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    Homeराजनीतिविवाह की उम्र : सामाजिक सुधार की अभूतपूर्व पहल

    विवाह की उम्र : सामाजिक सुधार की अभूतपूर्व पहल

    वर्तमान समय में अनादि काल से निर्बाध चली आ रही कुछ प्रथाएं आज कुरीति के रूप में दृष्टव्य हाती दिखाई दे रही हैं। फिर चाहे वह विवाह की आयु का विषय हो, या फिर रीति रिवाजों से संबंधित अन्य प्रचलित प्रथाएं, समय के अनुसार इनको बदलना ही चाहिए, लेकिन कुछ रूढि़वादी मानसिकता के व्यक्ति या इस दिशा में सक्रिय संस्थाएं ऐसे किसी परिवर्तन का विरोध करके न केवल भारतीय समाज को पीछे धकेलने का कार्य कर रहे हैं, बल्कि देश के उत्थान के मार्ग में भी अवरोधक बनकर खड़े हैं। भारतीय समाज में कई प्रकार की प्रथाएं आज पत्थर की लकीर की तरह स्थापित हो चुकी हैं, इसी कारण आज के समय में सामाजिक असमानता का बहुत बड़ा दोष पनप रहा है। इस दोष के कारण ही समाज में भेदभाव की भावना घर कर रही है। इसी कारण सामाजिक विद्वेष की भावना निर्मित होती है।कम आयु में किसी बच्ची का विवाह करने को एक प्रकार से जीवन की बर्बादी निरूपित किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं कही जाएगी। हालांकि आज के समय में इतनी जागरुकता तो दिखाई देती है कि देश में बाल विवाह नहीं हो रहे हैं, फिर भी अपवाद तो मिल ही जाते हैं। बाल विवाह करने का प्रचलन कब और कैसे आया, इसकी प्रामाणिक जानकारी तो नहीं है, लेकिन ऐसा सुना जाता है कि जब मुगल शासकों के अत्याचार का शिकार भारत की युवतियां और मासूम बच्चियां होने लगी थी, तब भारत समाज ने इन बच्चियों को मुगलों की कुदृष्टि से बचाने के लिए इस प्रथा को प्रारंभ किया। हालांकि इसके दुष्परिणाम भी सामने आए। जब किसी बच्ची का विवाह कम उम्र में कर दिया जाए तो यही कहा जाएगा कि उसके बच्चे भी जल्दी ही होंगे। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी जिस बच्ची का बचपन ठीक से बीता नहीं, उसे एक और बचपन को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी असमय ही मिल जाती है। ऐसी स्थिति में न तो वह अपना विकास कर पाती है और न ही मासूम बच्चे की ठीक प्रकार से परवरिश ही कर पाती है। जिससे दोनों ही शारीरिक रूप से विकसित नहीं हो पाते।भारत की संस्कृति में बच्चियों को देवी के रूप में देखने की परंपरा रही है, जो आज भी दृष्टिगोचर होती है। प्रत्येक नवरात्रि पर्व पर बच्चियों में देवी के दर्शन होते हैं। इसलिए ही भारत के दर्शन में कहा जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। इसका आशय यही है कि उस देश में देव संस्कृति का प्रवाह अविरल रूप से प्रवाहित होता रहता है। ऐसी स्थिति में वह देश संस्कारों की सुरभित बगिया के रूप में महकती रहती है। पुरातन काल से यह मान्यता भी बनी हुई है कि किसी भी बालक की प्रथम गुरू उसकी माता होती है, लेकिन जब माता ही पूर्ण रूप से विकसित नहीं होगी तो स्वाभाविक रूप से यही कहा जा सकता है कि वह गुरू की भूमिका ठीक प्रकार से नहीं निभा सकती। इसलिए किसी भी बच्ची का विवाह उचित आयु में करने से सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।आज के समय का अध्ययन किया जाए तो यही परिलक्षित होता है कि एक परिवार के सदस्यों की एक ही विषय पर अलग-अलग राय होती है। अलग राय की यह शैली बाहर के वातावरण से मिलती है। जब यह शैली व्यक्ति के आचरण का हिस्सा बन जाती है, तब परिवार में विघटन की स्थितियां पैदा होती हैं। इसलिए परिवार के साथ ही देश में भी संस्कृति की रक्षा करते हुए आवश्यक सुधार भी करने चाहिए। लड़कियों की विवाह की आयु कम करने का कदम इसी दिशा में बहुत ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस कदम की बहुत लम्बे समय से मांग की जा रही थी। वैसे भी आज के समय में लड़कियां स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने लिए एक मजबूत आधार निर्मित करना चाहती हैं। इसलिए युवतियां अपने विवाह को लेकर जल्दबाजी नहीं करतीं। इसलिए समाज में देखा जा रहा है कि लड़कियां अधिक आयु में विवाह करने लगी हैं। इसमें एक खास बात यह भी है कि भारतीय संस्कृति में व्यक्तिगत जीवन के लिए चार आश्रम की व्यवस्था है, जिसमें औसत आयु सौ वर्ष मानी गई है और इसी के आधार पर विभाजन किया गया है। प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्य, द्वितीय ग्रहस्थ, तृतीय वानप्रस्थ और चतुर्थ संन्यास है। पिछले कुछ वर्षों में औसत आयु में कमी का अनुभव किया जा रहा था, इसलिए विवाह की उम्र भी कम कर दी गई। अब लड़कियों के विवाह की आयु 21 वर्ष करने का निर्णय लिया गया है, जो युवतियों के हक में अभूतपूर्व माना जा रहा है।हम जानते ही हैं कि हम सभी का जीवन प्राकृतिक है, प्रकृति के पंचतत्वों से निर्मित यह जीवन जब तक मर्यादित रहेगा, तब तक यह ठीक प्रकार से कार्य करता रहेगा और जब प्रकृति की अवहेलना होती है, तब स्वाभाविक रूप से यह अनिष्ट की ओर अपने कदम बढ़ाने को तत्पर हो जाता है। इसके लिए एक पौधे का उदाहरण लिया जा सकता है। पौधा नवजात होता है, कुछ समय पश्चात उसमें पत्तियां आने लगती है यानी वह अपना विकास कर रहा होता है, लेकिन फूल और फल आने की अवस्था आने के लिए प्रतीक्षा करनी होती है। एक निश्चित समय के पश्चात ही उससे फल की प्राप्ति होती है। इससे पूर्व अगर फूल और फल लगता है तो वह पूरी तरह से विकास नहीं कर सकता। इसी प्रकार हमारे शरीर की अवस्था है। युवतियों के बारे में यह पौधे से पेड़ बनने वाली स्थिति चरितार्थ होती दिखाई देती है। वर्तमान में समाज के कई परिवार अपनी लड़कियों का विवाह बहुत जल्दी कर देते हैं, जिसका खामियाजा लड़की को भुगतना होता है। केन्द्र सरकार बच्चियों के विवाह की उम्र 21 वर्ष करना एक ऐसा कदम है जो बच्चियों को सुरक्षित हक की प्राप्ति करता है। भारत सरकार से आग्रह यह भी है कि यह कानून सारे समाजों पर एक समान रूप से लागू करना चाहिए और समाज के हर वर्ग को भी इसका पूर्ण रूप से समर्थन करना चाहिए।

    सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी
    सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी
    स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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