शशांक मणि त्रिपाठी
सांसद , देवरिया सदर
भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र वह शासन है जो जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा चलता है। भारत के लोकतंत्र में आपातकाल को “काला अध्याय” कहा जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र को “विकृत रूप” में बदल दिया था । उस समय सरकार ने जनता के अधिकारों को कुचला एवं लोकतांत्रिक मानकों का हनन किया था । कई मौलिक अधिकार विशेषकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों पर अतिक्रमण हुआ एवं आलोचना के अधिकार को भी बाधित किया गया । उस अवधि में कई समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिए गए थे।
25 जून, 1975 को तत्कालीन इंदिरा सरकार ने देश में आपातकाल की घोषणा की जो 21 मार्च ,1977 तक चला। सरकार ने “नागरिकों के मौलिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश लगाया और समाचार पत्रों एवं टेलीविजन प्रसार पर प्रतिबंध लागू की।” 1971 के आमचुनाव के पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी को संसदीय दल का नेता चुना गया। वे तब कांग्रेस के अन्य नेताओं की अपेक्षा आयु एवं अनुभव दोनों में “ कम “ थीं,जिससे कांग्रेस दल के नेताओं के बीच “गुटबंदी की भावना “ उत्पन्न हुई। उस समय भारत में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी ,इंदिरा गांधी की सरकार में संजय गांधी का हस्तक्षेप एवं बेलगाम नौकरशाही ने आपातकाल की पीठिका को तैयार किया था। जनता लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के साथ लामबंद होने लगी थी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को ‘असंवैधानिक’ घोषित किया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में श्रीमती इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से विजई हुई थी ,लेकिन उनके चुनावी प्रतिद्वंदी श्री राजनारायण ने उनके निर्वाचन परिणाम को उच्च न्यायालय में चुनौती दी । उच्च न्यायालय के निर्णय का सारांश इस प्रकार था ,”सरकारी यांत्रिकी का व्यापक दुरुपयोग और सत्ता के दबाव से चुनाव के परिणाम प्रभावित करने का आरोप लगाया गया था।”
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया और उन्हें 6 वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंधित कर दिया । इस निर्वाचन प्रतिबंध को चुनौती देने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। उच्चतम न्यायालय का निर्णय 24 जून ,1975 को आया जिसमें निम्नलिखित आदेश दिए गए।
1. निर्वाचन रद्द करने का आदेश बरकरार रखा गया।
2. 6 वर्ष के चुनाव प्रतिबंध को बरकरार रखा गया । ;तथा
3.प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति दी गई पर उन्हें संसद की “मतदान प्रक्रिया” में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई।
आपातकाल के समय नागरिकों के कुछ मौलिक अधिकारों पर अस्थाई रूप से प्रतिबंध लगाया जा सकता है। भारत के संविधान में यह व्यवस्थाएं हैं कि आपातकाल संबंधी आदेशों को संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए, परंतु इसके लिए “किसी अधिकतम अवधि का निर्धारण नहीं किया गया है।” इसलिए उम्मीद यह रहती है कि राष्ट्रपति ऐसे आदेश विवेकपूर्ण अवधि के भीतर संसद के समक्ष रखवाएंगे। संविधान के 44 वे संशोधन, 1978 के पश्चात यह स्पष्ट किया गया कि “आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 एवं अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मौलिक अधिकार निलंबित नहीं किए जा सकते।” हालांकि ऐतिहासिक रूप से आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध लगे हैं जिस कारण आपातकाल “भारतीय लोकतंत्र के काले अध्याय’ के रूप में देखा जाता है। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है और बहुदलीय व्यवस्था में जनता तानाशाही को स्वीकार नहीं करती। आपातकाल को लोकतांत्रिक ढांचे में परिभाषित करना जटिल है । कुछ विचारकों के अनुसार आपातकाल वह स्थिति है जब बहुदलीय लोकतंत्र को तानाशाही में बदलने का प्रयास होता है।”
आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक “ काला अध्याय” था । आपातकाल के दौरान संविधान में निहित मूल्यों को दरकिनार किया गया, मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिए गए, समाचार पत्रों की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई और अनेक सामाजिक राजनीतिक एवं नागरिक कार्यकर्ताओं को कैद किया गया। आपातकाल के विरुद्ध संविधान की रक्षा, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा, नागरिकों के पथ- संचलन के संरक्षण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के सफल प्रयासों के लिए नागरिक समाज अभिनंदन करता है। ये सामाजिक व्यक्ति भारत के ताने -बाने तथा उन आदर्शों और मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं जो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए अति आवश्यक है।
आपातकाल लोकतंत्र के लिए एक अशांत 21 महीने का दौर था। भारतीयों ने लोकतंत्र के इतिहास का “सर्वाधिक काला दौर देखने का दु:खद अनुभव किया ।” आपातकाल के दौरान तिहाड़ कारागृह में लगभग 1900 कैदी थे जिनमें 350- 400 राजनीतिक बंदी थे।
संविधान के सिद्धांतों, मूल्यों और आदर्शों को मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि हम सभी “विकसित भारत @2047” की प्राप्ति में सहायक बने। हर वर्ष आपातकालीन विरोधी दिवस , कार्यशालाएं और सेमिनार का आयोजन कर उनकी दमनात्मक, पक्षपातपूर्ण एवं अनुपयोगी भूमिकाओं को उजागर करके नागरिक समाज में इनकी उपयोगिता बढ़ाई जाए। संविधान ,लोकतांत्रिक एवं संघीय भावना को मजबूत करना राजनीतिक नेतृत्व का उद्देश्य होना चाहिए । भारत लोकतंत्र की जननी है. संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण ,सुरक्षा तथा उन्नयन में नागरिक समाज ,बौद्धिक वर्ग ,लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को चिंतन करना चाहिए।
शशांक मणि त्रिपाठी