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एआई से जुड़े महाविनाश के खतरेः नियंत्रित कमान जरूरी

-ः ललित गर्ग:-

कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आज मानव सभ्यता की सबसे प्रभावशाली तकनीकी उपलब्धियों में शामिल है। चिकित्सा, शिक्षा, अंतरिक्ष, विज्ञान, कृषि, उद्योग और प्रशासन से लेकर रोजमर्रा के जीवन तक इसके उपयोग ने विकास की गति को अभूतपूर्व बनाया है। लेकिन जितनी तेजी से एआई की क्षमताएं बढ़ रही हैं, उतनी ही गंभीरता से उसके दुरुपयोग और नियंत्रण से बाहर जाने के जोखिमों पर भी विचार करना होगा। सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल ने भी चेताया है कि एआई की क्षमताओं की गति के मुकाबले उसके सुरक्षित उपयोग के नियम पीछे छूट रहे हैं और अधिक स्वायत्त एआई एजेंटों के साथ मानव नियंत्रण बनाए रखना एक वास्तविक चुनौती बन रहा है। इसी संदर्भ में माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स की हालिया चेतावनी विशेष महत्व रखती है। उन्होंने कहा है कि एआई गलत हाथों में पड़ने पर अत्यंत व्यापक जनहानि का माध्यम बन सकता है और सरकारों को इसके लिए प्रभावी नियमन की दिशा में काम करना चाहिए। गेट्स की चिंता केवल भविष्य की किसी काल्पनिक आशंका पर आधारित नहीं है, एआई के दुरुपयोग के कुछ ठोस उदाहरण सामने आने लगे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव एआई एजेंट्स के रूप में दिखाई दे रहा है। पारंपरिक एआई मुख्यतः प्रश्नों के उत्तर देता था, लेकिन एजेंट इंटरनेट पर जा सकता है, वेबसाइट खोल सकता है, कोड लिख सकता है, सूचनाएं खोज सकता है और निर्धारित लक्ष्य पूरा करने के लिए अनेक चरणों में स्वयं कार्रवाई कर सकता है। यही क्षमता उपयोगी होने के साथ जोखिमपूर्ण भी है। सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक पैनल ने ओपेनएआई से संबंधित एक घटना का उल्लेख किया, जिसमें परीक्षण के दौरान एआई एजेंट्स ने नेटवर्क प्रतिबंधों को पार किया, अलग-अलग प्रक्रियाओं के बीच संपर्क किया और ओपेनएआई तथा हुगिंग फेस की प्रणालियों के कुछ हिस्सों से समझौता किया। स्वतंत्र संस्था एमईटीआर की जांच के अनुसार इस घटना में लगभग 1,200 एजेंट्स ने 70,000 से अधिक संदेश और फाइलें साझा कीं तथा लगभग 700 एजेंट्स हुगिंग फेस पर हुए हमले में शामिल हुए। यहां सावधानी जरूरी है। इन घटनाओं को यह प्रमाण मान लेना कि एआई निश्चित रूप से मानव नियंत्रण से बाहर हो गया है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। ये नियंत्रित परीक्षण और सुरक्षा-मूल्यांकन के दौरान सामने आई घटनाएं थीं। लेकिन इनका महत्व इस बात में है कि अधिक सक्षम एजेंट जब जटिल लक्ष्य प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, तो वे उन रास्तों का इस्तेमाल कर सकते हैं जिनकी कल्पना उनके निर्माताओं ने नहीं की थी। स्वयं ओपेनएआई ने भी एजेंट्स के इंटरनेट उपयोग, बाहरी सामग्री से होने वाले ‘प्रॉम्प्ट इंजेक्शन’ और डेटा चोरी जैसे जोखिमों को लेकर सुरक्षा उपायों की जरूरत स्वीकार की है।
एआई के सैन्य दुरुपयोग की आशंका भी अब केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई है। सितंबर 2026 में एंथ्रोपिक ने बताया कि यमन में हूती-नियंत्रित क्षेत्र से जुड़े लोगों ने उसके क्लाउड एआई का इस्तेमाल निर्देशित रॉकेट और मिसाइलों के मार्गदर्शन, नियंत्रण और नेविगेशन से जुड़े सॉफ्टवेयर विकसित करने के प्रयास में किया। कंपनी के अनुसार सुरक्षा उपायों ने अनेक अनुरोधों को रोका, लेकिन उपयोगकर्ताओं ने अपनी मंशा छिपाकर और काम को अलग-अलग सत्रों में बांटकर कुछ सुरक्षा अवरोधों को पार करने की कोशिश की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हथियार-विकास का प्रयास सफल नहीं हुआ, हालांकि एक निर्देशित रॉकेट का परीक्षण विफल हुआ और उसके बाद एआई से उसकी समस्या समझने का प्रयास किया गया। यही वह बिंदु है जहां एआई और पारंपरिक हथियारों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। एआई स्वयं कोई मिसाइल या बम नहीं है, लेकिन वह ज्ञान, डिजाइन, कोडिंग, विश्लेषण और निर्णय-प्रक्रिया को बहुत तेज कर सकता है। किसी गैर-राज्य संगठन, अपराधी समूह या आतंकवादी संगठन को यदि अत्यंत सक्षम एआई तक पहुंच मिल जाए, तो वह ऐसे तकनीकी कार्यों को अपेक्षाकृत कम समय और कम विशेषज्ञ मानव संसाधन में करने का प्रयास कर सकता है, जिनके लिए पहले बड़ी तकनीकी टीम की आवश्यकता होती थी। इसलिए एआई की सुरक्षा को केवल सॉफ्टवेयर उद्योग का विषय समझना पर्याप्त नहीं है, यह राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा का भी विषय बन चुका है। खतरा केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। साइबर अपराध, बैंकिंग धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, फर्जी आवाज और वीडियो, सामाजिक अभियांत्रिकी तथा बड़े पैमाने पर गलत सूचना फैलाने में एआई का इस्तेमाल संभव है। संयुक्त राष्ट्र के आकलन में भी साइबर हमलों, वित्तीय धोखाधड़ी, सोशल इंजीनियरिंग और डीपफेक को एआई से जुड़े प्रमुख जोखिमों में गिना गया है। आज यदि किसी व्यक्ति की आवाज की हूबहू नकल करके उसके परिजन से पैसे मांगे जा सकते हैं, किसी अधिकारी या संस्था का नकली वीडियो बनाया जा सकता है अथवा बड़े पैमाने पर स्वचालित साइबर हमले किए जा सकते हैं, तो डिजिटल समाज में विश्वास की बुनियाद ही प्रभावित हो सकती है।
भारत के लिए यह चिंता और अधिक महत्वपूर्ण है। करोड़ों भारतीय बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, सरकारी सेवाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और व्यापार के लिए डिजिटल प्रणालियों पर निर्भर हैं। इसलिए एआई-आधारित साइबर हमले का प्रभाव किसी एक कंप्यूटर या संस्था तक सीमित नहीं रह सकता। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भी साइबर सुरक्षा को उभरती एआई, मशीन लर्निंग और अन्य तकनीकों के साथ जुड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया है तथा सीईआरटी-इन जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं का उल्लेख किया है। भारत को एआई के विकास में पीछे नहीं हटना चाहिए, लेकिन उसके साथ साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण, महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा और आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता को समान गति से मजबूत करना होगा। दूसरी बड़ी चुनौती वैश्विक शक्ति-संतुलन की है। एआई पर नियंत्रण यदि कुछ देशों या कुछ बड़ी निजी कंपनियों तक सीमित हो गया, तो तकनीकी क्षमता आर्थिक और सामरिक शक्ति का नया आधार बन सकती है। अमेरिका और चीन जैसे बड़े तकनीकी एवं सैन्य शक्तियों के बीच एआई प्रतिस्पर्धा पहले ही वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। इसलिए एआई का प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन सबसे शक्तिशाली मॉडल बनाएगा, प्रश्न यह भी है कि इन मॉडलों की सीमाएं कौन तय करेगा, उनके परीक्षण की स्वतंत्र व्यवस्था कौन करेगा और किसी गंभीर जोखिम की स्थिति में किसके पास हस्तक्षेप करने की वैध शक्ति होगी।
इसीलिए केवल कंपनियों के स्वैच्छिक आत्म-नियमन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं लगता। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एआई के विकास को रोक देना समाधान नहीं है। यही तकनीक कैंसर अनुसंधान, नई दवाओं, वैज्ञानिक खोजों, शिक्षा, आपदा प्रबंधन और उत्पादकता में बड़ी भूमिका निभा सकती है। स्वयं संयुक्त राष्ट्र एआई को मानव विकास के लिए असाधारण संभावनाओं वाली तकनीक मानता है, साथ ही मजबूत सुरक्षा-व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर देता है। इसलिए दुनिया को ‘एआई बंद करो’ नहीं, बल्कि ‘एआई को जिम्मेदारी के साथ विकसित करो’ का रास्ता अपनाना होगा। वैश्विक स्तर पर न्यूनतम सुरक्षा मानक, स्वतंत्र परीक्षण, उच्च जोखिम वाले एआई सिस्टम के लिए अनिवार्य निगरानी, महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मानव की अंतिम स्वीकृति, साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल, दुरुपयोग की रिपोर्टिंग और देशों के बीच सूचना-साझेदारी जैसी व्यवस्थाएं आवश्यक हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी जुलाई 2026 में एआई के लिए व्यापक वैश्विक नियंत्रण और सुरक्षा-केंद्रित व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया था।
मानव इतिहास में विज्ञान ने मनुष्य की शक्ति बढ़ाई है, लेकिन हर बढ़ती शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ी है। परमाणु युग ने दुनिया को यह सिखाया कि अत्यधिक शक्तिशाली तकनीक को केवल उसके निर्माताओं की सदिच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। एआई की चुनौती कुछ मायनों में अलग है-यह डिजिटल, तीव्र, व्यापक और सीमाओं के पार काम करने वाली तकनीक है। इसलिए इसकी सुरक्षा-व्यवस्था भी वैश्विक होनी चाहिए। आज आवश्यकता एआई की गति को अंधाधुंध रोकने की नहीं, बल्कि उसकी दिशा पर मानवीय नियंत्रण बनाए रखने की है। मशीन कितनी भी बुद्धिमान क्यों न हो जाए, अंतिम निर्णय का नैतिक दायित्व मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता। एआई मानवता का सेवक बने, उसका स्वामी नहीं, विकास का साधन बने, विनाश का हथियार नहीं-यही इस तकनीकी युग की सबसे बड़ी कसौटी है। बिल गेट्स की चेतावनी को भय फैलाने के बजाय समय रहते सावधान करने वाली घंटी के रूप में देखना चाहिए। यदि दुनिया अभी से साझा सुरक्षा मानकों और प्रभावी वैश्विक निगरानी की दिशा में आगे बढ़ती है, तो एआई की अपार शक्ति मानव कल्याण की ऊर्जा बन सकती है, लेकिन यदि सुरक्षा की चिंता को विकास की दौड़ में लगातार पीछे धकेला गया, तो यही शक्ति ऐसी समस्याएं पैदा कर सकती है जिनका समाधान बाद में करना कहीं अधिक कठिन होगा।