लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
प्राचीन सभ्यतायें नदियों के किनारे विकसितः-प्राचीन सभ्यताओं का जन्म एवं उदगम नदियों के तटों से प्रारम्भ हुआ है। आदिम युग तथा पौराणिक काल में मानव तथा सभी जीवजन्तु प्रायः जंगलों एवं आरण्यकों में विचरण करते रहे हैं। सभी अपने-अपने आवास चुनते-बनाते, आखेट करते तथा उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों व कन्द-मूल फलादि से भोजन का प्रवंधन करते थे। विश्व की सभी प्राचीन सभ्यतायें नदियों के किनारे ही विकसित, पुष्पित और पल्लवित हुई है। नदियां जहां स्वच्छ जल का संवाहक होती हैं वहीं आखेट, कृषि, पशुपालन तथा यातायात का संवाहिका भी होती हैं। एशिया महाद्वीप का हिमालय पर्वत अनेक नदियों का उद्गम स्रोत हुआ करता है। गंगा, यमुना, सिन्धु, झेलम, चिनाव, रावी, सतलज, गोमती, घाघरा, राप्ती, कोसी, हुबली तथा ब्रहमपुत्र आदि सभी नदियों का उद्गम स्रोत हिमालय ही रहा है। ये सभी हिन्द महासागर में जाकर अपनी लीला समाप्त करती हैं। हिन्दू धर्म में नदियों को देवी के रूप में भी मानवीकरण कर पूजा जाता है। प्रतिमाविज्ञान तथा शिल्पशास्त्र के ग्रंथों, मन्दिरों, स्मारकों तथा संग्रहालयों में इनके अनेक स्वरुपों की परिकल्पना तथा कलात्मक चित्रण प्रस्तुत किया गया है।
यमुना भारतीय संस्कृति की जीवन प्रणालीः-भारत की सबसे पवित्र और प्राचीन नदियों में यमुना का स्मरण गंगा के जैसा और उसके साथ ही किया जाता है। यमुना गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जो यमुनोत्री (उत्तरकाशी से 30 किमी उत्तर, गढ़वाल में) नामक जगह से निकलती है और प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा से मिल जाती है। नदियों के किनारे और दोआब की पुण्यभूमि में ही भारतीय संस्कृति का जन्म हुआ और विकास भी। यमुना केवल नदी नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति की एक जीवन पद्धति भी है। इसकी परम्परा में प्रेरणा, जीवन और दिव्य भाव समाहित है। जिस पहाड़ से यमुना निकलतीं हैं, उसका एक नाम कालिंद है। इसलिए यमुना को कालिंदी भी कहते हैं। अपने उद्गम से आगे कई मील तक विशाल हिमागारों और हिममंडित कंदराओं में अप्रकट रूप से बहती हुई पहाड़ी ढ़लानों पर से अत्यन्त तीव्रतापूर्वक उतरती हुई इसकी धारा दूर तक दौड़ती बहती चली जाती है। ब्रज में यमुना का महत्त्व वही है जो शरीर में आत्मा का। यमुना के बिना ब्रज की संस्कृति का कोई महत्त्व ही नहीं है। यमुना की सहायक नदियों में चम्बल, सेंगर, छोटी सिन्ध, बेतवा और केन उल्लेखनीय हैं। यमुना के तटवर्ती नगरों में दिल्ली मथुरा और आगरा मुख्य है । इसके अतिरिक्त इटावा, काल्पी, हमीरपुर और प्रयाग भी तट पर बसे हैं।
ब्रजक्षेत्र में यमुना तट पर स्थित पावन स्थल:-ब्रजक्षेत्र में यमुना के तट के दोनों ओर पुराण प्रसिद्ध वन और उपवन तथा कृष्णलीला स्थान विद्यमान हैं। यहाँ पर यह माँट से वृन्दावन तक बहती हुई वृन्दावन को तीन ओर से घेर लेती है। पुराणों से ज्ञात होता है, प्राचीन काल में वृन्दावन में यमुना की कई धाराएँ थीं, जिनके कारण वह लगभग प्रायद्वीप सा बन गया था। उसमें अनेक सुन्दर वनखंड और घास के मैदान थे, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपने साथी गोपबालों के साथ गायें चराया करते थे। वर्तमान काल में यमुना की एक ही धारा है। इसी के तट पर वृन्दावन बसा हुआ है। वहाँ मध्यकाल में अनेक धर्माचार्यों और भक्त कवियों ने निवास कर कृष्णोपासना और कृष्णभक्ति का प्रचार प्रसार किया था। वृन्दावन में यमुना के किनारों पर बड़े सुन्दर घाट बने हुए हैं और उन पर अनेक मंदिर-देवालय, छतरियां और धर्मशालाएँ है। वृन्दावन से आगे दक्षिण की ओर बहती हुई यह नदी मथुरा नगर में प्रवेश करती है। मथुरा, बृन्दावन,गोकुल तथा बरसाना अदि ब्रजस्थल यमुना के तट पर बसे हुए हैं। यह एक एतिहासिक और धार्मिक स्थान है, जिसकी दीर्घकालीन गौरव गाथा है। यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार धारण किया था, जिससे इसके महत्व की वृद्धि हुई है। यहाँ भी यमुना के तट पर बड़े सुन्दर घाट बने हुए हैं।
जबसे यमुना से नहरें निकाली गयी हैं, तब से इसका जलीय आकार छोटा हो गया है। केवल वर्षा ऋतु मे यह अपना पूर्ववर्ती रुप धारण कर पाती है। उस समय मीलों तक इसका पानी फैल जाता है। आगरा जिले में नगला अकोस के पास इसके पानी से निर्मित कीठम झील सैलानियों तथा वन्य जीव जन्तुओं के लिये बड़ी आकर्षक है। कीठम से रुनकता तक यमुना के किनारे एक संरक्षित वनखंड का निर्माण किया गया है, जो सूरदास वन कहलाता है। रुनकता के समीप ही यमुना तट पर सूरकुटी गऊघाट का वह प्राचीन धार्मिक स्थल है, जहाँ महात्मा सूरदास ने 12 वर्षों तक निवास किया था और जहाँ उन्होंने महाप्रभु बल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। यह स्थान ऋषि जमदग्नि की पत्नी व भगवान परशुराम की मां रेणुका से भी सम्बन्धित है। आगरा में भी एक पौराणिक कैलाश नामक पवित्रस्थल, घाट और मन्दिर भी यमुना तट पर स्थित है।
आगरा सर्वाधिक बड़ा नगरः-यमुना के तटवर्ती स्थानों में दिल्ली व मथुरा के बाद सर्वाधिक बड़ा नगर आगरा ही है। यह एक प्रसिद्ध एतिहासिक, व्यापारिक एंव पर्यटन स्थल है, जो मुगल सम्राटों की राजधानी भी रह चुका है। यह यमुना तट से काफी ऊँचाई पर बसा हुआ है। आगरा में यमुना तट पर जो मुगलकालीन इमारतें है, उनमें मुगल बादशाहों द्वारा निर्मित किला और ताज महल पर्यटकों के निमित्त अत्याधिक प्रसिद्ध हैं। अपने उद्गम यमनोत्री से लेकर चम्बल के संगम तक यमुना नदी, गंगा नदी के समानान्तर बहती है। इसके आगे उन दोनों के बीच का अन्तर कम होता जाता है और अन्त में प्रयाग में जाकर वे दोनों संगम बनाकर मिश्रित हो जाती है। यहां यमुना पूर्णरुप से तिरोहित हो जाती हैं। चम्बल के पश्चात यमुना नदी में मिलने वाली नदियों में सेंगर, छोटी सिन्ध, बेतवा और केन उल्लेखनीय हैं। इटावा के पश्चात यमुना के तटवर्ती नगरों में काल्पी, हमीरपुर और प्रयाग मुख्य है। प्रयाग में यमुना एक विशाल नदी के रुप में प्रस्तुत होती है और वहाँ के प्रसिद्ध एतिहासिक किले के नीचे गंगा में मिल जाती है। यमुना नदी की कुल लम्बाई उद्गम से लेकर प्रयाग संगम तक लगभग 860 मील या 1376 किमी. है। आगरा में यमुना तट पर पोइयाघाट, बलकेश्वर घाट, रामबागघाट, जोहराबागघाट, एत्माद्दौलाघाट कचहरीघाट हाथीघाट, दशहराघाट, बटेसरघाट तथा चकलाघाट आदि प्रमुख एतिहासक व सांस्कृतिक स्थल अवस्थित हैं।
यमुना संरक्षण के विवधि प्रयास- प्राचीन साहित्य में नदियों को बड़े आदर व सम्मान से देखा जाता था। मनुस्मृति में जलप्रदूषण करनेवाले को मृत्यु देने की बात कही गई है। ब्रजक्षेत्र में कुएं के पानी खारा होन के कारण क्षेत्र की अधिकांशतः जनता नदी जल पर ही आश्रित रहती थी। इसी कारण नदी के तटों पर सामन्तों व अमीरों ने अपनी हवेलियां, बाग और महल बनवा रखे थे। बाबर, अकबर तथा शाहजहां के पीने के पानी का मुख्य स्रोत नदियां ही होती थीं। मध्यकाल में यमुना नदी का जल मोतियों की तरह स्वच्छ, अमृत सा निर्मल रहता था। इसी कारण ताजमहल के लिए वर्तमान जगह का चयन किया गया है। शाहजहां के दरबारी कवि पण्डित राज जगन्नाथ ने गंगा और जमुना से सम्बन्धित गंगा लहरी और अमृत लहरी नामक काव्यों में 10-10 लहरियां लिख रखी है। यमुना को अमृत लहरी के रुप में महिमा मण्डन कर यमुना के महत्व को दर्शाया गया है। प्राचीन और मध्यकाल में यमुना में असीमित जल संचय रहता था। यह हमेशा बहते रहने के कारण स्वच्छ तथा तरोताजा रहता था। हमने वैज्ञानिक प्रगति व विकास के नाम पर इस पर बांध बनाकर अपनी बहुमूल्य संस्कृति का विनाश कर डाला है। अब तो यह सूखी रेखा जैसे हो गयी है। उल्टे इसमें गन्दे नालों को डालने से इसकी स्थिति बद से बदतर हो गई है। इसके जलचर बनस्पतियां सब के सब काल कवलित होती जा रही हैं।
यमुना एक गंदे नाले में तब्दील हो गई हैः- यह विडंबना है देश की पवित्र नदियों में शामिल यमुना दिल्ली में एक गंदे नाले में तब्दील हो गई है। यमुना की इस हालत के लिए कई कारक हैं। घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट को लेकर गिरने वाले बाइस नालों के अलावा यमुना को गंदा और प्रदूषित करने में धार्मिक आस्था भी कम दोषी नहीं हैं। दुर्गा गणेश व लक्ष्मी पूजा महोत्सव के बाद दुर्गा गणेश व लक्ष्मी प्रतिमाएं एवं निष्प्रयोज्य पूजन सामग्री को यमुना नदी में विसर्जित किए जाने की परंपरा इस नदी की अपवित्रता को बढ़ाने का ही काम कर रही है। एक अध्ययन के मुताबिक, यमुना नदी में 7.15 करोड़ गैलन गंदा पानी रोज प्रवाहित होता है, किंतु पानी का अधिकांश भाग परिशोधित नहीं हो पाता। यदि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट पर यकीन करें तो आज यमुना का पानी स्नान करने योग्य भी नहीं रहा है। पीना और आचमन करना तो बहुत दूर की बात है।
आगरा में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की सख्त आवश्यकता:-यमुना में नालों को गिरने से रोकने के लिए नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की सरकारी योजनायें घोषित हुई हैं। यमुना शुद्धीकरण के अभियान को आगे बढ़ाते हुए केंद्र की अमृत योजना के तहत शहर के 61 नालों को टेप किये जाने की बातें प्रकाश में आई हैं। आगरा शहर में कुल 90 नाले हैं। इनमें अब तक केवल 29 नाले ही टेप हो पाए हैं। बाकी नालों को टेप करने के लिए यमुना एक्शन प्लान के अंतर्गत वृहद योजना बनाई गई है। योजना का प्रारंभिक लागत 400 करोड़ रुपये है। पैसा केंद्र सरकार, राज्य सरकार और नगर निकाय मिलकर देने की बात कही जाती है। योजना के अंतर्गत शहर के 61 नालों के पानी को यमुना में गिरने से रोकने को चार बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और छह छोटे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनानें को सुना जा रहा है। एसटीपी निर्माण के लिए केंद्र की अमृत योजना से एक तिहाई बजट मिलने की बात सामने आई है। 30 प्रतिशत राशि नगर निकाय से बाकी राज्य सरकार से प्राप्त होने की बात प्रकाश में आई है ।
वर्तमान समय की बदहाली:- स्वच्छ भारत-सुन्दर भारत अभियान का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। हमारे ऋषि, मुनि, सन्त व कवियों ने अपने साहित्य,संगीत तथा शिल्प में इसके स्वरुपों को भव्य रुप में उकेरा है। आधुनिक काल में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वच्छता के प्रमुख हिमायती रहे। आगरा में ग्रीन आगरा व क्लीन आगरा का नारा दशकों से लोग सुनते व पढ़ते आ रहे हैं। इसके बावजूद हम वह गुणवत्ता नहीं हासिल कर पाये हैं जो इस हेरिटेज सिटी को मिलनी चाहिए। देश में अनेक नगरों को हेरिटेज सिटी का दर्जा मिला परन्तु आवश्यक संसाधनों तथा प्रशासन की निष्क्रियता के कारण आगरा इसे प्राप्त ना कर सका। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन की केन्द्रीय सरकार ने स्वच्छता के लिए निरन्तर अभियान चला रखा है। सभी सार्वजनिक व एतिहासक स्थलों पर स्वच्छता के अनेक प्रयास भी किये गये। इसके बावजूद ना तो आगरा ग्रीन हो पाया और ना क्लीन हो पाया है। आगरा और यमुना दोनों में प्रदूषण निरन्तर बढ़ ही रहा है। जहां यमुना एक सूखी नदी और गन्दे नाले का रुप धारण कर चुकी है। वहीं इसके घाटों की बदहाली भी किसी से छिपी नहीं है। सरकार के प्रयास जहां नाकामी के जिम्मेदार हैं वहीं यहां के निवासी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। सीवर के गन्दे नाले विना परिशोधन के सीधे यमुना में डाले जा रहे हैं। यमुना तटों पर बेतरतीब झाड़ियां हमारी कमी दर्शा रही हैं। नदी में पुष्प, पत्ते व मूर्तियों का विसर्जन इसे और गन्दा कर रहा हैं। इसे शुद्ध और वैज्ञानिक बनाने के लिए बड़े स्तर पर बड़ा प्रयास करने की आवश्यकता है।
श्रीगुरु वशिष्ठ मानव सर्वांगीण विकास सेवा समिति का हस्ताक्षर अभियानः- यमुना शुद्धिकरण और यमुना की निर्मलता, अविरलता के लिए आगरा में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। 2008-10 तक लगभग 35 हजार लोगों ने यमुना के शुद्धिकरण के लिए अपने हस्ताक्षर कर अपनी मंशा जाहिर की। आगरा में यमुना की दुर्दशा से आंदोलित यमुना निधि के संयोजक पंडित अश्विनी कुमार मिश्र ने इस हस्ताक्षर अभियान का संयोजन किया। यमुना में निश्चित मात्रा में प्रवाह बनाए रखने के संबंध में, साथ ही 1978 की बाढ़ के विस्तार क्षेत्र को यमुना का क्षेत्र माना जाय, यमुना के लिए एक सर्वाधिकार प्राप्त प्राधिकरण की स्थापना की जाए, यमुना के घाटों और इसके जंगलों की साफ-सफाई और हरियाली लाई जाए, रिवर सीवर का सम्बन्ध विच्छेद होना चाहिए, यमुना की सहायक नदियों को उचित योजनाओं से पुनर्जीवित किया जाए आदि मांगों को लेकर यह हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। लोगों में जनचेतना पैदा करने के लिए और यमुना की समस्याओं को लोगों को बताने के लिए इसके साथ ही लोगों का यमुना के प्रति संकल्प पैदा हो इस हस्ताक्षर अभियान की मूल मंशा थी।
बलकेश्वरघाट का पुनरुद्धार-यमुना निधि के संयोजक पंडित अश्विनी कुमार मिश्र के संयोजन में श्रीगुरु वशिष्ठ मानव सर्वांगीण विकास सेवा समिति ने जन जागरुकता, स्वयंसेवियों तथा स्थानीय प्रशासन के सहयोग से आगरा के एक दर्जन घाटों के स्वच्छता के लिए प्रयास शुरु कर रखा है। इसके लिए जन प्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों का सहयोग प्राप्त करने की कोशिस किया गया। इनमें एतिहासक बलकेश्वरघाट का पुनरुद्धार करके एक आदर्शघाट के रुप में अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।
हाथीघाट का जीर्णोद्धार एवं सौन्दर्यीकरण की योजना-यमुना के दोनों तटों पर घना वृक्षारोपण, कुछ चयनित स्थानों पर पक्के विसर्जन कुण्ड, मूर्ति तथा पूजा सामग्री का उचित विसर्जन एवं उसको उपयोग में लाने का प्रयास, अलग अलग पूजा सामग्री के लिए अलग अलग व्यवस्थापन, उन्हें रिसाइकिलिग कर पुष्पों का खाद बनाया जाने के लिए प्रयास, घाटों पर पार्कों का निर्माण व सौन्दर्यीकरण , प्रसाधनकक्ष का निर्माण, सुलभ शौचालयों व पेय जल की व्यवस्था ,घाटों पर दर्शक दीर्घा की व्यवस्था कराया जाना जिससे पर्व विशेष पर भीड़ को नियंत्रित एवं समायोजित किया जाना, घाटों की सुव्यवस्था के लिए भंडार कक्ष का निर्माण करने की योजना है। हाथीघाट मुख्यमार्ग से लेकर यमुना किनारे तक डाबर रोड सड़क का निर्माण जिससे आयोजन विशेष में आम जन को सुगमता हो। वाहन विशेष में विसर्जन कलश स्थापित कर शहर में भ्रमण कराकर जनजागरुक करना। दशकों से चली आ रही यमुना आरती से जनता को और अच्छी तरह से जोड़ना व उनकी भगीदारी सुनिश्चित कराना आदि।

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