‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ पर स्पष्ट दृष्टिकोण पैदा करती पुस्तक

  • सुरेश हिंदुस्थानी

राष्ट्रवाद सदैव से चर्चा एवं आकर्षण का विषय रहा है। आज के परिदृश्य में तो यह और अधिक चर्चित है। सब जानना चाहते हैं कि आखिर राष्ट्रवाद क्या है? राष्ट्रवाद पर इतनी बहस क्यों होती है? क्यों कुछ लोग राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं? राष्ट्रवाद और मीडिया के बीच क्या संबंध है? राष्ट्रवाद के अध्येयता डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेंद्र सिंह की पुस्तक ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ ने इन सब प्रश्नों के उत्तर देने का यथासंभव प्रयास किया है। यह पुस्तक सर्वथा उचित समय पर प्रकाशित हुई है। विशेषकर इस पुस्तक के माध्यम से ‘राष्ट्रवादी पत्रकारिता’ को भली प्रकार समझा जा सकता है। ज्यादातर पाठ ‘पत्रकारिता’ के स्वरूप पर ही केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक राष्ट्रवाद का अध्ययन करने वालों के साथ ही पत्रकारिता में रुचि रखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वर्तमान समय में विशेष प्रकार के लोगों ने कुछ टेलीविजन न्यूज चैनल्स, समाचारपत्र-पत्रिकाओं एवं वेबसाइट्स पर ‘राष्ट्रवादी’ होने का ठप्पा लगाना शुरू कर दिया है। ये लोग स्वयं तो कहते हैं कि उन्हें किसी से देशभक्ति, सेक्युलर या फिर अन्य किसी प्रकार का प्रमाण-पत्र नहीं चाहिए, किंतु विडम्बना देखिए कि ये स्वयं ही दूसरों के माथे पर ठप्पा लगाने का धंधा करते हैं। इन लोगों के कारण भी ‘राष्ट्रवादी मीडिया’ या ‘राष्ट्रवादी पत्रकारिता’ को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न हुए हैं। राष्ट्रवादी मीडिया/पत्रकारिता के संबंध में फैली अनेक प्रकार की भ्रांतियों को दूर करने का का यह पुस्तक बखूबी करती है।

        पुस्तक में कुछ 32 पाठ/आलेख हैं, जिन्हें वरिष्ठ पत्रकारों, लेखकों एवं स्तम्भकारों ने लिखा है। प्रस्तावना में लोकसभा टीवी के सीईओ एवं वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार डॉ. आशीष जोशी और पुस्तक के पहले आलेख ‘हम और हमारा राष्ट्रवाद’ में मीडिया आचार्य एवं राजनीतिक विश्लेषक प्रो. संजय द्विवेदी ने यह एकदम स्पष्ट कर दिया है कि असल में भारत का राष्ट्रवाद क्या है? भारत के राष्ट्रवाद की तुलना पश्चिम के राष्ट्रवाद से नहीं की जा सकती। यकीनन, जहाँ पश्चिम का राष्ट्रवाद राजनीति के गर्भ से उत्पन्न हुआ है, वहीं भारत का राष्ट्रवाद अपनी अनूठी एवं सर्वसमावेशक संस्कृति की कोख से जन्मा है। इसलिए दोनों राष्ट्रवाद में जमीन-आसमान का अंतर है। इसलिए दोनों को एक नहीं माना जा सकता। इसलिए पश्चिम की परिभाषाओं की कसौटी पर भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को नहीं कसा जा सकता। प्रो. द्विवेदी ने उचित ही लिखा है कि भारत का राष्ट्रवाद विविधता को साधने वाला, बहुलता को आदन देने वाला ओर समाज को सुख देने वाला है।

        राष्ट्रवादी विचारधारा के पत्रकार और पत्रकारिता को लेकर जो गलत धारणा समाज में स्थापित करने की साजिश हुई है, उस पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने गहराई से कलम चलाई है। श्री चतुर्वेदी ने उचित ही कहा है कि पत्रकारिता की दुनिया में आने के बाद राष्ट्रवादी सोच वाले लोगों ने कहीं अधिक लचीला और जनपेक्षी रुख अख्तियार किया है। वैचारिकता की छौंक उनकी रिपोर्टिंग में उस हद तक नहीं दिखती, जिस हद तक एक खास विचारधारा (वामपंथी) के प्रति समर्पित शख्सियतों की पत्रकारिता में दिखती है। यकीनन यह सत्य है। उसका एक कारण यह भी है, जो इस आलेख में बताया भी गया है कि वामपंथी पत्रकार राष्ट्रवादी पत्रकारों को अपने संस्थान में टिकने ही नहीं देते थे। वरिष्ठ स्तंभकार हरिहर शर्मा ने अनेक प्रसंग, तथ्य एवं प्रमाण देकर कहा है कि “प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तम्भ में लगी दीमक को समाप्त करना ही होगा”। उन्होंने स्पष्ट किया है कि विदेशों में भारत को लेकर अनेक किस्म के मनगढ़ंत किस्से प्रचलित हैं, उसके लिए भारत का मीडिया दोषी है। शक्तिशाली एवं प्रगत देशों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया है कि उनकी प्रगति एवं शक्ति बढ़ाने में वहाँ की राष्ट्रवादी मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके लिए अमेरिका एवं ब्रिटेन और उनकी मीडिया के उदाहरण ही पर्याप्त हैं। श्री शर्मा यह सब बताते हुए आग्रह करना चाहते हैं कि निजी स्वार्थ और वैचारिक दुराग्रह छोड़कर भारत के राष्ट्रीय मीडिया को भी राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक अमरेन्द्र कुमार आर्य ने ‘पत्रकारिता का राष्ट्रवादी प्रवाह और भारतवर्ष’ पर अपने विचार रखे हैं। जबकि डॉ. शशि प्रकाश राय, उमापति मिश्र, डॉ. मंजरी शुक्ला, शिवेन्दु राय, अजीत पंवार, अखिलेश द्विवेदी, डॉ. सीमा वर्मा, डॉ. मयंक चतुर्वेदी एवं अन्य ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनके आलेख मीडिया और राष्ट्रवाद पर सोच को व्यापक संदर्भ में समझने में सहायता करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार पाठक ने भी अपने आलेख ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी मीडिया के उभार और उसके सामने खड़ी चुनौतियों को लेकर तार्किक एवं तथ्यात्मक बातें कही हैं। उन्होंने उन ताकतों की ओर भी संकेत किया है, जो ऐन-केन-प्रकारेण भारतीय राष्ट्रवाद को सरकारवाद साबित करना चाहती हैं। यह ताकतें राष्ट्रवादी मीडिया के विरुद्ध लगातार अभियान चलाकर उसे कमजोर और अविश्वसनीय साबित करना चाहती हैं। उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है- “राष्ट्र हमेशा सर्वोपरि होता है, सर्वोच्च होता है। राष्ट्र है तो मीडिया है, जनता है, सरकार है। राष्ट्र ही नहीं रहेगा तो फिर क्या बचेगा।” आज आवश्यकता है कि भारत की जनता, सरकारें एवं मीडिया इस विचार को ध्यान में रखकर अपना व्यवहार एवं भूमिका तय करें।

        डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेंद्र सिंह की इस पुस्तक ने देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला-2020 में ही सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। पुस्तक के संपादक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अध्येता डॉ. सौरभ मालवीय एवं सह-संपादक लोकेंद्र सिंह को साधुवाद। उनके प्रयत्नों से एक सामयिक और ज्वलंत विषय पर पठनीय, संग्रहणीय, उल्लेखनीय सामग्री ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ पुस्तक के रूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत है। यह भी स्तुत्य है कि पुस्तक के संपादकों ने प्रतिविचार को भी स्थान दिया है, ताकि राष्ट्रवाद की बहस को और अधिक तार्किक ढंग से समझा जा सके। पुस्तक में कुल जमा 32 आलेख शामिल हैं। पृष्ठ संख्या 152 है। पुस्तक को प्रकाशित किया है यश पब्लिकेशंस, दिल्ली ने। साजिल्द पुस्तक का मूल्य 399 रुपये है।

पुस्तक : राष्ट्रवाद और मीडिया

संपादक : डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेन्द्र सिंह

मूल्य : 399 रुपये (साजिल्द)

प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस,

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