राजेश श्रीवास्तव
“मेरी जान बच गई, लेकिन मेरा दोस्त भविष्य की जान चली गई … यह कहते हुए पंकज की फफक कर रोने लगा। हादसे की दहशत और दोस्त को खोने का दर्द उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था। उत्तराखंड निवासी पंकज ने बताया कि वह और उसका दोस्त भविष्य एनीमेशन की दुनिया में कुछ बड़ा करने का सपना लेकर आगे बढ़ रहे थे। हम दोनों ने साथ बैठकर अपने करियर के सपने बुने थे। पंकज ने बताया कि भविष्य अल्मोड़ा का रहने वाला था। दोनों ने एक साथ पढ़ाई कर रहे थे। ताकि एनीमेशन के क्षेत्र में पहचान बनाने की उम्मीद थी। लेकिन इस अग्निकांड की घटना ने सब कुछ बदल दिया। सपने की दुनिया धूमिल हो गई।” पंकज ने कहा कि आज उसकी जान तो बच गई, लेकिन उसका सबसे करीबी दोस्त उससे हमेशा के लिए दूर हो गया। जिस भविष्य के साथ सपने पूरे करने थे, वह सपना अधूरा रह गया। दोस्त की याद आते ही पंकज की आंखों से आंसू छलकने लगते थे। हादसे ने सिर्फ जिदगी नहीं छीनी, कई परिवारों और दोस्तों के सपने भी तोड़ दिए।
यह कहानी सिर्फ एक पंकज की नहीं, हमारे शहर से लेकर दिल्ली तक पसरी आगजनी में हमारे सिस्टम की खोखली व्यवस्था ने न जाने कितने सपनों को घोंट दिया। कितनी जिंदगी लील ली। कितने बच्चे काल के गाल में असमय समय गये। यह सब हादसे का शिकार नहीं इनकी हत्या की गयी। हर बार घटना होने के बाद जांच, जांच समिति, कुछ गिरफ्तारियां, कुछ छापे और फिर कंबल में मुंह छिपाकर सो जाने की प्रवृत्ति ने हमें इतना खोखला बना दिया है कि इस सब के जिम्मेदार अधिकारियों के आंसू भी नहीं आते।
राजधानी लखनऊ में हाल ही में हुए अलीगंज कोचिग अग्निकांड ने शहर के बड़े और भीषण अग्निकांडों की याद दिला दी है। सुरक्षा मानकों की अनदेखी और लापरवाही के कारण हुए इन हादसों में कई लोगों की जान गई और करोड़ों का नुकसान हुआ।
रिहायशी इलाके में नियमों को ताक पर रखकर खड़ी की गई यह कमर्शियल बिल्डिंग न सिर्फ अवैध थी, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से एक ‘डेथ ट्रैप’ बन चुकी थी। ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि राजधानी आग की लपटों से घिरी हो। इससे पहले भी नवाबों का शहर सिस्टम की लापरवाही के कारण कई बार सुलग चुका है। इन हादसों के बाद पीछे रह जाती है परिवार वालों की पीड़ा, रोते-बिलखते परिजन… जिसका हिसाब कोई नहीं दे पाया है।
राज्य में होने वाले अग्निकांडों से अग्निशमन, बिजली व संबंधित विकास प्राधिकरणों ने आज तक कोई सबक नहीं लिया है। यही वजह है कि आज भी राज्य की इमारतें सुरक्षित नहीं हैं। ज्यादातर मामलों में बिजली के शार्ट सर्किट की वजह से आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं। इसके बाद भी विद्युत सुरक्षा निदेशालय ने आज तक आग की घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया। अगर लिया होता तो 75 जिलों में केवल 46 विद्युत सुरक्षा अधिकारी तैनात नहीं होते। अग्निशमन विभाग से आग से सुरक्षा को लेकर 15 मीटर से ऊंची इमारतों के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होता है। सोमवार को लखनऊ के पुरनिया क्षेत्र में जिस इमारत में आग लगी उसकी ऊंचाई 15 मीटर से कम थी। नतीजतन अग्निशमन विभाग ने एनओसी के मामले को लेकर पल्लाझाड़ लिया है।
लखनऊ विकास प्राधिकरण और विद्युत सुरक्षा निदेशालय द्बारा इस इमारत को किस आधार पर एनओसी जारी की, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। भारतीय विद्युत नियमावली 2०23 के अनुसार किसी भी इमारत को एनओसी जारी करने से पहले विद्युत सुरक्षा अधिकारी की रिपोर्ट देखी जाती है। यह रिपोर्ट सही होने के बाद संबंधित विकास प्राधिकरण या अग्निसुरक्षा विभाग इमारत में अग्निसुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता, आने-जाने का रास्ता, आग लगने पर सुरक्षा के अन्य उपायों की जांच के बाद एनओसी जारी करता है।
आग की अधिकतर घटनाएं बिजली की शार्ट सर्किट से हो रही हैं। इसके बाद भी विद्युत सुरक्षा निदेशालय में केवल 46 विद्युत सुरक्षा अधिकारी तैनात हैं। खुद ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि 46 अधिकारी एक सप्ताह के भीतर कैसे सैकड़ों इमारतों की जांच कर एनओसी जारी कर सकते हैं।
शॉर्ट सर्किट से हुए बड़े अग्निकांड
चार मई वर्ष 2०25 को कानपुर के चमनगंज में स्थित प्रेम नगर में जूता फैक्ट्री में शार्ट सर्किट से आग लगने से पांच लोगों की मौत हो गई थी। कानपुर की गल्लामंडी में 13 मई 2०25 को लगी आग से 2० से अधिक वाहन और 1०० से ज्यादा दुकानें भी जलकर खाक हो गईं थीं। कानपुर के पुराना डाकघर रोड क्षेत्र में इसी वर्ष 25 अप्रैल को दुकानों में आग लगने से व्यापारी की जलकर मौत हो गई थी। वर्ष 2०18 में लखनऊ के लेवाना होटल, 15 अप्रैल 2०26 को विकास नगर में 2०० से ज्यादा झुग्गियों में लगी आग सहित पिछले माह आगरा में 14 मंजिला इमारत में हुए अग्निकांड आदि से अगर संबंधित अधिकारियों ने सबक लिया होता तो आज लखनऊ के अग्निकांड में मारे गए युवाओं को बचाया जा सकता था।
पढ़िए राजधानी के 6 बड़े अग्निकांड-
19 जून 2०18 : चारबाग रेलवे स्टेशन के पास स्थित होटल एसएसजे इंटरनेशनल के एसी में शॉर्ट-सर्किट की वजह से आग लगी, जिसने निकट स्थित होटल विराट को भी अपनी चपेट में ले लिया। दोनों होटलों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी। धुएं से दम घुटने और जलने से सात लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग गंभीर रूप से झुलस गए थे।
15 अप्रैल 2०26 : विकासनगर के सेक्टर 11 की एक अवैध झुग्गी बस्ती में आग लग गई। इस बस्ती में लगभग 28० से अधिक मजदूरों के परिवार रहते थे। आग के दौरान झुग्गियों के अंदर रखे 5० से अधिक एलपीजी सिलिडरों में धमाके हुए, जिसने आग को बेकाबू कर दिया। इस हादसे में दो बच्चों की मौत हो गई, जबकि एक हजार से अधिक लोग बेघर हो गए।
15 जून 2०26 : नगराम के देवती गांव स्थित एक पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट हो गया था। विस्फोट की चपेट में आकर फैक्ट्री मालिक की भांजी खुजौली गांव निवासी मारिया की मौत हो गई थी, जबकि 16 वर्षीय मोहित घायल हो गया था। सुरक्षा मानकों की अनदेखी को लेकर फैक्ट्री मालिक के खिलाफ लापरवाही का मामला दर्ज किया गया था।
5 सितंबर 2०22 : हजरतगंज स्थित चार मंजिला होटल लेवाना सुइट्स में सुबह के समय भीषण आग लग गई थी। होटल में आपातकालीन निकास न होने और खिड़कियों पर लोहे के ग्रिल लगे होने के कारण लोग अंदर ही फंस गए। हादसे में झुलसने और दम घुटने से चार लोगों की जान चली गई थी और कई लोग घायल हुए थे।
26 मार्च 2०15 : अमीनाबाद की मेडिसिन मार्केट में शॉर्ट-सर्किट से भीषण आग लग गई। आग ने जल्द ही विकराल रूप धारण कर लिया और कई परिसर इसकी चपेट में आ गए। संकरी गलियां होने के कारण फायर ब्रिगेड को अंदर घुसने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। इस हादसे में करोड़ों रुपये की दवाएं और लगभग 5० से अधिक दुकानें जलकर खाक हो गईं।
15 मई 2०25 : दिल्ली से बिहार जा रही एक स्लीपर बस जब लखनऊ बाईपास रूट से गुजर रही थी, तब उसमें अचानक आग लग गई। बस में क्षमता से अधिक लोग सवार थे। आग इतनी तेजी से फैली कि अंदर सो रहे यात्रियों को संभलने का मौका नहीं मिला। घटना में पांच यात्रियों की मौत हो गई थी, जबकि कई लोगों ने खिड़कियों से कूदकर जान बचाई।