आर्थिकी

दवा सस्ती, पर कहाँ!

कुमार कृष्णन

स्वास्थ्य किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में केवल सेवा का विषय नहीं बल्कि नागरिक के जीवन और गरिमा से जुड़ा मूल अधिकार है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में राज्य को जनस्वास्थ्य सुधारने का दायित्व सौंपा गया है। इसी दृष्टि से प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना की शुरुआत हुई थी। इसका उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट और जनपक्षधर था—देश के गरीब, निम्न मध्यम वर्ग और सीमित आय वाले नागरिकों को कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना ताकि इलाज आर्थिक बोझ न बन जाए।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक देशों में से एक है, लेकिन विडंबना यह रही कि लंबे समय तक भारतीय मरीजों को ब्रांडेड दवाओं के लिए अत्यधिक कीमत चुकानी पड़ती रही। अनेक अध्ययन बताते हैं कि देश में स्वास्थ्य पर होने वाले निजी खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा दवाइयों पर होता है। लाखों परिवार हर वर्ष केवल इसलिए आर्थिक संकट में चले जाते हैं क्योंकि किसी सदस्य की बीमारी के कारण उन्हें महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे परिदृश्य में जन औषधि योजना सामाजिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरी।

योजना के तहत दावा किया गया कि ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 से 90 प्रतिशत तक कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। महिलाओं के लिए मात्र एक रुपये में ‘जन औषधि सुविधा’ सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना भी इस योजना की उल्लेखनीय उपलब्धि मानी गई। सरकार ने देशभर में हजारों जन औषधि केंद्र स्थापित किए और लगातार लोगों से अपील की कि वे महंगी ब्रांडेड दवाओं के बजाय जेनेरिक दवाओं पर भरोसा करें।

लेकिन किसी भी जनकल्याणकारी योजना की सफलता उसके उद्घाटनों, विज्ञापनों या आंकड़ों से नहीं बल्कि उस अंतिम व्यक्ति के अनुभव से तय होती है जो सेवा लेने केंद्र तक पहुंचता है। यदि वह मरीज दवा लेने के लिए जन औषधि केंद्र जाता है और उसे बार-बार यह उत्तर मिलता है कि “स्टॉक नहीं है”, तो योजना का पूरा नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है।

देश के अनेक जन औषधि केंद्रों पर लंबे समय से हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक स्वास्थ्य, महिलाओं के स्वास्थ्य और बच्चों से संबंधित आवश्यक दवाओं की अनुपलब्धता की शिकायतें सामने आ रही हैं। क्लोपिडोग्रेल-एस्पिरिन, रोजुवास्टैटिन, फेनोफाइब्रेट, एटोरवास्टैटिन, मेटफॉर्मिन, विभिन्न ग्लिप्टिन वर्ग की मधुमेह-रोधी दवाएं, डुलोक्सेटिन, सैक्युबिट्रिल-वलसार्टन, फेरस एस्कॉर्बेट-फोलिक एसिड जैसी अनेक आवश्यक दवाओं के साथ-साथ बच्चों का मल्टीविटामिन ड्रॉप, एंटी-फंगल उत्पाद, माउथ अल्सर जेल, इसबगोल, अश्वगंधा, स्टीविया पाउडर, यहां तक कि ‘जन औषधि सुविधा’ सैनिटरी पैड और बच्चों के डायपर तक कई केंद्रों पर लंबे समय से उपलब्ध नहीं हैं।

यह समस्या केवल किसी एक दवा की कमी नहीं है। यह उस भरोसे के टूटने का संकेत है जिस पर पूरी योजना आधारित है। दवा ऐसी वस्तु नहीं जिसे महीनों बाद खरीदा जा सके। मधुमेह, हृदय रोग या रक्तचाप से पीड़ित मरीजों के लिए नियमित दवा जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यदि उन्हें जन औषधि केंद्र से दवा नहीं मिलती, तो वे विवश होकर निजी मेडिकल दुकानों से कई गुना अधिक कीमत पर वही दवा खरीदते हैं। सबसे अधिक नुकसान उसी गरीब नागरिक को होता है, जिसके लिए यह योजना बनाई गई थी।

यहीं से प्रश्न उठता है कि क्या केवल कम कीमत घोषित कर देना पर्याप्त है, या सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि हर जन औषधि केंद्र पर आवश्यक दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जाए? यही प्रश्न आज जन औषधि योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।

प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना की अवधारणा जितनी सशक्त है, उसकी सफलता उतनी ही अधिक उसकी आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करती है। दवा का अर्थ केवल उसका उत्पादन नहीं है, बल्कि उत्पादन से लेकर गोदाम, परिवहन, वितरण और अंतिम उपभोक्ता तक उसकी समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। स्वास्थ्य क्षेत्र में आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की छोटी-सी चूक भी मरीज के जीवन पर सीधा प्रभाव डाल सकती है। इसलिए जन औषधि केंद्रों में दवाओं का लगातार अभाव केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर प्रश्न है।

आज अनेक जन औषधि केंद्र संचालकों की शिकायत है कि वे दवाओं की मांग समय पर भेजते हैं, लेकिन कई आवश्यक दवाओं की आपूर्ति सप्ताहों और महीनों तक नहीं हो पाती। कुछ दवाएं पोर्टल पर “आउट ऑफ स्टॉक” दिखाई देती हैं, तो कुछ का वितरण ही बंद हो जाता है। परिणाम यह होता है कि मरीज रोज़ केंद्र के चक्कर लगाता है और अंततः निराश होकर निजी मेडिकल दुकानों की ओर लौट जाता है।

इसका सबसे बड़ा असर उन मरीजों पर पड़ता है जिन्हें जीवनभर नियमित दवा लेनी होती है। मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, थायरॉयड, मानसिक स्वास्थ्य और रक्त को पतला रखने वाली दवाओं का सेवन एक-दो दिन भी बाधित हो जाए तो गंभीर चिकित्सीय परिणाम सामने आ सकते हैं। ऐसे मरीजों के लिए दवा कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। इसलिए जन औषधि केंद्र पर “आज दवा नहीं है” केवल एक सूचना नहीं, बल्कि एक संभावित स्वास्थ्य संकट है।

इस स्थिति का दूसरा पक्ष सामाजिक और आर्थिक है। सरकार लोगों से बार-बार अपील करती है कि वे जेनेरिक दवाओं पर विश्वास करें। चिकित्सकों को भी जेनेरिक नाम से दवा लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। किंतु यदि मरीज को जेनेरिक दवा नियमित रूप से उपलब्ध ही न हो, तो उसका विश्वास स्वतः टूटने लगता है। वह सोचता है कि महंगी ब्रांडेड दवा ही अधिक भरोसेमंद है, जबकि वैज्ञानिक रूप से यह धारणा सही नहीं है। इस प्रकार दवाओं की अनुपलब्धता अनजाने में जेनेरिक दवाओं के प्रति अविश्वास भी पैदा करती है।

योजना का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष महिलाओं का स्वास्थ्य भी है। एक रुपये में ‘जन औषधि सुविधा’ सैनिटरी पैड’ उपलब्ध कराने की पहल ने मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर सकारात्मक संदेश दिया लेकिन यदि वही उत्पाद महीनों तक उपलब्ध न हो, तो योजना का सामाजिक उद्देश्य भी प्रभावित होता है। इसी प्रकार बच्चों के पोषण, बुजुर्गों की नियमित दवाएं और दीर्घकालिक रोगों के उपचार से जुड़े उत्पादों की कमी गरीब परिवारों को सबसे अधिक प्रभावित करती है।

दरअसल, स्वास्थ्य योजनाओं की विश्वसनीयता घोषणाओं से नहीं, बल्कि निरंतरता से बनती है। यदि किसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नियमित रूप से अनुपस्थित रहें, तो लोग निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। ठीक उसी प्रकार यदि जन औषधि केंद्रों पर दवाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तो लोग महंगी दवा खरीदने को मजबूर होंगे। तब योजना का मूल उद्देश्य—इलाज का खर्च कम करना—अधूरा रह जाएगा।

यह भी विचारणीय है कि सरकार जन औषधि केंद्रों की संख्या बढ़ाने पर लगातार जोर देती रही है। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन संख्या से अधिक महत्वपूर्ण गुणवत्ता और उपलब्धता है। यदि हजारों केंद्र खुल जाएं, पर उनमें आवश्यक दवाएं न हों, तो यह विस्तार केवल सांख्यिकीय उपलब्धि बनकर रह जाएगा। किसी भी स्वास्थ्य योजना की सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि मरीज को पहली बार केंद्र जाने पर उसकी आवश्यक दवा मिल जाए।

इसलिए अब समय केवल नए केंद्र खोलने का नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था को अधिक सक्षम, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने का है। दवाओं की मांग और उपलब्धता की वास्तविक समय (रियल-टाइम) निगरानी, समयबद्ध आपूर्ति, वैकल्पिक वितरण व्यवस्था, स्थानीय स्तर पर पर्याप्त भंडारण और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू किए बिना इस योजना का उद्देश्य पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सकता।

जन औषधि योजना ने भारत में सस्ती दवा की नई उम्मीद जगाई है। लेकिन यह उम्मीद तभी कायम रहेगी जब हर जन औषधि केंद्र पर आवश्यक दवा केवल सूची में नहीं, बल्कि मरीज के हाथ में भी दिखाई दे।

जन औषधि योजना के सामने खड़ी चुनौती का समाधान असंभव नहीं है। इसके लिए किसी नई योजना या बड़े बजट की आवश्यकता भी नहीं है। आवश्यकता है तो केवल इस बात की कि सरकार इस योजना को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के एक अभिन्न अंग के रूप में देखे, न कि केवल एक सफल प्रशासनिक उपलब्धि के रूप में। किसी भी जनकल्याणकारी कार्यक्रम की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ गया, तो सबसे अच्छी योजना भी अपना प्रभाव खो देती है।

सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि आवश्यक दवाओं की एक राष्ट्रीय अनिवार्य सूची (  तैयार की जाए, जिनका प्रत्येक जन औषधि केंद्र पर हर समय उपलब्ध रहना अनिवार्य हो। मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, कैंसर, अस्थमा, थायरॉयड, मानसिक स्वास्थ्य, महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी दवाओं की कमी किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती। इनके स्टॉक की प्रतिदिन निगरानी हो और जैसे ही किसी केंद्र पर न्यूनतम सीमा से नीचे स्टॉक पहुंचे, आपूर्ति स्वतः शुरू हो जाए।

दूसरा महत्वपूर्ण सुधार पारदर्शिता का है। आज अधिकांश मरीजों को यह पता ही नहीं होता कि जिस दवा की उन्हें आवश्यकता है, वह किस जन औषधि केंद्र पर उपलब्ध है। यदि एक सार्वजनिक डिजिटल प्रणाली विकसित की जाए, जहां प्रत्येक केंद्र का वास्तविक समय का स्टॉक दिखाई दे, तो मरीज अनावश्यक भटकने से बच सकते हैं। इससे व्यवस्था की जवाबदेही भी बढ़ेगी और प्रशासन के लिए कमी वाले क्षेत्रों की पहचान करना आसान होगा।

तीसरा पहलू केंद्र संचालकों से जुड़ा है। अनेक संचालक समय पर आपूर्ति नहीं मिलने, भुगतान संबंधी कठिनाइयों और तकनीकी समस्याओं की शिकायत करते रहे हैं। यदि उन्हें ही आवश्यक सहयोग नहीं मिलेगा, तो वे भी प्रभावी ढंग से योजना का संचालन नहीं कर पाएंगे। इसलिए आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के साथ-साथ केंद्र संचालकों की समस्याओं का समयबद्ध समाधान भी आवश्यक है।

यह भी आवश्यक है कि चिकित्सकों, फार्मासिस्टों और आम जनता के बीच जेनेरिक दवाओं के प्रति वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ाई जाए। वर्षों से ब्रांडेड दवाओं का वर्चस्व केवल विज्ञापनों या बाजार की ताकत से नहीं बना, बल्कि लोगों की धारणाओं से भी जुड़ा रहा है। सरकार जब लोगों से जेनेरिक दवाओं पर भरोसा करने की अपील करती है, तो उसकी यह जिम्मेदारी भी बनती है कि वह इन दवाओं की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करे। विश्वास का निर्माण केवल संदेशों से नहीं, बल्कि अनुभवों से होता है।

दरअसल, जन औषधि योजना भारत के स्वास्थ्य मॉडल में एक व्यापक परिवर्तन का संकेत देती है। यह बताती है कि गुणवत्तापूर्ण इलाज केवल संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए। यदि किसी गरीब किसान, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, बुजुर्ग पेंशनभोगी या निम्न आय वर्ग के कर्मचारी को कम कीमत पर आवश्यक दवा उपलब्ध होती है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत राहत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की भी स्थापना है।

लेकिन सामाजिक न्याय का यह उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब योजना की विश्वसनीयता अक्षुण्ण रहे। दवा की अनुपलब्धता केवल आर्थिक समस्या नहीं है; यह स्वास्थ्य के अधिकार पर प्रत्यक्ष आघात है। एक गरीब मरीज के लिए दवा का न मिलना कई बार इलाज रुक जाने, बीमारी बढ़ जाने या परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाने का कारण बन सकता है। इसलिए इस प्रश्न को केवल प्रशासनिक खामी मानकर नहीं टाला जा सकता।

सरकार ने जन औषधि योजना के माध्यम से एक दूरदर्शी पहल की है। इस पहल की व्यापक सराहना भी हुई है। अब आवश्यकता यह है कि उसका अगला चरण केवल ‘केंद्रों की संख्या बढ़ाने’ का नहीं, बल्कि ‘दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने’ का हो। सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं कि कितने जन औषधि केंद्र खोले गए, बल्कि यह है कि कितने मरीज अपनी आवश्यक दवा लेकर संतोषपूर्वक लौटे।

लोकतांत्रिक शासन में कल्याणकारी योजनाओं का मूल्य उनके प्रचार में नहीं, बल्कि उनकी उपयोगिता में निहित होता है। जन औषधि योजना की सबसे बड़ी सफलता तब होगी, जब किसी गरीब नागरिक को यह चिंता न रहे कि उसकी जीवनरक्षक दवा आज मिलेगी या नहीं। वह यह विश्वास लेकर घर से निकले कि जिस योजना का वादा सरकार ने किया है, वह उसके जीवन में वास्तव में उपस्थित है।

आख़िरकार, स्वास्थ्य सेवा केवल दवाओं का कारोबार नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और राज्य की नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। जन औषधि योजना ने सस्ती दवा का रास्ता खोला है; अब समय है कि उस रास्ते पर दवाओं की निर्बाध उपलब्धता, पारदर्शी व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही के साथ आगे बढ़ा जाए। क्योंकि सस्ती दवा का अधिकार तभी सार्थक है, जब वह दवा समय पर, हर ज़रूरतमंद तक और बिना किसी बाधा के पहुँच सके।