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    राहत इन्दौरी : विवादों के साथ विदाई

    उर्दू शायरी के चर्चित शायर डॉ.राहत इन्दौरी की असयम मृत्यु से उनके लाखों चाहने वालों को गहरा धक्का लगा है | कोरोना संक्रमण और हार्टअटैक दोनों एक साथ काल बन कर आये और हिन्दी-उर्दू मंचों  की वाचिक परंपरा के एक बड़े शायर को हमसे असमय छीन ले गए | डॉ.राहत उन विरले शायरों में गिने जा सकते हैं जिन्हें उर्दू मुशायरों और हिन्दी कविसम्मेलनों में समान रूप से पूरी धूम-धाम के साथ   सुना जाता था | इतना ही नहीं इस पीढ़ी के वे एकमात्र ऐसे शायर थे  जिनकी शायरी का मजा प्रत्येक उम्र के लोग एक साथ ले सकते थे, यही कारण है कि लगभग सभी संयोजक राहत साहब को बुलाने के लिए अन्य शायरों की तुलना में बहुत अधिक मानदेय देने को तत्पर रहते थे | वे अपने समय के सबसे मँहगे शायरों में भी गिने जा सकते हैं | आप चाहें तो इन्दौरी जी  से असहमत हो सकते पर उन्हें ख़ारिज नहीं कर सकते | जैसा उन्होंने सोचा वैसा ही लिखा और जैसा लिखा उसे वैसा का वैसा  ही पढ़ा आप कह सकते हैं – बिना एडिट किये हुए |  इस कारण उन्हें कई कवि सम्मेलनों से हाथ भी धोने पड़े, क्यों कि भारतीय जनमानस आज भी यह सोचता और मानता है कि कवि, शायर, साहित्यकारों अर्थात कलाकारों का कोई धर्म, जाति संप्रदाय नहीं होता | वे  इन बंधनों से मुक्त होकर सोच सकते हैं ,समाज को नई दिशा दे सकते हैं सौहार्द, समन्वय का  का मार्ग दिखा सकते हैं | पर राहत जैसे थे वैसे ही थे उन्होंने इस स्थापित धारणा को अस्वीकार किया | वे उन व्यक्तित्वों में से थे जो अपने लिए किसी भी लेकिन, किन्तु, परन्तु के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ते | वे एक विचारधारा या धर्म विशेष के पक्ष में थे और जीवन भर रहे | उन्होंने स्वयं मंच से कई बार स्पष्ट  घोषणा की “मैं जितना कट्टर हिदुस्तानी हूँ उतना ही कट्टर मुसलमान भी हूँ |”

    गोधरा में कारसेवकों को जिन्दा जलाए जाने की घटना पर उन्होंने अपने मजहवी -भाइयों का खुलकर बचाव किया उनके पक्ष में यह शेर पढ़ा-

    जिनका मसलक़ है रोशनी का सफर वह चरागों को क्यों जलाएंगे,

     वह जो अपने मुर्दों को भी नहीं जलाते वो जिंदो को क्या जलाएंगे ।

    ये बात अलग है कि बाद में न्यायालय ने गोधरा में ट्रेन में लोगों को जिन्दा जलाने वालों को सजाएँ दीं कुछ को तो आजीवन कारावास भी हुआ |

    उनके चाहने वालों को इस बात का भी दुःख रहेगा कि वे अपनी प्रतिभा से मानवता का पथ प्रदर्शित करने वाली महान रचनाओं को या तो रच नहीं सके या रची भीं तो उन्हें जनता तक पहुँचा नहीं पाए | वे एक धर्म,एक पक्ष के होकर ही जिए | उनकी रचनाओं में जहाँ-जहाँ  दिन्दुस्तान पर गर्व किया गया है,”मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना” वह महात्मा गाँधी का हिंदुस्तान न होकर मुग़ल कालीन हिंदुस्तान है जिसके सुलतान/शासक  मुसलमान हैं और वे स्वयं को प्राचीन भारतीय पूर्वजों के स्थान पर मुगलों से जोड़ कर रचानाएँ लिखते थे | “हमारे ताज अजायब घरों में रक्खे हैं |” पर उनका प्रस्तुतीकरण इतना मोहक और प्रभावी  था कि जिन पंक्तियों में  में हिन्दुओं के लिए अप्रिय और धमकी भरी बातें (अबके जो फ़ैसला होगा वो यहीं पर होगा) होती थीं हिन्दू नौजवान उनका अर्थ समझे बिना ही उनपर तालियाँ बजाते रहते थे | 

    अटल बिहारी बाजपेयी जी जैसे सर्वमान्य प्रधान मंत्री पर भी वे अपने स्वभाव के अनुरूप हल्के शेर और टिप्पणियाँ पढ़ते रहे |

    आईना गर्द-गर्द कैसा है रंग चेहरे का ज़र्द कैसा है,

     काम घुटनों से जब लिया ही नहीं फिर ये घुटनों में दर्द कैसा है |

    देश के एक महान राजनेता के लिए ये शेर और वह भी तब जब वे अस्पताल में उपचार करा रहे थे | राहत  भाजपा की राजनीतिक सफलता को इस्लाम और मुसलमानों के हितों से जोड़कर देखते रहे और धीरे-धीरे उनका लेखन उसी दिशा में रूढ़ हो गया | भाजपा वाले स्वयं को धर्म निरपेक्ष दिखाने के लिए तो विरोधी मजे लेने के लिए  उन्हें मंच देते गए और राहत अधिक  तीखे एवं  लोकप्रिय होते गए,किन्तु  इस लोकप्रियता के लिए उन्होंने क्या खोया ? इसका विवेचन  तो इतिसाहकार ही करेंगे  |

    उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत होने पर, सरकार बनने से पहले ही उन्होंने एक शेर ट्वीट किया-

    लहू में भीगी हुई, आस्तीन जीत गई ।
    चुनाव हार गए सब, मशीन जीत गई ।।
     इस शेर  के कारण कितने ही कवि सम्मेलनों के संयोजकों को अपमान का जहर पीना पड़ा | कितने ही उनके चाहने वाले जो भाजपा को वोट देकर आये थे उनमें मुसलमान भी थे इस शेर से बहुत दुखी हुए | वे चाहते तो अन्य शब्दों और प्रतीकों से भी अपनी बात कह सकते थे पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ वे अपने बारे में किसी भी भ्रम के लिए कोई अवकाश नहीं छोड़ते थे |

    कारण कुछ भी रहे हों किन्तु उनकी शायरी धीरे-धीरे मानवता की चिंता से सिमट कर मुसलमानों की चिंता तक आगई | इसके लिए हमारे देश के मुशायरों का विषाक्त वातावरण भी कम दोषी नहीं है कोई भी नवोदित राहत पहुँचे उसे भारत से बाहर इस्लामिक देशों की रागात्मत्कता में प्रवृत्त किया ही जाता है | वहाँ भारत को लेकर,हिन्दुओं को लेकर और भारतीय धर्म-संस्कृति  को लेकर जिस प्रकार का विष वमन होता है उससे बचकर निकल पाना बड़ा कठिन है|  रही-सही कसर पकिस्तान में होने वाले मुशायरे पूरी कर देते हैं | जो पकिस्तान के विरुद्ध शायरी लिखेगा उसे दुबई, पाकिस्तान में होने वाले मुशायरों में भला कौन बुलाएगा | सच तो यह है कि उसे भारत के मुशायरों में बुलाए जाने के भी लाले पड़ जाएँगें | राहत भाई भी इन्ही मुशायरों के हीरो थे और यहीं से वे हिन्दी मंचों पर लोक प्रिय हुए अतः वैसी बातें उनकी शायरी में आ जाना स्वाभाविक ही था  | इसीलिये भारत पाकिस्तान के मध्य कश्मीर विवाद पर,पीओके और कारगिल तक के युद्ध पर कभी भी वे पाकिस्तान के विरूद्ध खुल कर नहीं बोल पाए | वे सदैव इसे चुनाव के लिए लड़ा जाने वाला युद्द कहकर मजे लेते रहे और दोनों देशों के नेताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाकर मध्यम मार्गी बने रहे –

    सरहदों पर बहुत तनाव है क्या,
    कुछ पता तो करो चुनाव है क्या |

    दो वर्ष पूर्व डाल्टन गंज (पलामू ) के कविसम्मेलन में जब मैंने पाकिस्तान पर कविता पढ़ी तब उन्होंने मुझे बड़े प्यार से  संबोधित करते हुए- ऐ भाई, उपाध्याय सुनो, और यही शेर पढ़ा | मंच के कवियों से उनेक संबंध उत्साह पूर्ण एवं  मैत्री-भाव वाले ही रहे | हिन्दी मंचों  और कवियों ने भी उन्हें भरपूर सम्मान दिया पर हिन्दी भाषा को लेकर भी वे बड़े कठोर थे अंत तक कठोर ही बने रहे | “ ये आदरणीय फादरणीय क्या होता है यहाँ लोग हिन्दी सुनने नहीं आते “ वाले डायलोग को लेकर भी कुछ लोग उनकी आलोचना करते हैं | पर हिन्दी के किसी भी कवि ने उनका हिन्दी मंच पर इस बात के लिए कभी विरोध नहीं किया यह एक बड़ी बात है | आज उनके असमय निधन से उनसे प्रीति रखने वाले लाखों मन दुखी हैं | किन्तु खिन्नता इस बात की भी है कि पिछले दिनों एक और मुस्लिम कलाकार (अभिनेता) इरफान खान साहब की मृत्यु हुई तब  मुसलमानों से अधिक शोक हिन्दुओं ने प्रकट किया ! राहत भाई भी एक कलाकार थे,पर उतनी गरिमा, सम्मान और प्यार उन्हें नहीं मिल पा रहा | इस से भी अधिक खेद इस बात का है कि सोशल मीडया पर  प्रतिक्रियावादी नई पीढ़ी उनके शेर – “किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है | “ को लेकर बहुत ही उत्तेजना पूर्ण प्रतिक्रियाएँ दे रही है  | कोई लिख रहा है – जो कौम  को मुल्क से बड़ा समझे अच्छा इन्सान थोड़ी है | कोई लिख रहा है- …. रोने लायक इंसान थोड़ी है | इसी प्रकार- “एक नए खौफ का जंगल है मेरे चारों तरफ, अब मुझे शेर नहीं गाय से डर लगता है |” को लेकर भी बहुत तीखी प्रतिक्रियाएँ लिखी जा रही हैं | यद्यपि ये  टिप्पणियाँ नई नहीं है अधिकांश सभी राहत भाई के सामने ही उनके ट्विटर पर लम्बे समय  से रिप्लाई में लिखी जा रहीं हैं | किन्तु फिर भी  हमें  यह समझना चाहिए कि किसी भी दिवंगत आत्मा को लेकर इस प्रकार की त्वरित टिप्पणियाँ भारतीय परंपरा और  संस्कारो के अनुरूप नहीं हैं | भले ही राहत साहब का झुकाव धर्म विशेष की ओर ही रहा किन्तु सोशल मीडिया पर एक दिवंगत कलाकार  के प्रति इस प्रकार की टिप्पणियों से कम-से-कम अभी तो बचा जाना चाहिए | इसमें कोई संदेह नहीं राहत भाई एक वर्ग विशेष में अपने युग के बहुत ही लोक प्रिय शायर थे उनके द्वारा लिखी गई कविताएँ एवं फ़िल्मी गीत सदैव उनकी याद दिलाते रहेंगे और उद्धृत भी किये जाते रहेंगे |

    डॉ. रामकिशोर उपाध्याय

    डॉ.रामकिशोर उपाध्याय
    डॉ.रामकिशोर उपाध्याय
    स्वतंत्र टिप्पणीकार

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