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    Homeधर्म-अध्यात्मचलें यज्ञ की ओर....

    चलें यज्ञ की ओर….

     

    शिवदेव आर्य,

    वेद व यज्ञ हमारी संस्कृति के आधार स्थम्भ हैं। इसके बिना भारतीय संस्कृति निश्चित ही पंगु है। यज्ञ का विधिविधान आदि काल से अद्यावधि पर्यन्त अक्षुण्ण बना हुआ है। इसकी पुष्टि हमें हड़प्पा आदि संस्कृतियों में बंगादि स्थलों पर यज्ञकुण्डों के मिलने से होती है।

    वैदिक काल में ऋषियों ने यज्ञों पर अनेक अनुसन्धान किये। अनुसन्धान की प्रथा वहीं तक समाप्त नहीं हो गई अपितु इसका निर्वाहन निरन्तर होता चला आ रहा  है।  यज्ञ से प्राप्त अनेक लाभों को दृष्टि में रखते हुए शतपथ ब्राह्मणकार ने लिखा है कि ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतं कर्म’ अर्थात् यज्ञ संसार का सबसे श्रेष्ठ कर्म है और इसी श्रेष्ठ कर्म को करने  से मनुष्य सर्वदा सुखी रहता है। इसी बात को ऋग्वेद में निरुपित करते हुए लिखते हैं कि-

    ‘ईजानाः स्वर्गं यन्ति लोकम्’

    यज्ञ शब्द के  विवेचन से हमें ज्ञात होता कि ‘यज्ञदेवपूजासंगतिकरणदानेषु’ इस धातु से यज्ञ शब्द सि द्ध होगा, जिसका अर्थ होगा – देवताओं की पूजा, संगतिकरण तथा दान।

    देवपूजा से तात्पर्य है कि देवों की पूजा अर्थात् परमपिता परमेश्वर, अग्नि, वायु, इन्द्र, जल, विद्युत्, सूर्य, चन्द्र आदि देवताओं एवं वेदविज्ञ विद्वान् मनीषियों का यथावत् आदर सत्कार करना। संगतिकरण का अर्थ होगा कि पदार्थों की परस्पर संगति करना। संगतिकरण शब्द ही यज्ञ में विज्ञान का द्योतक है। यही शब्द यज्ञ में विज्ञान को सिद्ध करता है। क्योंकि सम्पूर्ण विज्ञान में पदार्थों का संयोग ही तो है। इस यज्ञ में अनेकशः पदार्थों का हवि के रूप में संयोग होता है। दान अर्थात् परोपकार के कार्यों को करना। यज्ञ में वेदमन्त्रों के द्वारा पदार्थों को अग्नि में आहुत किया जाता है। अग्नि उस पदार्थ को सूक्ष्म करके अन्तरिक्ष में जाकर सभी प्राणियों को लाभ प्रदान करता है। यह परोपकार करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। यज्ञ हमारे जीवन का अमूल्य अंग है। इस बात को प्रकाश जी की ये पंक्ति सिद्ध करती  हैं कि-

    यज्ञ जीवन का हमारे श्रेष्ठ सुन्दर कर्म है।

    यज्ञ करना-कराना आर्यों का धर्म है।।

    महर्षि देव दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में उद्धृत किया  है कि ‘जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावर्त देश रोगों  से रहित और सुखों से पूरित था। अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाये।’

    यज्ञ शब्द के अर्थ से यज्ञ के अनेक लाभ स्वयं ही  सिद्ध हो जाते हैं। वेद-मन्त्रों में यज्ञ के बहुशः लाभों को उद्धृत किया गया है। यज्ञ हमारे परर्यावरण की हानिकारक दुर्गन्ध युक्त वायु को समाप्त कर शुद्ध वायु  को स्थान प्रदान कराता है। यह पदार्थ विद्या  का ही परिणाम है। अग्नि का ही यह सामथ्र्य है कि वह हानिकारक वायु को वहां से हटा कर शुद्ध वायु का प्रवेश कराती है। इससे पर्यावरण की शुद्धि तथा रोगों का विनाश अपने आप ही हो जाता है क्योंकि प्रायः करके सभी रोग पर्यावरण के प्रदुषण होने के कारण ही होते हैं।

    जिन रोगों का शमन करने के लिए मेडिकल साइंस आज तक मौन है वहां यही यज्ञ चिकित्सों रोगों का शमन करती है। अथर्ववेद में यज्ञ चिकित्सा का बहुत विस्तृत पूर्वक वर्णन किया गया है।

    यज्ञ के गुणों का वखान करते हुए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज अपने अमर-ग्रन्थ सत्यार्थ-प्रकाश के द्वादश (12) समुल्लास में लिखते हैं कि ‘अग्निहोत्रादि यज्ञों से वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि द्वारा आरोग्यता का होना, उससे धर्म, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है।’

    वेद हमें स्पष्ट रूप से यज्ञ करने का आदेश देता है कि -मनुष्यैरेवं भूतो यज्ञः सदैव कार्यः…..(यजुर्वेद-१.२२), कस्त्वा विमुंचति स त्वा विमुंचति कस्मै त्वा विमुंचति…(यजुर्वेद-२.२३)  इत्यादि मन्त्रों के माध्यम से ऋषि हमें नित्य-प्रति यज्ञ कर अपने चरमपद (मोक्ष) को पाने के लिए सदैव उद्यत रहना चाहिए, ऐसा  उपदेश देते हैं।

    शिवदेव आर्य
    शिवदेव आर्य
    आर्ष-ज्योतिः मासिक द्विभाषीय शोधपत्रिका के सम्पादक

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