आखिर बिनायक सेन ही क्यों?

दानसिंह देवांगन

कसाब संभालेंगे एटीएस, अफजल गुरू होंगे जम्मू-कश्मीर के राज्‍यपाल!

नक्सलियों की मदद के लिए राजद्रोह के आरोप में उम्र कैद की सजा काट रहे बिनायक सेन को योजना आयोग की स्वास्थ्य समिति का सदस्य बनाकर केंद्र सरकार ने दो करोड़ 21 लाख छत्तीसगढ़ियों के मुंह पर ऐसा तमाचा मारा है, जिसकी गूंज बरसों तक सुनाई देती रहेगी। ये उन वीर जवानों का भी अपमान है, जिन्होंने हमारी सुरक्षा के लिए बस्तर के घने जंगलों में अपना सबकुछ न्यौछावर  कर दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस आयोग के अध्यक्ष हैं, इस नाते बिनायक सेन की सदस्यता की जानकारी उन्हें भी होना चाहिए। मैं उनसे पूछना चाहता हूं, प्रधानमंत्री जी क्या आप इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि आपको हजारों मासूम आदिवासियों के रक्त से सने बस्तर की भयावह तस्वीर दिखाई नहीं देती।  क्या आपको नक्सली घटनाओं में अनाथ हो चुके बच्चों का दर्द भी सुनाई नहीं पड़ रहा। ये कैसा देश है,जहां उम्रकैद की सजा काट रहे लोगों को सरकारी पदों पर आसीन किया जा रहा है। जिस आतंकवादी को देश की अस्मिता और गौरव पर हमला करने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा दे दी है, उसे फांसी देने में डर लगता है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है जो एक सजायाफ्ता मुजरिम को योजना आयोग का सदस्य बनाना पड़ा। हमारा बिनायक सेन से     कोई निजी दुश्मनी नहीं है, उन्हें स्वास्थ्य समिति के सदस्य ही क्यों, देश का गृहमंत्री बना दीजिए, हमें कोई अफसोस नहीं होगा, पर पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाइात बरी तो हो जाने दीजिए। जब चपरासी या क्लर्क की नौकरी में भी छोटे मोटे मामलों में दोषी व्यक्ति को जगह नहीं दी जाती। देशद्रोह जैसे संगीन आरोप में सजा काट रहे मुजरिम को सरकार अपना हिस्सा कैसे बना सकती है। अब क्या उम्रकैद की सजा काट रहे लोग इस देश के भाग्य का फैसला करेंगे? बिनायक सेन इस देश की सेहत बनाएंगे? मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब एटीएस संभालेंगे? संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू जम्मू-कश्मीर के रायपाल होंगे और गलती से दाउद इब्राहिम पुलिस के हत्थे चढ़ गए तो वे देश का गृहमंत्रालय संभालेंगे? ऐसी होगी हमारे देश की तस्वीर और हम सब यूं ही हाथों में चूड़ियां पहनकर घर पर दुबककर बैठे रहेंगे।

आश्चर्य है, इतनी बड़ी घटना हो गई, पर छत्तीसगढ़ के अलावा किसी भी प्रदेश या पार्टी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। क्या  नक्सली हमला सिर्फ छत्तीसगढ़ तक ही सीमित है। क्या बस्तर में रोज मारे जा रहे मासूम आदिवासी भारत के नागरिक नहीं है।  क्या नक्सलियों से लोहा लेते शहीद वीर जवान इस देश का हिस्सा नहीं है।

इस रविवार को ही छत्तीसगढ़ सीमा से लगे झारखंड में नक्सलियों ने एक परिवार के पांच लोगों को गोलियों से छलनी कर दिया। घर में छोटे बेटे की शादी का उत्सव चल रहा था। दुल्हन को घर में पहुंचे 24 घंटे भी नहीं हुए थे और नक्सलियों ने उसका सुहाग उजाड़ दिया। सोमवार को जशपुर थाने के अंतर्गत डाकेया गांव में चार सगे भाइयों को मौत के घाट उतार दिया। कसूर क्या था, ये न तो नक्सलियों को पता है और न ही इन परिवारों को। बस सामने आए और भेंट चढ़ गए उन जल्लादों के, जिनकी पैरवी बिनायक सेन जैसे लोग करते हैं।

ये तो सिर्फ पिछले दो दिनों की घटना है, ऐसी घटनाएं छत्तीसगढ़ और झारखंड समेत नक्सल प्रभावित इलाकों में लगभग हर दिन होती हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा मानते हैं और दूसरी ओर उन्हीं    नक्सलियों से सांठगांठ के आरोप में सजा काट रहे बिनायक सेन को अपनी अध्यक्षता वाली समिति में सदस्य बनाते हैं। ये कैसे देश चला रहे हैं प्रधानमंत्री जी? आपका फैसला देशहित में नहीं है, इसलिए देशभर में इसका विरोध होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा0 रमनसिंह ने योजना आयोग की बैठक  का बहिष्कार कर इसकी शुरूआत कर दी है। मैं डा0 रमनसिंह के निर्णय से बिलकुल सहमत हूं कि जिस बैठक में उम्रकैद की सजा काट रहे लोग बैठेंगे, वहां करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुख्यमंत्री कैसे बैठ सकते हैं? दूसरे राज्‍यों के मुख्यमंत्रियों को भी डा0 रमनसिंह का साथ देना चाहिए। राज्‍य सरकार के इस निर्णय पर कुछ लोग कह रहे हैं कि इससे राज्‍य को मिलने वाले अनुदान में कटौती हो सकती है, तो मेरा मानना है कि कटौती होती है होने दीजिए, पर मुख्यमंत्री को उस बैठक में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।  हम छत्तीसढ़िया दिन में एक बार खाएंगे। फोरलेन नहीं, हम टू लेन पर चल लेंगे, जो संसाधन हमारे पास उपलब्ध है, उसी में काम चला लेंगे, पर बिनायक सेन जैसे लोगों के साथ बैठने का अपमान हम नहीं सह पाएंगे।

नक्सलियों की लड़ाई छत्तीसगढ़ या मुख्यमंत्री रमनसिंह के खिलाफ नहीं है, बल्कि समूचे भारत के खिलाफ है। इसलिए जो आज हमारे साथ हो रहा है, कल आपके साथ भी हो सकता है। आज हमारी बहनों के सिंदूर उजड़ रहे हैं, कल आपकी बहनों की बारी भी आएगी। हमने तो अपना सबकुछ गंवा दिया, पर हम नहीं चाहते कि आप के घरों में भी लाशों का ढेर बिछे। इसलिए आइए, हम सब केंद्र सरकार के इस फैसले का पूरी ताकत से विरोध करें।

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