कविता

बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥

एक घुटी-सी चीख है, सरयू तट की बात।
बिन अपराधी श्रवण को, मार गया सम्राट॥
राजमुकुट के तीर ने, कैसा किया प्रहार।
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥

सरयू रोई मौन हो, काँपा सारा घाट।
करुण पुकारें गूँजतीं, सुनता रहा प्रभात॥
सेवा के उस पुण्य पर, टूटा कैसा वार—
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥
राजमुकुट के तीर ने, कैसा किया प्रहार।
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥

काँधे पर संसार था, आँखों में विश्वास।
माता-पिता के प्रेम का, चलता था इतिहास॥
सत्ता की एक भूल ने, तोड़ा वह परिवार—
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥
राजमुकुट के तीर ने, कैसा किया प्रहार।
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥

जल का पात्र उठाए वह, करता था उपकार।
प्यासे अंधे माँ -पिता, थे उसका संसार॥
सेवा को अपराध चुन, हुआ कैसा व्यवहार—
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥
राजमुकुट के तीर ने, कैसा किया प्रहार।
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥

पछतावे के अश्रु से, धुलते नहीं अपराध।
एक क्षणिक अज्ञान भी, देता जीवन-व्याध॥
समय लिखे हर कर्म का, सच्चा लेखा-भार—
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥
राजमुकुट के तीर ने, कैसा किया प्रहार।
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥

न्याय बिना वैभव सभी, होते हैं निष्प्राण।
राजदंड से श्रेष्ठ है, मानवता का मान॥
सिंहासन भी पूछते, कैसा यह अधिकार—
बिन अपराधी श्रवण का, छीना जीवन-सार॥
‘सौरभ’ अब इतिहास भी, देता यही पुकार।
निर्दोषों के रक्त पर, टिकता नहीं विस्तार॥

✍️ — डॉ. सत्यवान सौरभ