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आका की चौखट

कलम हुई मजबूर जब, बिकने लगा विचार।
आका की चौखट बनी, लेखक का दरबार॥

कलम उठी जो प्रश्न पर, कर देते खामोश।
आका की जयकार में, डूब गया आक्रोश।
गुट के अपने देव हैं, अपने ही गुणगान।
अपने अभिनंदन करे, अपने ही सम्मान।
योग्य कलम को मौन कर, झूठी जय-जयकार।
आका की चौखट बनी, लेखक का दरबार॥

गुट के आगे झुक गई, प्रतिभा की पहचान।
चापलूस की वाह ही, बन बैठी सम्मान।
योग्य कलम ठुकरा रहे, बाँटे झूठे मान।
चमचों के जयघोष में, दबा यूँ स्वाभिमान।
कलम हुई मजबूर जब, बिकने लगा विचार।
आका की चौखट बनी, लेखक का दरबार॥

मंच वही, सम्मान वह, चेहरे बारंबार।
नई कलम की राह में, बैठे पहरेदार।
जिसकी जैसी पहुँच है, वैसा उसका मान।
कोने में प्रतिभा पड़ी, झूठा जय-जय गान।
सिंहासन साहित्य के, विराजे चाटुकार।
आका की चौखट बनी, लेखक का दरबार॥

पुरस्कार की दौड़ में, रिश्ते बने प्रमाण।
बाहर प्रतिभा धूप में, भीतर झूठी शान।
मंच वही, चेहरे वही, वही पुराना खेल।
नई कलम के भाग में, केवल धक्के-ठेल।
शब्द अगर बिकने लगें, कैसे बचे विचार।
कलम हुई मजबूर जब, बिकने लगा विचार॥

साहित्य की अस्मिता, माँगे निर्भय लेख।
कलम कभी ये ना बिके, सच का लिखे विवेक।
गुटबंदी के पार हो, प्रतिभा का संसार।
शब्द बने आवाज़ ये, सुने सच की पुकार।
कलम रहे आज़ाद तो, जीवित रहे विचार।
आका की चौखट न हो, लेखक का दरबार॥

कलम हुई मजबूर जब, बिकने लगा विचार।
आका की चौखट बनी, लेखक का दरबार॥

  • डॉ. सत्यवान सौरभ