व्यवसाय

लेखक -कुमार विमल

समाज में अपंनी धाक ज़माने की चाह अधिकांश लोगों में होती है। आजकल तो शिक्षा भी धाक जमाने की ही साधन भर रह गई है। कई लोगो के लिए अच्छी शिक्षा का अर्थ कोई रौबदार नौकरी जैसे डी.एम , एसपी इत्यादि है। कोई धन से , कोई पद से तो कोई बल से अपनी इस इच्छा की पूर्ति करता है। जैसे धर्म अनेक है पर लक्ष्य एक ही है वैसे ही साधन अनेक है पर लक्ष्य एक धाक जमाना है।
निर्मल बाबू धन से इस चाह की पूर्ति करने वाले व्यक्ति थे। वे धन का प्रदर्शन कर समाज में अपनी धाक जमाये हुए थे। महंगी गाड़ी में घूमते,आलीशान भवन में रहते , महंगी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का उपयोग करते, कहीं जाते तो कहते कि बिना ऐ.सी. के उन्हें दिक्क्त होती है। लोगो को उन्होंने धन के प्रदर्शन से वशीभूत सा कर दिया था। लोग उन्हें हसरत भरी निगाहों से देखते, उनकी चर्चा करते,उनसे मिलकर अपने आप को भाग्यवान समझते। निर्मल बाबू धन के प्रदर्शन के प्रतिफल स्वरुप समाज में महत्व पाते।
निर्मल बाबू गाड़ियों के विक्रेता थे, शहर के बीचो-बीच उनका एक भव्य शोरूम था । सलाना करोडो की आमदनी थी। ऐसे धनवान व्यक्ति के अगर लोग कद्रदान हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं ! परिवार में पत्नी के अतरिक्त एक पुत्र था। पुत्र का नाम राजकिशोर था । निर्मल बाबू ने उसे बड़े नाजो से पाला था। उसकी हर इच्छाओं को पूरा करना अपना धर्म समझते थे। उसके लिए खिलौने लाते, दाइयाँ रखते, शहर की महंगी स्कूल में भेजते। पुत्र को सम्पन्त्ता विरासत में मिली थी।
समय बीतता गया ,राजकिशोर बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश किये। कॉलेज के शिक्षा के लिए पिता ने राजकिशोर को इंग्लैंड भेजा। वहाँ के नामी मैनेजमेंट विश्वविद्यालय में उनका दाखिला हुआ । पुत्र की विदेश शिक्षा पिता के लिए अपनी अमीरी दिखाने का एक और साधन सिद्ध हुआ। वह अक्सर अपनी मित्र मंडली में अपने पुत्र की विदेश शिक्षा की चर्चा करते,पुत्र द्वारा भेजे गये फोटो को फेसबुक पर साझा करते, बताते की लाखो-लाख तो केवल साल की फीस है उस पर हॉस्टल फीस अलग से कुल मिलकर लगभग करोड़ का खर्च है, लोग श्रद्धा से उनकी बातों को सुनते। राजकिशोर की विदेश शिक्षा शहर में चर्चा की विषय रहती। इन चर्चाओं से पिता को गर्व होता।
लगभग चार वर्षो के बाद राजकिशोर शिक्षा ग्रहण कर वापस भारत लौटे। पिता अक्सर अपने मित्रों अथवा सम्बन्धियों से उसे मिलाते और उसके विदेश शिक्षा के बारे में लोगो को बताते। शादी- ब्याह के अवसर का तो वो भरपूर उपयोग करते, पुत्र को अपने मित्रों से मिलाते और गर्व से कहते मेरे बेटे ने इंग्लैंड से मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की है। पुत्र की विदेश शिक्षा निर्मल बाबू की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाती।
धीरे-धीरे राजकिशोर भी व्यापर में अपने पिता का हाँथ बटाने लगा। पिता के साथ वह भी शोरूम जाता,व्यापर में उन्हें सलाह देता। निर्मल बाबू को अब अपने पुराने कर्मचारियों की जगह अपने पुत्र की सलाह ज्यादा तर्कसंगत लगती।अपने कर्मचारियों की सलाह को नजरअंदाज कर वे अपने पुत्र की बात को मानते। उन्हें लगता विदेश से शिक्षा ग्रहण किये हुए उनके पुत्र के समक्ष इन कर्मचारियों के सलाह का क्या महत्व?
उत्तर भारत की शादियों में दहेज़ का काफी प्रचलन है। दहेज़ लेना शान की बात है और अगर लड़का सरकारी नौकरी में है तो पूछो ही मत। आजकल तो सरकारी नौकरी वाले लड़के के लिए एक चार-चक्का गाड़ी पक्का मानो। लड़की वाले आर्थिक रूप से मजबूत और स्थाई कमाई वाले लड़के के लिये ललाईत रहते है फलस्वरूप ऐसे लड़को का परिवार मोटी दहेज की माँग करता है। दहेज़ समाज का एक कलंक है जिसे समाज गर्व से अपने माथे पर लगाए हुए है।
हर साल लगन के समय गाड़ियों की बिक्री में काफी बढ़ोतरी होती। निर्मल बाबू को लगन के समय करोडो की कमाई होती फिर लगन समाप्त होते ही बिक्री में कमी आती व्यापर सामान्य हो जाता। यह चक्र हर वर्ष चलता। इस वर्ष भी यही हुआ लगन आई कमाई बेतहासा बढ़ी फिर लगन उतरते ही सामान्य हो गई। पिता लगन के उपरान्त कमाई घटने पर भी हर साल की तरह निश्चिन्त थे,उनके लिए यह हर साल की तरह ही था लेकिन पुत्र चिन्त्तित,कमाई का घटना उसके लिए चिंता का विषय था वह विचारमग्न रहता। लगन न होने पर भी कमाई कैसे बढ़ाई जाये जाये इसके लिए उक्ति तलाशता। काफी सोच विचार करने पर उसे एक उक्ति सुझी।
अगले दिन पिता शोरूम में निश्चिन्त बैठे थे, पास बैठे कर्मचारी गप्पे कर रहे थे। लगन भर उन लोगो को चैन न था, पुरे लगन देर दस बजे रात तक काम किया था इन कर्मचारियों ने। इस समय काम कम था। अतः सभी निश्चिंत से थे। अचानक राजकिशोर ने गंभीर भाव में पास बैठे पिता से कहा -“डैडी आजकल व्यपार में कमी आ गई है।”पिता ने निश्चिन्तता से कहा -“हाँ अभी लगन नहीं है,अगली लगन में व्यापर में तेजी आयेगी यह तो हर साल की बात है।” यह हर साल की बात है, सोचकर जो आप इस मंदी को नजरअंदाज करते है यही तो भूल है डैडी , हर साल, हर साल कहने के बजाये सेल्स बढ़ाने के लिए हमें कोई मार्केटिंग स्ट्रेटेजी सोचना होगा”राजकिशोर ने थोड़ा आक्रोश से कहा। पिता ने असमंजस भरी निगाहों से पुत्र को देखा और कहा -“ये मार्केटिंग स्ट्रेटेजी क्या होती है बेटा?” बेटे ने अंगरेजी में, विचारक की तरह पिता से कहा ” It is an overall plan to achieve the maximum profit.”पिता को कुछ समझ तो ना आया पर पुत्र की बातों से गर्व की अनुभूति हुई। पिता ने उत्साह से कहा बेटा मैं ठहरा गावँ का पढ़ा लिखा, मैं तुम्हारे बराबर थोड़े ही जानता हूँ , मुझे ये सब कहाँ समझ में आती है, अतः तुम्हे जो समझ आता हो वह करो।
पिता की स्वीकृति मिल जाने के बाद राजकिशोर अपने मार्केटिंग स्ट्रेटेजी को क्रियान्वित करने में तत्परता से लग गये। उन्होंने सोचा कि पहले उन्हें अपने शोरूम के मार्केटिंग पर ध्यान देना होगा। शोरूम को प्रचारित करने हेतु शोरूम के आस पास लोगो की आवाजाही बढ़ानी होगी। काफी सोच विचार करने के उपरांत उन्हें एक तरकीब सोची उन्होंने सोचा क्यों न एक हाथी शोरूम के आगे बाँध दिया जाये , आने जाने वाले लोग एक नजर हाथी को देखने के लिये रुकेंगे जिसके कारण उनके शोरूम के आस पास भीड़ एकत्रित होगी और उनका शोरूम प्रचारित होगा। अतः इस बार के सोनपुर के पशु मेले से वे एक हाथी खरीद लायें। हाथी काफी आकर्षक था, भीमकाय शरीर,लम्बी सूड़,सफेद चमकते दाँत,मदमस्त चाल देखने से प्रतीत होता कि साक्षात भगवान गजानन का अवतार हों। शोरूम के आगे उन्होंने एक फूस की झोपड़ीनूमा सरंचना का निर्माण करवाया और इसी में गजराज का निवास बनाया गया। जैसे इत्र की खुशबु ध्यान आकृष्ट कर लेती है वैसे ही गजराज के आकर्षण से वशीभूत हो लोग गजराज को निहारते रहते नतीजन अब शोरूम के के आगे भीड़ रहती। मार्केटिंग की उनका यह तरकीब काम कर गईं , शोरूम के प्रचार प्रसार में वृद्धि होने लगी फलस्वरूप लगन न होने के बावजुद बिक्री में इजाफा हुईं,लगन के बराबर फायदा तो न हुई पर फायदे में दृष्टिगोचर वृद्धि हुई। पिता फायदे से ज्यादा पुत्र की काबिलियत से खुश थे, उन्हें लगता विदेश की शिक्षा काम आ गई। गर्व से पिता की छाती चौड़ी हो गई। उन्हें लगा यही समय है व्यवसाय का भार शिक्षित पुत्र को सौंप कार्यनिवृत हो जाया जाये। अतः निर्मल बाबू एक दिन व्यवसाय का सारा भार पुत्र को सपुर्द कर स्वयं गाँव चले गयें।
फायदा की चाह एक ऐसी प्यास है जिसकी तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती। राजकिशोर पर फायदा का भूत सा चढ़ा था हर समय सोचते रहते कैसे और अधिक फायदा प्राप्त किया जाये। कुछ ही दिनों के बाद उन्हें लगने लगा की फायदे का ग्राफ जिस तेजी से आरम्भ में बढ़ा था अब उसमे वह तेजी न रही और फायदे में कुछ स्थिरता सी आ गई है। कभी सोच विचार करने के उपरान्त उन्हें लगा की उनके व्यवसाय का ऑपरेटिंग कॉस्ट ज्यादा है अगर वे ऑपरेटिंग कॉस्ट को कुछ काम कर दें तो एक तरह से यह भी एक फायदा है। काफी गहन चिंतन के बाद राजकिशोर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पुराने कर्मचारियों को दी जाने वाली वेतन ज्यादा है उनके बदले नए लड़को को अगर नियुक्त किया जाये तो वे कम वेतन पर ही काम करने को राजी हो जायेंगे। इस तरह से ऑपरेटिंग कॉस्ट काफी काम हो जायेगी। एकाएक पुराने कर्मचारियों की छटनी कर दी गई, उनके जगह नए लड़को की नियुक्ति हुई, बेरोजगारी के कारण वो कम वेतन पर काम करने को तैयार हो गयें। वे कर्मचारी जो व्यवसाय के प्रसार के लिए कभी पसीना बहाये थे आज सड़क पर थे। प्राइवेट रोजगार की यही अस्थिरता लोगो को सरकारी नौकरी के लिए ललाईत करती है।
व्यवसाय में ग्राहकों के साथ मैत्रीपूर्ण विश्वासजनक सम्बन्ध का बड़ा महत्व है। मैत्रीपूर्ण विश्वसनीय सम्बन्ध वह पाश है जिससे ग्राहक बंधा रहता है। इसके आभाव में व्यवसाय फलीभूत नहीं होता। पुराने कर्मचारी ग्राहकों के लिए विश्वसनीय चहरे थे। राजकिशोर जो व्यवसाय में नए थे अभी ग्राहकों में विश्वसनीय चेहरा न बन पायें थे। अतः पुराने कर्मचारियों के एकाएक चले जाने से उनसे बंधे ग्राहक अब टूटने लगे। व्यवसाय धीरे धीरे मंद होने लगी। इधर मौका देख शहर के ही एक नेता ने अपने एक शोरूम का उद्घाटन कर दिया। पुराने कर्मचारियों को उसने हाँथो-हाँथ लिया। नतीजन उनसे बंधे हुए ग्राहक अब नेता जी के शोरूम से जुड़ने लगे। राजकिशोर जी का बाजार में स्थापित अधिपत्य अब समाप्त होने लगा। बाजार के प्रतियोगिता के लिए अभी वे तैयार न थे, प्रतियोगी बाजार में वे अब पिछडने लगें। उनका व्यवसाय और मंद होता गया। फायदे का मार्जिन घटने लगा। राजकिशोर चिंतित रहने लगे। हर समय फायदे में कमी का कारण ढूंढ़ने में खोये रहते। आर्थिक संकट अपने साथ – साथ कलह भी लाती है। अब राजकिशोर अकसरहाँ बिना किसी विशेष कारण के भी कर्मचारियों को फटकारते। ऐ.सी. की हवा उन्हें फिजूलखर्च लगती। अब हाथी के आहार पर की जाने वाली खर्च उन्हें पैसो की बर्बादी लगती। एक दिन उन्होंने अपने कर्मचारी को कह ही दिया -“यह पेटू हाथी व्यर्थ ही पड़ा-पड़ा ढाई मन आहार खाता है,खा-खा कर मोटा हुआ जाता है,इस आलसी हाथी का आहार कल से कम कर दों।” हाथी का आहार पहले से आधी हो गई पर कुछ दिनों के बीतने के बाद भी हाथी के भीमकाय शरीर पर कोई दृष्टिगोचर अंतर न पड़ा। हाथी के भीमकाय शरीर में कोई अंतर न देख राजकिशोर को लगा कि वह व्यर्थ ही हाथी की आहार पर इतना ज्यादा खर्च किया करता था इसके लिए तो आधी भोजन भी काफी है ! क्यों न इसके आहार को और आधा कर दिया जाये। अब हाथी के आहार को पहले से लगभग एक चौथाई कर दी गई। कुछ दिनों के बीतते ही हाथी के भीमकाय शरीर में अंतर दिखने लगा, चहरे की आभा घटने लगी, भीमकाय शरीर सिकुड़ने लगा,चाल मंथर होने लगी लगा जैसे भगवान गजानन रूठ कर विदा हो गए। गजराज का आकर्षण विलुप्त हो गया।
इधर व्यवसाय धीरे-धीरे फायदे के बजाय नुकसान में बदलने लगा। हालात यह हो गई कि अबकी ग्रीष्म के लगन में भी व्यवसाय हानि में ही रहा। एक दिन राजकिशोर चिन्तावस्था में शोरूम में बैठे थे बाहर गर्म हवाएँ चल रही थी। अचानक बाहर से धड़ाम की आवाज हुई, राजकशोर दौड़ कर बाहर की ओर भागे,पीछे -पीछे कर्मचारी भी भागा। बाहर देंखे तो आवाक रह गए सामने गजराज भूमि पर मूर्छित गिरा पड़ा है, दौड़ कर हाथी के करीब पहुँचे , हाथी के मुँख पर पानी छिटी गई पर हाय ! वह न उठ सका। हाथी का कमजोर शरीर ग्रीष्म की गर्म हवाएँ ना सह सका।
तमाम प्रयत्नों के बावजुद भी हानि बाढ़ की पानी की तरह बढ़ता ही रहा। स्थिति को भाप कर्मचारी इधर-उधर काम तलासने लगे और धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ने लगें।
समय बीत चूका है। कोट- टाई लगा कंधे पर लैपटॉप लिये हुए एक सज्जन बाइक पर सवार हो तेजी से कहीं जा रहें है। वे शहर के एक आलिशान घर के समीप अपनी गाड़ी रोकते है। घर के गेट पर लिखा है कुत्ते से सावधान। सज्जन गेट खटखटाते है। पास बैठा गॉर्ड गेट के करीब आकर पूछता है -“क्या बात है किनसे मिलना है ” सज्जन विनम्र भाव में कहते है मैं नेता जी के शोरूम का सेल्स मैनेजर हूँ मुझे आपके मालिक से मिलना है ” गार्ड ने झुँझला कर कहाँ -“वे अभी किसी से नहीं मिलते है। ” सज्जन -“एक बार पूछने की कृपा करे मैंने कॉल कर उनसे समय लिया है।” इतने में घर के मालिक वहाँ आ गए गार्ड ने सलाम कर मालिक से कहाँ – ”“”””ये श्रीमान आपसे मिलना चाहते है।” सज्जन ने उत्सुकता से कहाँ -” सर आई ऍम राजकिशोर, मैं नेता जी के शोरूम का सेल्स मैनेजर हूँ, मैं आपको गाड़ियों के कुछ नय मॉडल के बारे में जानकारी देना चाहता हूँ। इतना कह सेल्स मैनेजर राजकिशोर ने बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये तुरंत बैग से लॅपटॉप निकाल कर प्रेजेंटेशन देने लगें । घर के मालिक ने कुछ देर ध्यान से सुना
फिर बीच में ही रोकते हुए कहाँ-” राजकिशोर जी मुझे ये मॉडल पसंद नहीं। ” कोई बात नहीं सर अभी और भी मॉडल है”इतना कह राजकिशोर ने लैपटॉप में स्लाइड्स को बदला चाहा पर घर के मालिक ने थोड़ा क्रुद्ध भाव में कहा -“कहा ना पसंद नहीं है ” राजकिशोर मुस्कुराते हुए लैपटॉप को बंद किये और बैग में रख थैंक्स कह बाइक पर सवार हो चल दिए।

कुमार विमल

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