कहानी

लाल रेखा के उस पार

अरुण अट्ठाईस वर्ष का था।

भीड़ से भरी कोच्चि की सड़कों पर वह एक साधारण युवक की तरह चलता था। उसके चेहरे पर मुस्कान रहती, उसकी आवाज़ में सहजता रहती, लेकिन उसके भीतर एक ऐसा प्रदेश बसा था जहाँ किसी और की नज़र कभी नहीं पहुँची थी।

वह एक समलैंगिक पुरुष था। अपनी पहचान को परिवार, रिश्तेदारों और समाज की कठोर निगाहों से बचाते हुए उसने जीवन बिताया था। उसके दिनों में सामान्यता थी, पर उसकी रातें अक्सर अपने ही अस्तित्व के प्रश्नों से भरी रहती थीं।

फिर निखिल आया।

जैसे लंबे सूखे के बाद पहली बारिश। पहली बार अरुण को लगा कि प्रेम भय का दूसरा नाम नहीं है।वे घंटों फोन पर बातें करते। समुद्र तट पर बैठकर लहरों को देखते रहते। भविष्य उनके लिए कोई दूर का सपना नहीं, बल्कि एक साझा संभावना था।लेकिन एक दिन निखिल चला गया।

बिना किसी विदाई के।बिना किसी स्पष्टीकरण के।फोन बंद।संदेश अनुत्तरित।मानो किसी ने जीवन के एक पूरे अध्याय को अचानक फाड़कर हवा में उड़ा दिया हो।समय आगे बढ़ता रहा।फिर एक दिन अरुण को बुखार आया।उसने सोचा, सामान्य संक्रमण होगा।लेकिन बुखार गया नहीं।थकान उसके शरीर में ऐसे बस गई जैसे कोई अदृश्य छाया।अंततः उसने जाँच करवाई।जब रिपोर्ट उसके हाथ में आई, समय ने अपनी गति खो दी।कागज़ पर केवल दो शब्द लिखे थे।एचआईवी पॉज़िटिव।इतना ही।लेकिन उन दो शब्दों का भार उसकी पूरी दुनिया से अधिक था।उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने के भीतर एक लाल रेखा खींच दी हो।एक ऐसी रेखा, जिसके इस पार उसका पुराना जीवन था और उस पार अज्ञात अँधेरा।अस्पताल से बाहर निकलते ही उसने देखा, शहर वैसा ही था।बसें दौड़ रही थीं।ऑटो रिक्शा यात्रियों को लेकर भाग रहे थे।

लोग हँस रहे थे।दुकानें खुली थीं।जीवन अपनी पूरी रफ़्तार में था।लेकिन अरुण को लगा, जैसे संसार आगे बढ़ गया है और वह पीछे छूट गया है।रातें लंबी होने लगीं।नींद उससे दूर चली गई। वह घंटों अँधेरे कमरे में बैठा रहता। कभी-कभी आईने के सामने खड़ा होता और अपने ही चेहरे से नज़रें चुरा लेता। उसे बीमारी से उतना भय नहीं था जितना उस कलंक से, जिसे समाज ने वर्षों से उसके भीतर बो दिया था। वह सोचता,

“क्या अब मैं केवल एक रिपोर्ट हूँ?”

“क्या मेरा नाम इन दो शब्दों के नीचे दब जाएगा?”

“क्या कोई मुझे अब भी प्रेम कर सकेगा?”

एक दिन उसकी माँ ने पूछा,

“क्या हुआ बेटा? तुम इतने चुप क्यों रहने लगे हो?”

अरुण ने मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन मुस्कान उसके होंठों तक पहुँचने से पहले ही टूट गई। वह रो पड़ा। बचपन के बाद शायद पहली बार। उसने कुछ नहीं बताया।केवल अपने आँसुओं को बोलने दिया। महीने बीत गए। धीरे-धीरे उसने डॉक्टर की सलाह पर एक परामर्श समूह में जाना शुरू किया। वहाँ उसने अनेक चेहरे देखे। एक अध्यापक। एक बैंक कर्मचारी। एक गृहिणी। एक छात्र। हर किसी की कहानी अलग थी। लेकिन एक बात समान थी। वे सब एचआईवी के साथ जी रहे थे।और जी भरकर जी रहे थे। उनके चेहरों पर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं थी। वहाँ जीवन था। संघर्ष था। उम्मीद थी।

उसी दिन अरुण ने पहली बार समझा कि एचआईवी कोई अंतिम निर्णय नहीं है। यह जीवन का अंत नहीं। यह केवल जीवन का एक नया अध्याय है। दवाइयाँ हैं। उपचार है। भविष्य है। और सबसे बढ़कर, मानव होने की गरिमा अब भी है। उसने धीरे-धीरे स्वयं को क्षमा करना सीखा। निखिल को नहीं। स्वयं को। उसने अपने भीतर कहा, “मैं कोई रोग नहीं हूँ।” “मैं कोई अपराध नहीं हूँ।” “मैं किसी दंड का पात्र नहीं हूँ।” “मैं अब भी एक मनुष्य हूँ।” एक वर्ष बाद वह फिर समुद्र तट पर खड़ा था। लहरें अब भी किनारे को चूम रही थीं। सूर्यास्त की लालिमा अब भी आकाश में फैल रही थी।

लेकिन अरुण बदल चुका था। वह भय से लौटकर आया हुआ व्यक्ति था। वह अपने टूटे हुए हिस्सों को स्वीकार कर चुका था। वह समझ चुका था कि जीवन हमेशा वैसा नहीं रहता जैसा हम चाहते हैं, फिर भी वह समाप्त नहीं होता। समुद्र की ओर देखते हुए उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान उभरी। उसे लगा, कुछ घाव शायद कभी पूरी तरह नहीं भरते। लेकिन उन्हीं घावों के किनारों पर नया जीवन अंकुरित हो सकता है। और मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही है कि वह टूटने के बाद भी फिर से जीना सीख लेता है। समुद्र की लहरों की तरह, जो हर बार लौटती हैं, हर बार बिखरती हैं, और फिर भी हर बार किनारे तक पहुँच जाती हैं।