समाज

स्वस्थ गांव के लिए जरूरी है भरोसेमंद स्वास्थ्य व्यवस्था

समेस्ता
लूणकरणसर, राजस्थान

स्वास्थ्य किसी भी परिवार के लिए सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है। गांवों में रहने वाले लोगों के लिए यह जरूरत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि नजदीक बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध न होने पर छोटी-सी बीमारी के लिए भी उन्हें दूर के कस्बे या शहर का रुख करना पड़ता है। इसका सबसे अधिक असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। यदि गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जरूरी जांच, दवाइयां, नर्स और डॉक्टर उपलब्ध हों, तो वह ग्रामीण परिवारों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र किसी बड़े जिला अस्पताल का विकल्प नहीं हो सकता। वहां हर तरह की जांच, विशेषज्ञ डॉक्टर या गंभीर बीमारी के इलाज की सुविधा होना भी जरूरी नहीं है। लेकिन वहां एक डॉक्टर नियमित रूप से उपलब्ध हो, नर्सें मौजूद हों, सामान्य जांच और जरूरी दवाइयां मिल जाएं और गंभीर मरीज को समय पर आगे रेफर करने की व्यवस्था हो, तो ग्रामीणों के लिए यह बहुत बड़ा सहारा बन सकता है। कई बार मरीज को तत्काल बड़े इलाज की जरूरत नहीं होती, बल्कि उसे यह जानने की जरूरत होती है कि उसकी परेशानी कितनी गंभीर है, कौन-सी दवा लेनी है और आगे क्या सावधानी रखनी है। गांव में ही यह सलाह मिल जाए तो परिवार को हर छोटी समस्या के लिए शहर जाने से बचाया जा सकता है।

लूणकरणसर ब्लॉक से करीब 13 किलोमीटर दूर खियेरा गांव इसका एक उदाहरण है। करीब 4500 की आबादी वाले इस गांव में संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की ग्रामीण तारीफ करते हैं। यही कारण है कि खियेरा के अलावा जाखड़वाला, लालेरा, मकड़ासर और बिंझरवाली जैसे गांवों से भी लोग इलाज के लिए यहां पहुंचते हैं। यहां तक कि रविवार जैसे छुट्टी के दिन भी स्वास्थ्य केंद्र खुला मिलना ग्रामीणों के लिए भरोसा पैदा करता है। किसी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र का नियमित रूप से खुला रहना अपने आप में ग्रामीण परिवारों के लिए एक बड़ी सुविधा है।

ऐसी स्वास्थ्य सुविधा का सबसे बड़ा लाभ महिलाओं को मिल सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिला को प्रसव से पहले कई बार स्वास्थ्य जांच की जरूरत होती है। यदि हर जांच के लिए उसे शहर जाना पड़े तो उसके साथ परिवार के किसी सदस्य को भी जाना पड़ता है। आने-जाने का खर्च, पूरे दिन का समय और कई बार काम से होने वाला नुकसान गरीब परिवार के लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है।

किशोरियों के लिए भी गांव में स्वास्थ्य केंद्र की मौजूदगी जरूरी है। किशोरावस्था में शरीर में होने वाले बदलाव, मासिक धर्म, पोषण और सामान्य स्वास्थ्य से जुड़ी कई ऐसी बातें होती हैं जिन पर परिवारों में खुलकर चर्चा नहीं होती। यदि गांव में महिला स्वास्थ्यकर्मी या नर्स उपलब्ध हो तो किशोरियां अपनी समस्याओं के बारे में समय पर सलाह ले सकती हैं। दिव्यांग लोगों के लिए तो नजदीकी स्वास्थ्य सुविधा का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि उनके लिए लंबी दूरी की यात्रा कई बार अतिरिक्त कठिनाई लेकर आती है।

लेकिन खियेरा की तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। ग्रामीणों के अनुसार, स्वास्थ्य केंद्र में कई सुविधाएं होने के बावजूद स्थायी डॉक्टर की नियुक्ति नहीं होने से हर समय डॉक्टर उपलब्ध नहीं रहते। ऐसे में वहां कार्यरत दो नर्सों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है। नर्सें अपनी भूमिका निभाती हैं, लेकिन हर गंभीर चिकित्सीय स्थिति में डॉक्टर की आवश्यकता होती है। यदि अचानक कोई गंभीर मरीज पहुंच जाए तो उसे करीब 13 किमी दूर लूणकरणसर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या लगभग 90 किमी दूर बीकानेर के जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है।

राजस्थान में ग्रामीण और प्राथमिक-स्तरीय स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने मानव संसाधन की समस्या व्यापक रही है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में 15,459 स्वीकृत डॉक्टर पदों में 9,969 डॉक्टर कार्यरत थे, यानी 5,490 पदों की कमी थी। 26,770 स्वीकृत नर्सिंग पदों में 21,802 कार्यरत थे और 4,968 पद खाली थे। पैरामेडिकल के 14,344 स्वीकृत पदों में 6,328 कर्मचारी कार्यरत थे, जिससे 8,016 पदों की कमी सामने आई। जो ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में मानव संसाधन की चुनौती की गंभीरता को दर्शाता है।

हालांकि राज्य सरकार ने बड़े पैमाने पर नियुक्तियां भी की हैं। जनवरी 2025 में 7,674 नर्सिंग अधिकारियों के पदस्थापन आदेश जारी किए गए और अगस्त 2026 में सरकार ने 600 नए मेडिकल ऑफिसर पदों पर भर्ती की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की घोषणा की। लेकिन इन नियुक्तियों के बावजूद केवल पद भर देना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी उन गांवों और दूरदराज के स्वास्थ्य केंद्रों तक नियमित रूप से पहुंचे, जहां उनकी सबसे अधिक जरूरत है। सितंबर 2026 में भी राजस्थान स्वास्थ्य विभाग की ओर से विभिन्न संवर्गों के स्वीकृत, कार्यरत और रिक्त पदों की जानकारी जुटाने के आदेश जारी किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि मानव संसाधन की निगरानी और रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया अभी भी लगातार चल रही है।

खियेरा जैसे स्वास्थ्य केंद्र यह बताते हैं कि ग्रामीणों को हर बीमारी के इलाज के लिए शहर जैसा बड़ा अस्पताल गांव में नहीं चाहिए। उन्हें सबसे पहले अपने आसपास ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए जिस पर वे भरोसा कर सकें। गांव के अस्पताल का दरवाजा हर समय खुला हो, वहां नर्स मौजूद हो, डॉक्टर उपलब्ध हो और जरूरत पड़ने पर मरीज को समय पर बड़े अस्पताल तक पहुंचाने की व्यवस्था हो, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी दूरी वहीं खत्म हो जाती है। ग्रामीण स्वास्थ्य का मतलब केवल अस्पताल की इमारत खड़ी करना नहीं, बल्कि उस इमारत में हर दिन डॉक्टर, नर्स, दवा और भरोसा उपलब्ध कराना है। जब गांव के स्वास्थ्य केंद्र को सचमुच गांव के लोगों का पहला सहारा बना दिया जाएगा, तभी स्वस्थ गांव और स्वस्थ राजस्थान की नींव मजबूत होगी।