हे भाय! तेरे से अच्छा मेरा वाद ?

                      प्रभुनाथ शुक्ल ?

आजकल अपन के मुलुक में वादियों का जमाना है। साहब! वादी तो वादी ही हैं। वह चाहे विचारवादी हों या अलगाववादी। काफी हाउस से लेकर शहर के टी-स्टालों और अखबार की सुर्खियों में बस एक ही चर्चा है। वह है वादियों की। वादियों की नई-नई जमात पैदा हो रही हैै। अब देखिए न! आजकल अपने बौद्धिकता वादियों में भी आजादी वादियों की नई नस्ल पैदा हो गई है, जो टुकड़े-टुकड़े वादियों का समर्थन करती है। वादियों की जमात ने अपनी वादी को आतंक और अलगावाद में झोंक दिया है। जिसकी वजह से अपनी कुदरतवादी, नरकवादी बन गई है। नतीजा वादियों के अलगाववादी आजकल जेलवादी हो गए हैं। कोई राष्ट्रवादी है तो कोई वामवादी। कोई समाजवादी है तो कोई पूंजीवादी। कोई पूरब है तो कोई पश्चिमवादी कहीं साम्यवाद है तो कही मार्क्सवाद।  कहीं लेनिनवाद है तो कही मैकालेवाद। कहीं फांसीवादी हैं तो नाजीवादी भी। बदलते दौर में वादियों के कई क्लोन तैयार हो गए हैं। सारे फसाद की जड़ यही क्लोनवादी हैं। कहने को तो सब विचारवादी हैं लेकिन अपनी राष्ट्रवाद की परिभाषा में सब अलगाववादी हैं। जरा सोचिए । राष्ट्रवादी, भगवावादी और संघीवादियों के हालात अछूतवादियों जैसे हो गए हैं। संघीवादियों की विचारधाराओं का केमिकल इतना तगड़ा है कि गंजेवादी कंघी लिए फिर रहे हैं। जबकि नकाबवादी दंगावादी संयुक्तमंच साझा कर रहे हैं। 
देखिए साहब! क्या जमाना आ गया है। विचारधाराओं के क्लोन बेहद घातक बन गए हैं। दक्षिण और वाम के मध्य से निकला सेक्युलरवाद आजकल हासिए पर है। जिसकी वजह से सेक्युलरवादी आजकल जनेऊ और पकौडेवादी बन गए हैं। राष्ट्रवादियों का आरोप है कि गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले सेक्युलरवादी अवसरवादी रथयात्रा के समर्थक हैं। विचारवादियों की इतनी उपशाखाएं आ गई हैं कि पता हीं नहीं चलता कि असली राष्ट्रवादी कौन हैं। टुकड़े और आजादी वादियों के हाथ में भी हम तिरंगे दिखते हैं तो स्वयंभू राष्टवादियों के हाथ भी। फिर इतना घालमेल काहे का ? यह अपचवादी नीति अच्छी नहीं है। हमें मुफत का माल छकने की आदत पड़ गई है। जिसकी वजह से बजारवाद का फंडा मुलुक पर भी लागू करना चाहते है। अभी नव वर्ष की खुमारी है। बाजार पर इसका असर कायम है। आनलाइन कंपनियां भी आफर दे रही हैं। बाय वन, गेट टू फ्री। यह फ्री का फार्मूला अपन के मुलुक पर भी चल निकला है। आजादी वाली गैंग फ्री में कश्मीर चाहती है। अरे भाई! अब तो कश्मीर फ्री है। कितना मुफत में लोगे।
हम वादियों को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। क्योंकि इन्होंने वादियों की नई-नई भाषा और परिभाएं गढ़ी हैं। जिसकी सूची बेहद लंबी है। अपन की कश्मीर वैली में देखिए। वहां वादियों की लड़ाई ने अतिवादी, आतंकवादी, जेहादवादी, पत्थरवादी जैसी कई जमातें पैदा की हैं। शोधार्थियों के लिए अच्छी खबरें हैं। उन्हें वाद पर रिसर्च करने के लिए पर्याप्त विषय और सामग्री भी उपलब्ध है, जिस पर अच्छा शोध किया जा सकता है। मुलुक में हर रोज वादियों की नई नस्ल उपज रही है। कैंपसों में नकाबवादी, हाकीवादी, डंडावादी, लाठीवादी, कबंलवादी, बमवादी, गोलीवादी और गुंडावादियों का अभ्युदय हो रहा है। हाल ही में सिनेवादियों ने एक नए वाद को जन्मदिया है। उसका नाम है मौनवादी। सोशलमीडिया पर वह हैशटैग कर रहा है। आजादी वादियों की गैंग में वह मौनवादी पहुंचता है और फिर चलता बनता है। उसके बाद सोशलमीडिया पर विचारवाद के अतिवादी ट्यूट-ट्यूट की छपाक करने लगते हैं। वादियों की नई-नई नस्लों ने कई आशंकाएं बढ़ा दी है। ऐसा लग रहा है कि जैसे कि वादियों की नस्ल इजाद करने के लिए मुलुक में स्पर्धाएं चल रही हैं। नीत नए प्रयोग हो रहे हैं। लेकिन अहिंसावादियों पर हिंसावादी भारी पड़ते दिखते हैं। हमारी सेहत के लिए यह ठीक नहीं है। अब बेचारे गांधीवादी, नेहरुवादी, पटेलवादी, सावरकरवादी, अंबेडकरवादी, सुभाषवादी क्लोनवादियों से यह पूछते फिर रहे हैं कि आखिर राष्ट्रवादी है कौन ?

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