहा कि कुछ व्यक्ति वेद पढ़े हुए नहीं होते परन्तु वह चाहें तो दूसरों को वेद पढ़ा सकते हैं। इसके लिये उन्हें गुरुकुलों में पढ़ने वाले निर्धन मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियां प्रदान करनी होंगी। ऐसा करने से निर्धन व्यक्ति विद्वान बनेंगे जिसका कुछ पुण्य अपना धन देकर पढ़ाने वाले व्यक्ति को भी प्राप्त होगा। डॉ. महेश विद्यालंकार जी ने स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी के कार्यों की प्रशंसा की। उन्होंने मंच पर उपस्थित आर्यसमाज के विख्यात भजनोपदेशक एवं गीतकार पं. सत्यपाल पथिक जी की भी प्रशंसा की। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए उन्होंने देश व समाज में यज्ञ की भावना को बढ़ाने का आह्वान किया।

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली के प्रधान श्री धर्मपाल आर्य का सम्बोधन

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा के यशस्वी प्रधान श्री धर्मपाल आर्य जी ने अपने सम्बोधन में अग्निहोत्र-यज्ञ की चर्चा की। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द ने 16 आहुतियों के देवयज्ञ को महायज्ञ कहा है। विद्वान वक्ता ने महर्षि दयानन्द जी की सूझ-बूझ की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यदि किसी इलाके के सभी लोग दैनिक यज्ञ करें तो यह महायज्ञ हो जाता है। केवल एक परिवार द्वारा यज्ञ करने की अपेक्षा यदि किसी मुहल्ले या नगर के सभी व अधिकांश परिवारों द्वारा एक ही समय में यज्ञ होता है तो यह महायज्ञ हो जाता है। यज्ञ करने से निर्मित वायुमण्डल का लाभ दूर-दूर तक सहस्रों मित्र व अमित्र सभी लोगों को होता है। श्री आर्य ने बताया कि मुरादाबाद के एक विद्वान ने यज्ञ की आलोचना करते हुए कहा कि यज्ञ में लोग लकड़ी फूंकते हैं जिससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। श्री आर्य ने बताया कि वहां के जिलाधीश ने इस विषय में कहा कि यज्ञ एक धार्मिक कृत्य है, इस कारण वह यज्ञ करने वालों के विरुद्ध दखल नहीं दे सकते। श्री आर्य नेयज्ञ विरोधी ऐसे लोगों से श्रोताओं को सावधान किया। श्री धर्मपाल आर्य जी ने कहा कि दिल्ली सभा ने यज्ञ पर अनुसंधान के लिये बड़ा बजट आबंटित किया और यज्ञ पर वैज्ञानिकों से अनुसंधान कार्य कराया है। वैज्ञानिकों ने अपने आधुनिक उपकरणों के द्वारा यज्ञ से उत्पन्न गैसों व वायु का अध्ययन किया है। उन्होंने कहा कि देशी गाय के दूध से बना घृत ही घृत होता है। वैद्यक ग्रन्थों में गोघृत को ही घृत कहा गया है। अनेक पशुओं के दुग्ध से बना पदार्थ घृत न होकर चिकनाई कहलाता है। घृत केवल देशी गाय के दुग्ध से बने घृत को ही कहते हैं। इस गोघृत से यज्ञ करने पर यज्ञ से जो परिणाम प्राप्त हुए हैं वह पर्यावरण वा वायुमण्डल का सुधार करने वाले व प्रदुषण दूर करने वाले हैं। दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा ने सभा से जुड़े वैज्ञानिक व डाक्टरों की टीम बनाई है जो यज्ञ से वायु मण्डल पर प्रभाव का अध्ययन करेगी। उन्होंने बताया कि भारत सरकार के मंत्रालय के अधिकारियों ने भी यज्ञ के वायुमण्डल पर प्रभाव विषयक अध्ययन में सहयोग करने का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि देश के सभी नगर वायु प्रदुषण से प्रभावित हैं। विद्वान वक्ता ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा व वायुमण्डल की शुद्धि का एकमात्र समाधान व निदान अग्निहोत्र यज्ञ ही है। उन्होंने यह भी कहा कि यज्ञ की रक्षा आर्यसमाज तथा गुरुकुल के ब्रह्मचारियों द्वारा ही हो सकती है। श्री धर्मपाल आर्य जी ने गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली को इक्यावन हजार रुपये की धनराशि भी दान दी। इसके बाद स्वामी प्रणवानन्द जी ने दान में प्राप्त हुई धनराशि की घोषणा की। उत्सव में डा. रघुवीर वेदालंकार, ठाकुर विक्रम सिंह जी, श्री वीरपाल जी, डॉ. धर्मेन्द्र शास्त्री, डॉ. आनन्द कुमार एवं डॉ. अशोक चौहान, एमिटी यूनिवर्सिटी आदि के उद्बोधन भी हुए। इस हम एक अन्य किश्त में प्रस्तुत करेंगे।

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