लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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यूपीए सरकार का कार्यकाल मई 2014 में समाप्त होगा। सोलहवीं लोकसभा का चुनाव उससे पूर्व होना अनिवार्य है।

सन् 1952 में भारत में हुए पहले आम चुनावों का मुझे आज भी स्मरण है। पार्टी के हम प्रचार- कर्ताओं को विधानसभाई चुनावों की ज्यादा चिंता थी बजाय लोकसभाई चुनावों के। उन लोकसभाई चुनावों में जनसंघ तीन सीटों पर विजयी रही, दो पश्चिम बंगाल और एक राजस्थान से। लेकिन आज के संदर्भ में जो महत्वपूर्ण है, वह यह जिस पर मैं जोर देना चाहता हूं कि सन् 1952 में लोकसभा और विधानसभाई चुनाव एक साथ सम्पन्न हुए थे।

यही प्रक्रिया आगामी तीन चुनावों – 1957, 1962 और 1967 में दोहराई गई थी। पांचवां आम चुनाव 1972 में होना था। लेकिन 1971 की शुरूआत में श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर दी और पांचवीं लोकसभा का चुनाव मार्च, 1971 में सम्पन्न हुआ। विधानसभाई चुनाव समयानुसार 1972 में हुए। इस प्रकार लोकसभा और विधानसभाई चुनाव अलग-अलग समय पर होने प्रारम्भ हुए।

इस बीच हमारे संविधान में वर्णित धारा 356 जो केन्द्र सरकार को यह अधिकार देती है कि यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राज्य में सरकार संविधान के अनुसार नहीं चल रही तो वह कभी भी राज्य विधानसभा को भंग कर शासन के सूत्र अपने हाथ में ले सकती है – के परिणामस्वरूप भी विभिन्न राज्यों में चुनावी कार्यक्रम एक-दूसरे से अलग होने के रूप में सामने आए।

अत: आज स्थिति यह है कि वर्ष 2010, 2011, 2012 (यानी कि यूपीए-2 के गठन की शुरूआत से) तक बारह विभिन्न राज्यों में चुनाव हो चुके हैं-झारखण्ड और बिहार (2010), केरल, पुड्डुचेरी, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम (2011), गोवा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और मणिपुर (2012)। गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभाओं की अवधि 2013 की जनवरी के अंत तक समाप्त होनी है। अत: सभी संभावनाएं यह हैं कि इन दोनों विधानसभाओं के चुनाव इस वर्ष के अंत तक सम्पन्न कराए जाएंगे। एक प्रकार से, इसके लिए बहुल जनसंख्या वाले हमारे विशाल देश की केन्द्र सरकार निरंतर चुनाव कराने में जुटी रहती है। जब 6 वर्ष के लिए हम एनडीए सरकार में थे तो व्यवहारत: हमें अनुभव हुआ कि कैसे देश के दूर-दराज के एक कोने में आसन्न चुनाव नई दिल्ली में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। मैं महसूस करता हूं कि यह न तो सरकार और न ही राज्य व्यवस्था के लिए अच्छा है।

कुछ समय पूर्व मुझे प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह और लोकसभा में तत्कालीन नेता सदन और वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी से इस विषय पर चर्चा करने का अवसर मिला। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि दोनों, मेरे इस सुझाव को विचारणीय मानते हैं कि – न तो लोकसभा और न ही विधानसभाओं को निर्धारित समायावधि से पूर्व भंग नहीं करना चाहिए। इन दोनों संस्थाओं का कार्यकाल निश्चित होना चाहिए।

जैसे कि अमेरिका में चुनावों की तिथि कार्यपालिका द्वारा मनमाने ढंग से तय नहीं की जा सकती। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्येक चार वर्ष पर सदैव नवम्बर में होता है। कानून में व्यवस्था है कि चुनाव ”नवम्बर के पहले सोमवार के बाद मंगलवार को होगा”।

बराक ओबामा नवम्बर, 2008 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए। इस वर्ष नये चुनाव होने हैं। नवम्बर, 2012 का पहला सोमवार 5 तारीख को पड़ता है। अत: इस वर्ष चुनाव की तिथि 6 नवम्बर होगी।

इन दिनों चुनाव सुधारों की जरूरत के बारे में काफी कहा और लिखा जा रहा है कि चुनावों में धन बल, जो सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की जड़ है, पर अंकुश लगाया जा सके।

अच्छा हो कि नए राष्ट्रपति सम्पूर्ण चुनाव सुधारों के सम्बन्ध में पहल करें, लेकिन विशेष रूप से इस विशेष मुद्दे पर, जिस पर एक बार चर्चा हो चुकी है: वर्तमान सरकार, जिसमें वह भी एक प्रमुख भूमिका निभाते रहे हैं एक काम तो कम से कम अवश्य करें: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की निर्धारित समयावधि, और केन्द्र तथा राज्यों में प्रत्येक पांच वर्ष पर एक साथ चुनाव।

प्रणव दा द्वारा हाल ही में संभाली गई निष्पक्ष जिम्मेदारी के तहत चुनाव सुधारों की पहल किया जाना बहुत उपयुक्त होगा।

टेलपीस (पश्च्यलेख) 

जब सन् 2010 में, उपरोक्त मुद्दे पर प्रधानमंत्री और लोकसभा में सदन के तत्कालीन नेता से चर्चा के दौरान मैंने संकेत दिया था कि ब्रिटिश सरकार भी इस दिशा में सोच रही है।

आज मैं उल्लेख करना चाहूंगा कि सन् 2011 में, ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित किया है – ”फिक्सड-टर्म पार्लियामेंट्स एक्ट, 2011”। इस कानून के मुताबिक आगामी चुनाव 7 मई, 2015 को होंगे (सिवाय सरकार गिरने की स्थिति में या सांसदों का दो तिहाई बहुमत शीघ्र चुनावों के लिए मतदान करे)। संदर्भ : लेजिस्लेटिव डिटेल्स, विकीपीडिया

3 Responses to “नए राष्ट्रपति से एक अनुरोध / लालकृष्ण आडवाणी”

  1. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'-Jaipur

    लेख में उठाया गया मुद्दा सामयिक है! यद्यपि ये मुद्दा आडवाणी जी की ओर से पूर्व में भी अनेक बार उठाया जा चुका है! एक साथ चुनाव न मात्र आर्थिक रूप से फायदेमंद हैं, बल्कि साथ ही साथ इससे संसदीय व्यवस्था में स्थायित्व भी आएगा और जैसा कि आडवानी जी लिखते हैं कि——–

    “……..व्यवहारत: हमें अनुभव हुआ कि कैसे देश के दूर-दराज के एक कोने में आसन्न चुनाव नई दिल्ली में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।……..” ये बात भी सही है!

    >>>>>>>>>>>-प्रधान मंत्री और मुख्यमंत्री के लिए सदन की सदस्यता की अनिवार्यता समाप्त करने का सुझाव सुन्दर और प्रशंसनीय है! समय का लगभग निर्धारण भी हो जाये तो बेहतर होगा!

    लेकिन श्री धनाकर जी के एक सुझाव से मैं विनम्रता पूर्वक असहमति प्रकट करता हूँ! जैसे-

    >>>>>>>>>>-“……………उपचुनाव की व्यवस्था ख़त्म हो- बगल के क्षेत्रके विधायक सांसद को वह जिम्मेवारी पूर्व नियत क्रम से दे दी जाये………….”

    >>>>>>>>>>-ये कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, लोगों के प्रतिनिधित्व का सवाल है, जिसे किसी अड़ोसी-पड़ोसी को सोंपना लोकतंत्र की भावना के प्रतिकूल होगा, लेकिन इसका न्यायसंगत समाधान होना चाहिए और मध्यावधि चुनाव के साथ उप चुनाव से भी मुक्ति मिलनी चाहिए!

    >>>>>>>>>>>-इसका एक हल दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित करना भी हो सकता है, लेकिन आपराधिक तत्व इसके लिए जीते हुए प्रतिनिधि की हत्या करवा सकते हैं! इसलिए ये खतरनाक हो सकता है!

    >>>>>>>>>>-मेरी राय में दूसरा समाधान जिस पार्टी के प्रतिनिधि का पद रिक्त हो वह पार्टी अपने किसी भी नेता को भी शेष कार्यकाल के लिए प्रतिनिधि नियुक्त कर सकती है, लेकिन निर्दलीय प्रतिनिधी के पद रिक्त करने पर समस्या आने वाली है!

    >>>>>>>>>-विद्वानों को इस बारे में अधिक उपयुक्त समाधान के लिए माथा पच्ची करनी चाहिए!

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    • dr dhanakar thakur

      मैं डॉ.मीना के विचारों की प्रशंशा करता हूँ – अमिने अपनी आत्मकथा में इस विषयमे जो लिखा है वह है – समयाभाव में इसे हिन्दी में अभी नहीं कर पाउंगा
      CHAPTER XXVII
      Epilogue (vi)
      MY SUGGESTIONS FOR THE REFORMATION IN INDIAN DEMOCRATIC SYSTEM

      In the field of the political system, I feel:
      a) The national parties should not fight State and lower level elections and similarly State/regional parties should not fight national election, to have a true national or regional angle on the national or regional problems, all of which are equally important.
      b) The election from the specified sections e.g. teachers, graduates, etc. should be strictly held without any interference from the political parties.
      c) In the Parliament and Assemblies, there should be seats on the basis of elections for the professional groups like doctors, engineers, artists, journalists, teachers, etc.
      It will be better that the Rajya Sabha’s 50 per cent seats be allocated to such groups on the basis of election on non-party basis. The Presidential nomination for few such seats though had these groups provisioned by our Constitution-makers but these are very few in numbers and that too had been abused in many cases.
      Reorganisation of the Indian States should be done on the basis of area and or population(as proposed in this book).50 per cent seats of the Rajya Sabha should be evenly allocated to such States and ratification on the important federal issues should be a must by the Rajya Sabha.
      d) Legislative Councils existing only in few States, viz. Bihar, J. & K., Karnataka, Maharashtra and U.P. should be scrapped.
      e) The post of the Governors should also be abolished, as it has not served any meaningful purpose so far except in giving refuse to some defeated politicians or some influential officers who might have favoured in the past the persons of the ruling regime. The Union Home Minister may be directly responsible for the affairs of the States, particularly at the critical constitutional junctures like administration during President’s rule, etc.
      Further in the field of electoral reforms, I feel:
      i) The election from the Panchayats to the post of President should be held with a fixed tenure of four or maybe even three years but there should be no mid-term elections.
      ii) Defection of any type (say by the merger of parties or any other loophole remained in the new Act of 2003) should be dealt with by the annulment of the seats. Even independents should not be allowed to join any group, particularly if the group is claiming for a new government formation.
      iii) In the events of elections at the Central or State level, the President’s rule should be imposed —the Chief justice may run the Govt. for the interim period to avoid misuse of power by the ruling party.
      iv) For election to any post more than 50 per cent votes should be necessary (by the preferential voting system).
      v) In the event of not obtaining a clear majority at the Central level, the next round of election between the two or more parties obtaining highest or equally high seats should be held on the issue of the formation of the Govt. i.e. without disturbing the elected representatives. For the passing of any bill other than no-confidence motion preferential voting should be done.
      vi) In the event of no-confidence motion at the Central level, the Parliament should elect some other leader without mid-term election.
      In case of State Legislatures the parliamentarians elected from the State should take over the function of the state legislators and choose a leader to form a cabinet to run the State for the remaining period, till the next election. They may not be allowed to form new laws without the ratification by the Parliament.
      vii) The method of making anyone the leader or a member of the ministry should be continued but the bar of six months period for his/her election should be removed as it is a mockery—never a minister or Chief Minister has probably lost any such election.
      Prime Minister or a Chief Minister elected as such by the members of the Parliament or Legislative Assemblies may, in fact, be a better representative of the people, as they will not have the bias of serving their own particular constituency.

      viii) The political parties should refrain from putting any criminal or corrupt persons in the electoral fray. The guidelines of the Election Commission or the ordinance debarring a person on the ground of cases or charges framed have no relevance in the era of filing and or managing false cases (as in my own case, I could not think of contesting 1996 Parliamentary election from Madhubani or Darbhanga when Dr. Viren Doshi phoned me from Gujarat that he would ask Narendra Modi, the then General Secretary, BJP for giving me a ticket but I told Viren not to pursue).
      ix) The use of money and or muscle power in the politics can only be minimized by the political parties who should have higher moral behaviour and instead of choosing a person who can win; they should choose and try for one who should win an election. The present day scenario of the parties on the basis of castes compounds such things.
      x) The bar on the Govt. servants in entering the electoral fray is ridiculous. It dilutes the quality of the contesting persons, that too, when each and every civil servant has some political angle in a democracy. They may be given lien for contesting the elections and if elected, till they are on the elected post.

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  2. Dr. Dhanakar Thakur

    हमारे यहाँ विधान सभा अवं लोकसभा के चुनावों को न केवल एक साथ होना चाहिए उनके लिए कमसे कम मौसम भी तय होना चहिये – मार्च में परीक्षाएं होती हैं , मई में गर्मी सिताम्बर तक वर्षा बाढ़ फिर पूजा का माहौल – दीपावली-छठ-गुरु नानक जयंती के बाद कहना चाहिए अगहन के प्रथम पक्षमे मतदान हो (यदि रमजान का महीना ठीक उसी समय उस साल होई तो हो ईद के एक सप्ताह बाद – पर यह दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक हो जाये नहीं तो फिर ठंढ का मौसम( वैसे कुछ पहाडी क्षेत्रोंमे दिक्कत रह ही जायेगी बर्फपात के चलते जनहान यह प्रक्रिया मई में हो ) आ जाएगा
    चुनाव भी पांच नहीं चार साल पर ही हो और उपचुनाव की व्यवस्था ख़त्म हो- बगल के क्षेत्रके विधायक सांसद को वह जिम्मेवारी पूर्व नियत क्रम से दे दी जाये.
    प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री का सनासाद या विधयक होने की अनिवार्यता ख़त्म कर दी जाये और उन्हें विधायक या सांसदों द्वारा चुने जाने पर मनोनीत कर दिया जाये – उनका उपचुनाव लड़ना या राज्यसभा या विधान परिषद् से आना बेमानी है

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