लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

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old manडा.राज सक्सेना
अभिशाप बुढापा कभी न था,यह तो गरिमा का पोषक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |
           क्यों रखें अपेक्षा औरों से,
           अब तक भी तो हम जीते थे |
           हम कुंआ खोदते थे अपना,
           तब उसका पानी पीते थे |
खर्चों को करके अल्प सभी,  जीवन   जीना   सम्मोहक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |
           अब तक देते थे हम सबको,
           क्यों हाथ पसारें हम अपना |
           क्यों हम सोचें सब ध्यान रखें,
           है समय आज किस पर इतना |
सोचो समाज को क्या दें हम,बस यह विचार उन्मोदक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |
           ये सब स्तर में छोटे हैं,
           हम क्यों मांगे अब इनसे कुछ |
           हम ने पाला और बड़ा किया,
           इनको दे डाला है सब कुछ |
हम दाता, ये अब भी याचक,  यह भाव रखो,मनमोहक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |
           वटवृक्ष  रहे हम जीवन- भर,
            अब  कैसे  उजड़े नीड़  बनें |
            जो सम्भव था वह् दान दिया,
            अब अंत समय क्यों दीन बनें |
हम दानवीर रह, जग त्यागें, यह सोच  सदा उदबोधक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |

4 Responses to “मनमोहक है”

  1. डा. के. वी. नरसिंह राव

    प्रेम और स्नेह को तो दिया ही जा सकता है । आयु जो अनायास अपने आप बढ़ती है, वरिष्ठ नागरिक बनने पर तो दायित्व को और बढ़ाती है । इस मुकाम पर पहुँचने के बाद हम अपने परिवार, समाज और देश के लिए कितने अधिक उपयोगी हो सकते हैं, इसी बात पर शेष जीवन की सार्थकता निर्भर है । सुंदर कविता के लिए बधाई ।

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    • डा.राज सक्सेना

      Dr.Raaj Saksena

      आपकी कृपापूर्ण अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद| आशा है स्नेह बनाए रखेंगे |

      Reply
  2. mahendra gupta

    जीने के लिए हर आयु का एक अपना आर प्रस्तुति.आनंद है, जरूरत है बदलते समय के साथ उसे जीने की. सुन्दर प्रस्तुति.

    Reply

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