लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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30पत्नी नहीं है वह

पर

स्वेछा से करती है

अपना सर्वस्व न्यौछावर

 

 

एक अपार्टमेन्ट की बीसवीं मंजिल पर

है उनका एक छोटा सा आशियाना

घर को सुंदर रखने के लिए

रहती है वह

हर पल संघर्षरत 

 

पुरुष मित्र के लिए

नदी

बन जाती है वह

और समेट लेती है अपने अंदर

उसके सारे दु:ख – दर्द

 

 

घर से बहुत दुर है वह

फिर भी

एकाकीपन से नहीं है खौफ़ज़दा

पुरुष मित्र, कम्प्यूटर और कैरियर में

तलाशती रहती है

अपने जीवन की खुशी

 

 

उसका मकसद है

अपने पसंदीदा

जीवन साथी की तलाश

ताकि दु:ख का साया

उसे छू तक न सके

 

 

 

 

घड़ी की सूई

फिसल रही है

आगे की ओर

 

 

हर दुल्हन में

देख रही है

वह अपनी छवि

 

 

पर अतृप्त कुंवारी कामना

हर बार रह जाती है अतृप्त

 

 

दिल में है हाहाकार

पर होठों पर है हंसी।

3 Responses to “सहजीवन”

  1. rakesh upadhyay

    क्या खूब लिखा है आपने, कायल कर दिया आपने..

    Reply
  2. पंकज झा

    पंकज झा.

    ओह्ह्ह रुला दिया आपने तो…..लेकिन थोड़ा समझाइये उस बच्ची को कि….सूरज के हमसफ़र जो बने हो तो सोच लो, इस रास्ते में रेत का दरिया भी आएगा…आज ही एक बहुत वरिष्ठ पत्रकार बता रहे थे कि अन्य देश और भारत में एक ही फर्क है कि भारत में “घर” भी होता है….किसी पुरुष से ज्यादा इस घर को बचाने की जिम्मेदारी ऐसे बालिकाओं की है…..वो अखते हैं ना कि सांप तो बस सांप है, काटे नहीं तो क्या करे…हम ना क्यू अपनी नज़र आस्तीनों पर रक्खे???

    Reply

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