लेखक परिचय

अश्वनी कुमार, पटना

अश्वनी कुमार, पटना

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#लाल_बत्ती भाई, इतने दिनों तक नेताओं, अफसरों और अमीरों के सर पर चढ़े रहने के बावजूद भी तुम्हें देश याद नहीं करता था| जो देश की सवारी करता था तुम उसकी सवारी करते थे, इसलिए हम तुम्हें याद कर रहे हैं, देश याद कर रहा है| क्योंकि तुम 1 मई से किसी कबाड़ख़ाने में पड़े रहोगे या बच्चे के खिलौने बनकर उनकी तोड़फोड़ सहोगे| अंग्रेजों के जमाने से ही तुम चमचमाती और लूटी गई गाड़ियों की शान रहे हो, वीआईपी का सिंबल रहे हो पर तुम आम आदमियों को कभी भी तनिक न सुहाए| बत्ती के अन्दर मुंडी घुमाकर देश चलाने वाले से लेकर देश बेचने वाले तक की चमचागिरी की फिर भी तुम्हें गरीबों की हाय लगी| तुम घमंड करो न करों लेकिन तुम्हारे नीचे गाडी में बैठने वाला तो तुम्हारे दम पर खुद पर घमंड करता था|

पुलिस, व्यवस्था या अधिकारी सब को तुम डराते थे| मुफ्तखोरी के सिंबल से भी कहीं-कहीं नवाज दिए जाते थे| नियम-कानून सब तुम्हें देखकर आँखें मूंद लेते थे| और वो तुम्हारा भाई हूटर…
उसने उसने तुम्हारे साथ मिलकर ट्रैफिक व्यवस्था को जैसे बजाया है, वैसे ही अब मोदी तुम्हारी बजा रहा है| ध्वनि प्रदूषण हूटर से तो होता ही था, लेकिन गरीबों-बेसहारों के आँखों से जो तुम प्रकाश प्रदूषण करते थे, उससे उनकी तिलमिलाई आँखों ने तुम्हें नजर लगा दिया| अमीरियत और शख्सियत का शान अब कबाड़ी में बेचे जाने का इन्तजार करेगा| पता है लाल बत्ती भाई, तुम उसी नियम-कानून से गाड़ियों से उतारे जा रहे हो, जिस कानून का तुम्हें नेताओं ने कभी सम्मान करना नहीं सिखाया| सिपाही-थानेदार अब तक जो देखते ही सॉल्लुट मारते थे, अब वही तुम्हारे कारण गाड़ी रुकवाएगा और मुक़दमा चलाएगा|

तुमने अपने जीवनकाल में मुफ्तखोरों से लेकर अपराधियों, देशद्रोहियों और ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ लोगों तक का सफ़र तय किया| पैसा, पॉवर और रुतबे को नजदीक से देखा| ईमान बेचते देखा, ईमान खरीदते देखा, गरीबी को अमीरी का पाँव पड़ते भी देखा और तुम्हें पाने के लिए वो सबकुछ करते देखा जो नहीं देखना चाहिए| लेकिन लुच्चे-लफंगों के सर पर बैठकर तुम्हारा मन नाचने को पक्का नहीं करता होगा| क्योंकि माना की तुमको अंग्रेजों ने बनाया, पहचान दिलाया फिर भी हो तो तुम भारतीय ही| गरीबों के अधिकारों के हत्यारे भी तुम्हारे कारण उन्हीं गरीबों के बीच इज्जत और जयकारे पा जाते थे, इसलिए दोषी तो तुम भी हुए!

पर लाल बत्ती भाई, राजनीति को तुमसे बेहतर किसने समझा होगा? सत्ता का असली सुख नेताओं को तब महसूस होता था जब तुम अपने भाई हूटर की आवाज पर नाचते हुए सड़कों से गुजरते थे| ईमानदारी से कहूँ तो मैंने जितनी भी बार तुमको देखा है मैं तुमसे जला हूँ| मेरे जैसे कितनों के सपनों के अरमान थे तुम| तुम्हारा रंग पाने की चाहत में युवा खुद को पसीने के रंग में रंग दे रहे हैं| कोई तुम्हें पाने के लिए शॉर्टकट अपनाता है और वह राजनीति ने नाम पर चमचागिरी की सड़ांध मारती गटर में खुद को उतारकर हाईकमान की कृपा का इन्तजार करता है|

पर सच कहूँ लाल बत्ती भाई तो तुम्हारे आगे लगी सरकारी नेम प्लेट तुम्हारी सफलता की गारन्टी लेता था| नहीं तो मैंने कई बार तुम्हें फिरे ब्रिगेड की गाड़ियों से जाम छूटने के इन्तजार में पसीने से तर-बतर देखा है| और तुम्हारा पडोसी, नीली बत्ती! उसे एम्बुलेंस की छत पर चढ़कर शर्मिंदा होना पड़ता है क्योंकि उसे हांकने वाला डंडाधारी उसमें नहीं बैठा होता| तुम नेता ले जा रहे होते हो और वह जीवन ले जा रहा होता है फिर भी नेताओं के आगे जीवन का कोई मोल नहीं| वैसे भी नेताओं के नजरिये से आबादी में संतुलन बेहद जरूरी है पर हाँ लोकतंत्र के लिए नेताओं की आबादी में संतुलन नहीं होनी चाहिए!

तो लाल बत्ती भाई, तुम जा रहे हो…  बहुत कमी खलेगी….  हमारे नहीं, नेताओं की जिन्दगी में| क्योंकि अब कौन डराएगा?
पुलिस-प्रशासन, टोल-नाके सब उन गाड़ियों को टोका-टोकी करेंगे| हाईवे पर ट्रक वाले से कुटाई का डर रहेगा और ट्रक वालों का लहरिया कट ओवरटेकिंग का एक नया दौर शुरू होगा| और तो और टेम्पों वालों से भिड़ने पर माननीय को दो-चार झापड़ लगने का भी पूरी सम्भावना रहेगी…
#क्योंकि_हर_भारतीय_VIP_है

तुम्हारा शुभचिंतक
अश्वनी…

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