संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य परमेश्वर व उसकी रचनायें हैः आचार्या प्रियम्वदा वेदभारती

 

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून का शरदुत्सव आज सोल्लास आरम्भ हो गया। साधको को प्रातः 5.00 बजे से 6.00 बजे तक योग साधना कराई गई। प्रातः 6.30 बजे सन्ध्या हुई और इसके बाद ऋग्वेद के मन्त्रों से यज्ञ आरम्भ हुआ। मंच पर यज्ञ की ब्रह्मा विदुषी आचार्य डा. प्रियम्वदा वेदभारती, मंत्रोच्चार हेतु उनके गुरुकुल की पांच ब्रह्मचारिणियां सहित स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती, आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध गीतकार एवं गायक पं. सत्यपाल पथिक जी, पं. सूरत राम शर्मा आदि उपस्थित थे। मंच के पास व साथ ही पं. शैलेन्द्र मुनि सत्यार्थी, श्री सुशील भाटिया जी, आश्रम के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी और भजनोपदेशक श्री रूहेल सिंह जी विराजमान थे। ऋग्वेद के मन्त्रों का पाठ करते हुए उसकी समाप्ती पर आचार्या जी अपने कुछ विचार भी प्रस्तुत करती थी। उन्होंने कहा कि ईश्वर ही संसार में उपासना के लिए चुनने योग्य है। उन्होंने याज्ञिकों एवं साधकां को कहा कि यज्ञ करते हुए अहकार मत करना। यज्ञ में आहुतियां देने से ब्रह्माण्ड और सुन्दर हो जायेगा। ऐसा करने पर ही मनुष्य व आप ईश्वर के श्रेष्ठ पुत्र कहलाओगे। आचार्या जी ने कहा कि जो यज्ञ की भावना को अपने अंग अंग में समा लेते हैं वह पाप वा बुरे कामों में प्रवृत्त नहीं होते। आप सब लोग यज्ञ कर्म में अवश्य ही प्रवृत्त रहें। हमारी सन्तानें भी यज्ञ कर्म को करने वाली हों। एक सूक्त के अन्त में आचार्या जी ने कहा कि संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य परमेश्वर व उसकी रचनायें हैं। आश्चर्य यह है कि कैसे उस परमेश्वर ने रचना की? विचित्र विचित्र रचनायें करने के कारण ही वेदों में उसे ‘चित्र’ कहा गया है। ईश्वर महान है। वैज्ञानिक भी उसे जानने में हार जातें हैं। हम पर सदा शासन करने के कारण परमेश्वर हमारा राजा है। उसकी सभी देने हमारे लिए विशेष हैं। उन्होंने कहा कि अमरूद के एक पेड़ से हजारों अमरूद के पेड़ उत्पन्न कर सकते हैं। परमात्मा को उन्होंने अनन्त दानी बताया। बादल के जल के समान परमात्मा अपना दान सभी पर बरसा रहे हैं।

 

विदुषी आचार्या प्रियम्वदा वेदभारती जी ने कहा कि ईश्वर के ज्ञान की अनन्तता है हमारी यह सृष्टि। हमें सब कुछ देने वाला वह परमात्मा ही है। परमात्मा अद्भुद है। हम चाहें भी तो उसके शासन से बाहर नहीं जा सकते। इसका उदाहरण देते हुए स्वामी दयानन्द जी के साथ उदयपुर में घटी घटना को आपने प्रस्तुत किया जिसमें राजा द्वारा प्रलोभन देने पर स्वामी दयानन्द जी ने उसे कहा था कि तुम्हारा राज तो सीमित है, एक दौड़ लगाऊंगा तो उससे बाहर चला जाऊंगा, परन्तु ईश्वर की अवज्ञा करके मैं उससे बाहर कैसे जा सकूंगा। यज्ञ की समाप्ती पर यज्ञ की प्रार्थना की गई जिसे आर्य भजनोपदेशक श्री पथिक जी ने हारमोनियम के साथ गाकर प्रस्तुत किया। इससे पूर्व यज्ञ में उपस्थित दो व्यक्तियों के जन्मदिवस होने के कारण विशेष आहुतियां भी दी गईं। यज्ञ प्रार्थना के बाद पथिक जी ने स्वलिखित भजन प्रस्तुत किया। भजन के बोल थे ‘श्रेष्ठ धन देना ओ दाता श्रेष्ठ धन देना। जिसमें चिन्तन और मनन हो ऐसा मन देना।। बल बुद्धि उत्साह बढावें वेद ज्ञान को पाकर। कर्म करें कर्तव्य समझ कर फल की चाह मिटाकर।। अति उज्जवल अति पावन प्रेरक चाल चलन देना। ओ दाता श्रेष्ठ धन देना।।’

 

भजन के बाद आचार्या प्रियम्वदा वेदभारती जी का श्राद्ध पर प्रवचन हुआ। उन्होंने कहा कि हमारे सनातनी भाई मानते हैं कि श्राद्ध व पितर रक्ष में मृतक पितर अपने परिवारों में आते हैं और भोजन खाकर उनको आशीर्वाद देकर लौट जाते हैं। विदुषी आचार्या ने कहा कि यदि हम सनातनी पण्डितों की बातों पर विश्वास करेंगे तो उनके तो घर भर जायेंगे परन्तु हमारा धन हमारे पितरों के पास कदापि नहीं पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि पौराणिकों के मृतक पितरों से सम्बन्धित कथन अव्यवहारिक एवं अविवेकपूर्ण हैं। उन्होंने दर्श मास में प्राचीन समय में यह प्रार्थना प्रसिद्ध थी कि गृहस्थी जन अपने पितरों का ध्यान रखें और उनकी सेवा प्रतिदिन करें। उन्होंने कहा कि पितरों की सेवा वर्ष भर करनी है अन्यथा पितर दुःखी होंगे। आचार्या जी ने कहा कि आशीर्वाद तो जीवित माता पिता अपनी सन्तानों द्वारा सेवा करने पर देते हैं। उन्होंने कहा कि वर्षा ऋतु में काम शिथिल हो जाता है। पुराने समय से वर्षाऋतु में चौमासे में पितर व विद्वदजन वनों में स्थित आश्रमों से नगरों के पास आ जाते थे और वहां ग्रामीण नागरिकों को वेदोपदेश देते थे। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को उनको अन्तिम विदाई दी जाती थी। वह पुनः नगरों व ग्रामों से वनों में स्थित अपने आश्रमों में लौट जाते थे। अमावस्या पर उनका विसर्जन कर देते थे और वह हमारी सेवा से सन्तुष्ट होकर हमें आशीर्वाद देकर अपने आश्रमों में लौट जाते थे।

 

स्वास्थ्य की चर्चा कर विदुषी आचार्या जी ने कहा कि श्रावण व भाद्रपद मासों में दही व उससे निर्मित पदार्थों का किसी भी रूप में सेवन नहीं करना चाहिये। इन मासों में वायु प्रकुपित होती है। इसका सेवन से रोग का भय होता है। आचार्या जी ने यज्ञ प्रेमी साधकों को ऋतु के अनुकूल भोजन करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि श्रावण और भाद्रपद मास में रात्रि समय में कम मात्रा में खिचड़ी आदि का सेवन करना चाहिये। अन्य भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिये। उन्होंने कहा कि ऐसा कहा गया है कि भाद्रपद मास में रात्रि समय में केवल दूध ही लेना चाहिये। ऐसा करने से आपका स्वास्थ्य उत्तम होगा। उन्होंने कहा कि आश्विन महीने में 15 दिन खीर व माल पूवे बनावें और खावें इससे हानि नहीं होती। इससे आपका स्वास्थ्य उन्नत होगा। उन्होंने कहा कि खीर में नारीयल को घिसकर अवश्य डालना चाहिये। इससे अधिक लाभ होगा। उन्होंने दोहराया कि प्राचीन समय में आश्विन मास की अमावस्या को जीवित पितरों की विदाई हुआ करती थी। भाद्रपद के अन्तिम पक्ष के 15 दिन ऐसा भोजन करें कि वायु शान्त हो जाये और आप स्वस्थ रहें। उन्होंने कहा कि मृतक श्राद्ध करने वाले भी केवल तीन पीढ़ियों का ही श्राद्ध करते हैं। इसका कारण है कि तीन से अधिक पीढ़ियां जीवित ही नहीं रहती। इससे भी सिद्ध होता है कि श्राद्ध जीवित पितरों का ही किया जाता है। इसके बाद यजमानों को आशीर्वाद देने की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। इसके बाद ध्वजारोहण हुआ जिसमें आश्रम में पधारे सभी साधक व विद्वान सम्मिलित हुए। पूर्वान्ह 10.00 बजे यज्ञशाला में गायत्री यज्ञ हुआ और सत्संग भवन में अन्य लोगों ने भजन व प्रवचनों का आनन्द लिया। ओ३म् शम्।

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