संतान की दीर्घायु व सुखी जीवन हेतु अहोई अष्टमी व्रत आज

भगवत कौशिक। भारत पूरे विश्वभर में अपनी अनोखी संस्कृति व परम्पराओं के लिए जाना जाता है। यह देश त्योहारों का देश है और यह सभी त्योहार हमारे संस्कारों तथा वैदिक परंपराओं को आज की पीड़ी तक पहुँचाने का एक माध्यम है। इन में से एक त्योहार अहोई अष्टमी का है, जिसमे सभी माताएं अपनी संतान की दीर्घ आयु और मंगलमय जीवन के लिए उपवास रखती हैं।प्राचीन काल से ही माताएं अहोई अष्टमी का व्रत करती हैं। इसे ‘होई’ नाम से भी जाना जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत विशेष रूप से संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ, जीवन में सफलता और समृद्धि के लिए किया जाता है। इस व्रत में माता पार्वती को ही अहोई अष्टमी माता के रूप में पूजा जाता है।हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत और पर्व मनाया जाता है। माताएं यह व्रत अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ, जीवन में सफलता और समृद्धि के लिए प्रतिवर्ष करती हैं।
अहोई अष्टमी व्रत का महत्व
हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का विशेष महत्व है। यह व्रत संतान की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है।कहते हैं कि अहोई अष्टमी का व्रत कठिन व्रतों में से एक है।इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं।मान्यता है कि अहोई माता की विधि-विधान से पूजन करने से संतान को लंबी आयु प्राप्त होती है।इसके साथ ही संतान की कामना करने वाले दंपति के घर में खुशखबरी आती है।अहोई अष्टमी तिथि एवं पूजा मुहूर्त
गुरुवार को दोपहर 12 बजकर 49 मिनट से प्रारंभ होगी जोकि 29 अक्टूबर शुक्रवार को दोपहर 2 बजकर 9 मिनट तक रहेगी।अहोई अष्टमी के दिन शाम की पूजा और तारों को करवे से अर्घ्य देने का महत्व है। ऐसे में अहोई अष्टमी का व्रत 28 अक्टूबर गुरुवार को रखा जाएगा। अहोई माता की पूजा का मुहूर्त 28 अक्टूबर शाम को 1 घंटे 17 मिनट का है। जोकि शाम 5 बजकर 39 मिनट से शाम 6 बजकर 56 मिनट तक पूजा का शुभ मुहूर्त है। 28 अक्टूबर को शाम 6 बजकर 3 मिनट से व्रती महिलाएं तारों को देखकर अर्घ्य दे सकती हैं।
अहोई अष्टमी व्रत कथा
एक समय एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसका भरापूरा परिवार था। उसके 7 बेटे, एक बेटी और 7 बहुएं थीं। दिपावाली से कुछ दिन पहले उसकी बेटी अपनी भाभियों संग घर की लिपाई के लिए जंगल से साफ मिट्टी लेने गई। जंगल में मिट्टी निकालते वक्त खुरपी से एक स्याहू का बच्चा मर गया। इस घटना से दुखी होकर स्याहू की माता ने साहूकार की बेटी को कभी भी मां न बनने का श्राप दे दिया। उस श्राप के प्रभाव से साहूकार की बेटी का कोख बंध गया।श्राप से साहूकार की बेटी दुखी हो गई। उसने भाभियों से कहा कि उनमें से कोई भी ए​क भाभी अपनी कोख बांध ले। अपनी ननद की बात सुनकर सबसे छोटी भाभी तैयार हो गई। उस श्राप के दुष्प्रभाव से उसकी संतान केवल सात दिन ही जिंदा रहती थी। जब भी वह कोई बच्चे को जन्म देती, वह सात दिन में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता था। वह परेशान होकर एक पंडित से मिली और उपाय पूछा।
पंडित की सलाह पर उसने सुरही गाय की सेवा करनी शुरु की। उसकी सेवा से प्रसन्न गाय उसे एक दिन स्याहू की माता के पास ले जाती है। रास्ते में गरुड़ पक्षी के बच्चे को सांप मारने वाली होता है, लेकिन साहूकार की छोटी बहू सांप को मारकर गरुड़ पक्षी के बच्चे को जीवनदान देती है। तब तक उस गरुड़ पक्षी की मां आ जाती है। वह पूरी घटना सुनने के बाद उससे प्रभावित होती है और उसे स्याहू की माता के पास ले जाती है।स्याहू की माता जब साहूकार की छोटी बहू की परोपकार और सेवाभाव की बातें सुनती है तो प्रसन्न होती है। फिर उसे सात संतान की माता होने का आशीर्वाद देती है। आशीर्वाद के प्रभाव से साहूकार की छोटी बहू को सात बेटे होते हैं, जिससे उसकी सात बहुएं होती हैं। उसका परिवार बड़ा और भरापूरा होता है। वह सुखी जीवन व्यतीत करती है।
अहोई अष्टमी व्रत की पूजन विधि ◆ माताएं सूर्योदय से पूर्व स्नान करके व्रत रखने का संकल्प लें।  
◆ अहोई माता की पूजा के लिए दीवार या कागज पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाएं और साथ ही सेह और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं।
◆ सायंकाल के समय पूजन के लिए अहोई माता के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर जल से भरा कलश रखें।
◆ तत्पश्चात रोली-चावल से माता की पूजा करें।मीठे पुए या आटे के हलवे का भोग लगाएं।
◆ कलश पर स्वास्तिक बना लें और हाथ में गेंहू के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा सुनें।
◆ इसके उपरान्त तारों को अर्घ्य देकर अपने से बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।
अहोई अष्टमी पूजा सामग्री
पूजा सामग्री – चावल, रोली, मोली अथवा धूप की नाल
अहोई अष्टमी की आरती
जय अहोई माता जय अहोई माता ।तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।
ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।
तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।
जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।
तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।
शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।
श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।
अहोई अष्टमी पर बन रहे तीन शुभ योग
इस बार अहोई अष्टमी पर 3 विशेष योग बन रहे हैं। इसे अत्यधिक शुभ माना जा रहा है। इसमें सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और गुरु पुष्य योग एक साथ बन रहे हैं। इन योगों में पुष्य नक्षत्र को सभी नक्षत्रों का राजा माना जाता है। बृहस्पतिवार को गुरु पुष्य नक्षत्र योग होने से अत्यधिक लाभ मिलता है। ऐसे में इस बार अहोई व्रत करने वाली माताओं को कई गुना ज्यादा फल मिलेगा।

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