लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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-गिरीश पंकज

वरिष्ठतम पत्रकार और लेखक रामशंकर अग्निहोत्रीजी का अचानक यूं चला जाना हजारों लोगों को दुःख में डुबो गया. गत ७ जुलाई की सुबह उनका निधन हो गया. संध्या देवेन्द्रनगर स्थित श्मशान घाट में सैकड़ों लोगो ने उन्हें अश्रुपूरित विदाई दी. उनके अंतिम संस्कार में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री समेत अनेक मंत्री, सांसद एवं विधायक शामिल हुए. उनको अंतिम विदाई देने के लिये मीडिया जगत के भी अनेक नामचीन चेहरे मौजूद थे.

एक सप्‍ताह पहले की बात है. उनसे मेरी मुलाकात हुई थी. उन्होंने बताया था, कि वे राममनोहर लोहिया पर एक पुस्तक सम्पादित कर रहे हैं. मानव अध्ययन शोधपीठ, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के अध्यक्ष के रूप में वे गाँधी,लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों पर एक बड़ा सेमीनार भी करने की तैयारी में थे. उनका उत्साह देख कर हर कोई दंग रह जाता था. वे पचासी साल के हो चुके थे और बेहद स्वस्थ और फुर्तीले नज़र आते थे. इस अवस्था में भी किसी युवक की तरह सक्रिय रहते थे. मैंने उनका बहुत नाम सुन रखा था. उनके अनेक राष्ट्रवादी लेख भी इधर-उधर पढ़ता रहता था. लेकिन पिछले कुछ सालों से उनका रायपुर आना-जाना कुछ बढ़ गया था, इसलिए किसी न किसी कार्यक्रम में उनसे भेंट हो जाती थी.

मैंने उन्हें हमेशा एक विनम्र एवं नैतिक व्यक्ति के रूप में ही पाया. वे अनुभव की आंच में तप कर खरे हुए थे. अनेक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के बात वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय मानव अध्ययन शोधपीठ के अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे थे. आज जब विश्वविद्यालय के कुलपति सच्चिदानंद जोशी से उनके बारें में चर्चा होने लगी, तो उन्होंने बताया, कि वे विश्वविद्यालय में भी बेहद सक्रिय रहते थे. अखबारों में कोई महत्वपूर्ण खबर छपती थी तो वे कटिंग काट कर सन्दर्भ सामग्री के रूप में सहेज कर रखने लिये हमलोगों को दे दिया करते थे. तीन दिन पहले जब अग्निहोत्री जी अस्पताल में भरती हुए तो कृत्रिम साँस के लिये उन्हें मास्क लगाया गया था. लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति उन्हें देखने पहुंचता, वे मास्क निकलकर भावी कार्यक्रमों के बारे में बात करने लग जाते थे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह, और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल आदि भी उन्हें देखने पहुंचे. सभी से उन्होंने कहा, कि अब मै स्वस्थ हो कर फिर सक्रिय होना चाहता हूँ. प्रदेश के मंत्री राजेश मूणत ने चर्चा के दौरान मुझे बताया कि, पिछले दिनों उन्होंने लगा कि उनका स्वास्थय कुछ ज्यादा खराब हो रहा है, तो उन्होंने कहा था, ”मैं भोपाल जाऊँगा चेकअप कराने”, तो राजेश मूणत ने उनसे कहा, था कि ”वहां क्यों जायेंगे. यही आपका बढ़िया इलाज़ हो जाएगा”. इस पर मुसकरा कर चुप हो गए.

अग्निहोत्री जी भाजपा के थिंक टैंक की तरह थे. इसलिए भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता से उनके जीवंत और आत्मीय सम्बन्ध थे. यही कारण है, कि आज जैसे ही उनके निधन का दुखद समाचार मिला, लोग शोक में डूब गए. उन्हें श्रद्धांजलि देने लगभग पूरा मंत्रिमंडल ही डा. राजेंद्र दुबे के निवास पर उमड़ पडा था. रायपुर में उनका कोई निकट का रिश्तेदार नहीं था. लेकिन जब मै उनको श्रद्धांजलि देने डा. दुबे के निवास पर पहुंचा तो देख कर दंग रह गया कि अनेक मंत्री और अनेक महत्वपूर्ण भाजपा नेता वहां मौजूद है, और उनके अंतिम संस्कार की तैयारियों में व्यस्त है. ऐसा बहुत कम होता है, कि किसी के निधन के बाद इतने लोग एकत्र हों, मगर अग्निहोत्री जी इतने महान व्यक्ति थे, कि उनके अंतिम दर्शन के लिये सैकड़ों लोग लालायित थे. भाजपा के लोग तो खैर थे ही, मेरे जैसे अनेक पत्रकार और अन्य दूसरे लोग भी पहुँच गए थे. भाजपा के लोगो को उन्होंने बहुत कुछ दिया है, लेकिन हम जैसे पत्रकारों को भी उन्होंने बहत कुछ दिया. आज जब पत्रकारिता अपने मूल्य से गिर रही है, तब अग्निहोत्री जी ने समझाया कि विपरीत स्थितियों में भी खड़े रहना पत्रकार का कर्तव्य है.

अग्निहोत्री जी ने आपातकाल और रामजन्‍मभूमि आंदोलन से जुडी खबरों को वैश्विक क्षितिज पर प्रसारित करने में उन्‍होंने उल्‍लेखनीय भूमिका निभाई। शायद इसीलिए वे संघ और भाजपा के चहेते थे. विचारधारा से वे भले ही किसी एक वर्ग के चहेते बन गए थे, मगर उनकी राष्ट्रवादी पत्रकारिता के कारण हम जैसे लोग भी उनसे सीखते रहते थे. छोटो को स्नेह देना, उनकी तारीफ करना कोई अग्निहोत्री जी से सीखे. पिछले दिनों एक कार्यक्रम में मैंने ”दासबोध” के हिंदी अनुवाद के सौ साल होने पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त किये थे. अग्निहोत्री जी श्रोता के रूप में सामने विराजमान थे.उनके सामने बोलने में संकोच हो रहा था, फिर भी मैंने अपनी बात कही. कार्यक्रम के बाद उन्होंने मेरी तारीफ करते हए कहा, कि आज ऐसे ही सोच की ज़रुरत है. इसके पहले भी कुछ अवसरों पर आपने मुझे प्रोत्साहित ही किया. बड़े लोग सचमुच बड़े होते है. मगर सामने वाले को अपने बड़प्पन का अहसास नहीं होने देते.

पाँच दिन पहले जब उन्होंने मुझसे कहा, कि गाँधी, लोहिया, और दीनदयाल जी पर कार्यक्रम करना है, तो मैंने कहा, मेरे पास दीनदयाल जी से सम्बंधित जानकारियाँ नहीं है, तो वे फ़ौरन बोले, एक मिनट रुकिए. फिर वे बाहर गए और कर में रखी एक पुस्तक ले आये.यह पुस्तक दीनदयाल उपाध्याय जी पर केन्द्रित थी. उनका एक उपन्यास अम्बेडकर जी पर है. उसकी तारीफ सुनी है. पढ़ नहीं पाया हूँ. अब पढ़ना चाहूँगा, ताकि उनके औपन्यासिक शिल्प के भी रूबरू हो सकूं. उनकी कुछ कविताये मैंने पढ़ी है. वे देश के नवनिर्माण में बेचैन रहने वाले राष्ट्रवादी लोगों में थे. अपना तन-मन-धान राष्ट्र की सेवा को समर्पित करने के लिये तैयार रहने वाले. वे अक्सर कहा करते थें कि अब अंतिम साँस तक रायपुर में रह कर राष्ट्र की सेवा करना चाहता हूँ. उन्होंने अपना वचन निभाया और रायपुर में ही अंतिम साँस ली. उनके अवदान-सम्मान की बात करुँ तो श्री अग्निहोत्री 1975 से 1977 तक एकीकृत समाचार न्यूज एजेंसी नई दिल्ली (आपातकाल) के उप समाचार संपादक रहे। वर्ष 1978 से 1980 तक उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार ( महाराष्ट्र-गुजरात ) मुंबई के क्षेत्रीय व्यवस्थापक रहे । 1981 से 1983 तक हिन्दुस्थान समाचार के विशेष संवाददाता के रूपमें काठमांडूमें भी रहे। आप हिन्दुस्थान समाचार, नई दिल्ली के प्रधान संपादक भी रह चुके थे. श्री अग्निहोत्री 1986 से 1989 तक पांचजन्य साप्ताहिक, दिल्ली के प्रबंध संपादक भी थे. 1989 से 1990 तक श्री राम कार सेवा समिति, सूचना केन्द्र, नई दिल्ली के निदेशक तथा 1992 में श्री रामजन्म भूमि मीडिया सेंटर, रामकोट, अयोध्या के निर्देशक थे। उन्होंने 1991 से 1998 तक मीडिया फोर फीचर्स लखनऊ का प्रकाशन और संपादन किया। वे 1999 से 2002 तक भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय मीडिया प्रकोष्ठ, नई दिल्ली में रहे। उन्होंने 2002 से 2004 तक मीडिया वाच का संपादन और प्रकाशन किया।सन् २००८ के लिए माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार से सम्‍मानित रामशंकर 14 अप्रैल, 1926 को मध्य प्रदेश के सिवनी मालवा में जन्मे श्री अग्निहोत्री जी ने सागर विश्वविद्यालय से बी.ए. करने के बाद उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया। आप 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, महाकौशल के संगठन मंत्री नियुक्त हुए। वे दैनिक युगधर्म, नागपुर के सह संपादक रहे। सांध्य दैनिक आकाशवाणी (दिल्ली) केभी आप संपादक रह चुके थे। कश्मीर सत्याग्रह में भी उनकी अहम् भूमिका थी। आप पांचजन्य (मध्य भारत संस्करण) के भी संपादक रहे। मासिक राष्ट्रधर्म, लखनऊ का सम्पादन भी आपने किया । युगवार्ता, फीचर्स सर्विस, नई दिल्ली के संपादक थे। 1970 से 1975 तक आप हिन्दुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के ब्यूरो प्रमुख रहे। 1971 में आप ने एक और जौहर दिखाया. आपने युद्ध-संवाददाता के रूप में भी कार्य कर अपनी जांबाजी का परिचय दिया था. आप 2004 में हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति के अध्यक्ष रहे।

एक साहित्यकार के रूप में उनके अवदान को देखें तो उन्होंने बहुत अधिक रचनाएँ भले ही न की हों, लेकिन उन्होंने जितना लिखा, उत्कृष्ट ही लिखा. उनका एकमात्र काव्य संग्रह सत्यम एकमेव काफी चर्चित रहा है। अम्बेडकर परकेन्द्रित उपन्यास ”मसीहा’ को पढ़ चुके लोगो का मानना है, कि किसी व्यक्ति के जीवन पर केन्द्रित ऐसे उपन्यास कम ही देखने में आते है. अनेक देशों का भ्रमण कर चुके अग्निहोत्री जी को इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा डा. नगेन्द्र पुरस्कार, राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास द्वारा स्व. बापूराव लेले स्मृत्ति पत्रकारिता पुरस्कार तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल द्वारा लाला बलदेव सिंह सम्मान प्रदान किया गया था. श्री अग्निहोत्री एक तरह से एकांत साहित्य साधक थे और एकनिष्ठ पत्रकार थे. उनके अनेक शिष्य आज पत्रकारिता जगत में अपना डंका बजा रहे है. उनके साथ के लोगों के उनके निधन पर गहरा दुःख हुआ. देश के कोने-कोने में उनके चाहने वाले आज फोन कर-कर के सम्बंधित जनों से बातें करते रहे. शवयात्रा में मंत्रीमंडल के अनेक लोग शामिल हुए. श्मशानघाट में मुख्यमंत्री भी पहुँच गए थे. सब ग़मगीन थे. उन सबके बीच से ऐसा व्यक्ति चला गया था, जिसके जाने की कोई उम्मीद ही नहीं थी. सब इस बात को लेकर भी दुखी थें कि उनको सही वैचारिक राह अब कौन दिखाएगा. पत्रकारिता की नैतिक मूल्य की परम्परा अब ख़त्म हो रही है, लेकिन जब मै अग्निहोत्री जी को देखता तो सुकून मिलता था, संतोष होता था कि एक परम्परा अभी ज़िंदा है. आज वे हमारे बीच नहीं है, उनके जाने के बाद चिंता हो रही है कि अब ऐसे लोग हम कहाँ से लायेंगे, जो बरगद होते हुए भी पौधों को पनपने का मौका देते थे.

One Response to “अग्निहोत्रीजी ने पत्रकारिता के मूल्‍यों के साथ कभी समझौता नहीं किया”

  1. नारायण भूषणिया

    रामशंकर जी अग्निहोत्री की जीवनी प्रकाशित कर गिरीश भाई आपने बहुत अच्छा किया. श्रध्येय अग्निहोत्री जी के सम्पर्क में मैं डा.राजेन्द्र दुबे के माध्यम से आया.शांत और सरल व्यक्तित्व के स्वामी अग्निहोत्री जी 85 की उम्र में भी 25 के ऐसे नवजवान लगते थे जिन्हें 60 साल का अनुभव था.अभी हाल ही में डा.दुबे के यहाँ 27 जून को तो उनसे मुलाकात हुई थी, वही आखरी मुलाकात बन जाएगी किसे मालूम था. ऐसे महान व्यक्तित्व ने अंतिम समय में रायपुर को अपनी कर्मभूमि बनाया यह हम सब के लिए गौरव की बात है. ऐसे महान व्यक्ति ने अपनी स्थूल काया को तो त्याग दिया है पर वो सूक्ष्म रूप में हम पत्रकारों के बीच रहकर प्रेरणा देते रहेंगे ऐसी भगवान से कामना है. मैं उन्हें शत शत नमन करता हूँ.
    नारायण भूषणिया

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