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    Homeसाहित्‍यव्यंग्यसुवा घणा ए आच्छया सै, तै अपणै नै लगवा ले...

    सुवा घणा ए आच्छया सै, तै अपणै नै लगवा ले…

    सुशील कुमार ‘नवीन’

    एक बच्चे को उसके माता-पिता बीमार होने पर अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने बच्चे का चेकअप किया। चेकअप में बुखार ज्यादा दिखने पर डॉक्टर ने कहा-इंजेक्शन लगाना पड़ेगा। जल्दी असर हो जाएगा। बच्चे की माता जी बोली-डॉक्टर साहब!इंजेक्शन तो मुन्ना मरे भी न लगवाए। धक्का किया तो अस्पताल अधर उठा लेगा। आपकी क्या चीज टूटेगी क्या बचेगी,राम जाने। डॉक्टर भी पूरा कॉन्फिडेंस वाला था। बोला-आप चिंता न करें। बच्चों को टेकल करना मुझे आता है। इससे पहले मैं बच्चों के अस्पताल में ही था। ऐसे में बच्चे कैसे मानते हैं मुझे सब पता है। आप बस थोड़ा बाहर बैठ जाइए। अब डॉक्टर और बच्चा आमने-सामने की मुद्रा में थे। डॉक्टर चेहरे पर मोहनी मुस्कान धारण किये हुये थे। उधर,बच्चा इसे नजरअंदाज कर अपने ही मूड में था। डॉक्टर ने नाम पूछा तो तपाक उतर दिया। नाम को छोड़ो इलाज करो। आप मेरी मैडम थोड़े हो, जो आपको नाम बताउं। डॉक्टर जवाब से सकपका सा गया पर निर्लज्ज हो फिर दूसरा सवाल दाग दिया। बोलो बेटा जी! आप कैसे हैं। बच्चा फिर गुर्राते हुए बोला- दिख नहीं रहा,  बीमार हूं। तुम पॉपकॉर्न बेचने वाले थोड़े ही हो,जो तुमसे पॉपकॉर्न लेने आया हूं। तुम से तो मैं पॉपकॉर्न लूंगा भी नहीं। डॉक्टर भी पूरा ढीठ था। हार वो भी मानने वाला नहीं था। बोला-बेटा जी, आप तो समझदार दिख रहे हो। आपके बुखार है, इंजेक्शन लगाना पड़ेगा। लगवा लोगे ना। बच्चा झट से बोला-क्यों ऐसा क्या है उसमें। मैं नहीं करवाता अपने दर्द। 

    डॉक्टर ने उसे बहलाने का प्रयास जारी रखा। बोले-बेटा, इंजेक्शन फायदे की चीज है। सेकंडों में बीमारी पर असर करता है। दर्द बिल्कुल भी नहीं करता। चींटी के कांटे में भी दर्द हो सकता है पर इंजेक्शन लगने में दर्द नहीं होगा। ठंडा-ठंडा महसूस होगा जैसे बर्फ की वादियों में आ गए हो। एक बार लगवाकर देखो, मजा ना आये तो मुझे कहना। डॉक्टर ने हें-हें कर नकली हंसी शुरू कर दी। 

    बच्चा भी जोर से हंसने लगा। गम्भीर मुद्रा में बोला-डॉक्टर साहब, बच्चा हूं, पागल नहीं। जब इंजेक्शन लगवाने में इतने ही मजे हैं तो मेरे ही क्यों लगाने पर तुला है। अपने ही लगा ले। ठंडा-ठंडा भी महसूस कर लेना और सारे मजे भी खुद ही ले लेना। मुझे तो टेबलेट और पीने की दवाई दे दे। यही काफी रहेगी मेरे लिए। इंजेक्शन तुम्हे ही मुबारक। अब डॉक्टर को कोई जवाब देते नहीं बना। चुपचाप पर्ची पर कुछ टेबलेट और पीने की दवा लिख दी। बच्चा बाहर आया तो मम्मी ने कहा-बेटा इंजेक्शन में दर्द नहीं हुआ। बच्चा बोला-इंजेक्शन तो मैं डॉक्टर साहब के लगा आया। दर्द तो उनके होगा मेरे थोड़े ही। 

    आप भी सोचते होंगे ये ‘नवीन जी’ भी अजीब किस्म के आदमी है। बात शुरू कहां से करते हैं और खत्म कहां पर।  उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र, और हिमाचल प्रदेश के बाद हरियाणा भी पंचायत चुनाव में ‘राइट टू रिकॉल’ (वापस बुलाने का अधिकार) लागू करने जा रहा है। एक वर्ष बाद ग्रामसभा सरपंच को बदलवा सकेगी। नियम का लागू होना एक अच्छी पहल है पर क्या इसे धरातल पर लागू किया जा सकेगा। उत्तर प्रदेश में राईट टू रिकॉल 1947 से और मध्य प्रदेश में सन 2000 से है लेकिन कानून की जानकारी के अभाव में इसका प्रयोग बहुत कम हुआ है | सब परिचित है आज के समय में राजनीतिक हस्तक्षेप हर जगह है। इस कानून के प्रयोग में भी यही आड़े आएगा। तो क्या हो। अपनी भाषा में इंजेक्शन में इतना ही अगर फायदा है तो माननीय इसे पहले विधानसभा और लोकसभा स्तर पर क्यों नहीं लागू करते। जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा तो यही करते हैं। वोट रामलाल के नाम पर मांगते हैं जीतने के बाद स्वार्थसिद्धि के लिए श्यामलाल का चोगा थाम लेते हैं। सरपंच तो भाईचारे का ही एक प्रतिनिधि होता है। काम न करे तो उसे भाईचारे में समझाया भी जा सकता है। भाईचारे की ही ये ताकत है कि इस कानून का प्रयोग पंचायत स्तर पर ग्रामीणों द्वारा नहीं किया गया है।एमएलए-एमपी के लिए उमीदवार तो पैराशूट से उतार दिए जाते हैं,मतदाताओं को मजबूरन बाहरी को ही समर्थन देना पड़ता है। यहां इसे लागू करवाएं। देखना लोग पूरा प्रयोग करेंगे। आपने इंजेक्शन बना लिया है तो जनता को पहले बड़ी नेतागिरी पर प्रयोग की छूट दें, देखना सब क्लेश काट देंगे।

    सुशील कुमार नवीन
    सुशील कुमार नवीन
    लेखक दैनिक भास्कर के पूर्व मुख्य उप सम्पादक हैं। पत्रकारिता में 20वर्ष का अनुभव है। वर्तमान में स्वतन्त्र लेखन और शिक्षण कार्य में जुटे हुए हैं।

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