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    अजित कुमार यानि हिन्दी सहित्य का बेहद पहचाना हुआ नाम – ब्रजेश झा

    अजित कुमार यानि हिन्दी सहित्य का बेहद पहचाना हुआ नाम। सहित्य से अलग अजित कुमार को आम पाठक एक जमाने में धर्मयुग पत्रिका में खूब पढ़ा करते थे। अब नए जमाने के आम पाठकों में कम ही लोग धर्मयुग और अजित बाबु के बारे में नाम से ज्यादा कुछ जानते हैं। ऐसे में लीजिए इक याद ताजा करिए।

    इब्तिदाए इश्क

    यात्राओं के साथ शुरू से ही प्रीति, आश्चर्य और संतोष की जो भावना मेरे मन में जुड़ी रही है और अपनी जन्मभूमि की यात्रा ने इन भावों के साथ हमेशा गहरी खुशी और नई पहचान की जो अनुभूति मुझे दी है, वह सब इस बार की उन्नाव-लखनऊ यात्रा के दौरान शुरू से आखिर तक गायब रहा। यह बात अलग है कि दिल्ली की भयानकता, खीझ और थकान की तुलना में, एक हफ्ता फिर चैन से बीता लेकिन बचपन और यौवन के दिनों में यहां जो मस्ती और बेफिक्री हुआ करती थी, उसकी जगह अनवरत भागा-दौड़ी और कशमकश ने आखिरकार उन्नाव और लखनऊ को भी मेरे लिए दिल्ली बनाकर ही छोड़ा। वह सपना खंडित चाहे अभी न हुआ लेकिन बदरंग जरूर हो गया कि ऐसा वक्त आएगा जब हम अवकाश लेकर चैन और आराम की जिन्दगी अपने वतन में बिताएंगे।

    इस यात्रा ने समझाया कि चैन और आराम किसी छोटी सी छुट्टी के दौरान मनाली या गुलमर्ग में मिले तो मिले; उन्नाव, नवाबगंज और लखनऊ में तो मुकदमों, झगड़ों, फ़सादों, पटवारियों, पेशकारों, चपरासियों, अफसरों को भुगताते-निपटाते ही गुजारना होगा। सुख की कल्पना यहां तो साकार होने वाली नहीं, क्योंकि चकबंदी अधिकारी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमों का जाल फैला हुआ है। मेरे जीवन-काल में वह सिमटने वाला नहीं, भले ही मैं औऱ बीस वर्षों तक जीने की उम्मीद करूं। सच तो यह है कि नवाबगंज का मतलब मेरे लिए पिछले तमाम वर्षों में खीझ, गुस्से, अवरोध, भरपूर कोशिश के अलावा और कुछ नहीं रहा।

    इस यात्रा ने मुझे बार-बार यह सोचने के लिए मजबूर किया कि जिस जीवन की रक्षा और सुरक्षा की हम जी-तोड़ कोशिश करते हैं, वह जीवन तो गायब हो जाता है, सिर्फ कोशिश ही कोशिश यहां से वहां तक फैली रहती है। हम अपने कन्धों पर बोझ बढ़ाते चले जाते हैं और अगली पीढ़ी के लिए एक ऐसी गठरी छोड़ जाते हैं दुर्गन्धयुक्त, मैले कपड़ों की, जिसको धुलाने की लागत शायद हमारे पीछे छूट गये बैंक-बैलेन्स से कहीं ज्यादा होगी।

    आखिर क्यों मुझे यह यात्रा करनी पड़ी ? इसीलिए न कि मेरे पिता ने बीस साल पहले करीब ढाई हजार रुपये में ज़मीन का एक टुकड़ा खरीदा था जिसकी कीमत आज बहुत हो चुकी है और जिसके किसी हिस्से को हथियाने में एक स्थानीय गुंडा कामयाब हो गया। अब मैं बीस साल तक उसके साथ मुकदमेबाजी करूंगा फिर मुमकिन है, जीतने पर लाख-दो लाख और लगाकर, अड़ोस-पड़ोस की थोड़ी और ज़मीन खरीद अपने बेटे-भतीजों को सौंप जाऊं। फिर जब वे हिसाब-किताब बिठा कर आत्मतृप्त होने लगेंगे कि उनके खानदान की माली हैसियत अकेले नवाबगंज में पच्चीस लाख रुपये से अधिक की है और वहां आरा मिल. पेपर मिल या कोल्ड स्टोरेज का लाभकारी धन्धा मज़े से शुरू किया जा सकता है तो उन्हें पता चले कि उनकी जमीन के किसी अन्य टुकड़े पर किसी अन्य स्थानीय लठैत ने कब्जा जमा लिया है। तब वे अपनी जमीन की कीमत अस्सी लाख या दो करोड़ रुपये हो जाने तक अनवरत मुकदमेबाजी करते जाएं…

    यह सिनिरेयो दिल्ली से रवाना होते समय भीड़ भरे रेल के डिब्बे में जागते-ऊंघते कभी दिमागी तो कभी पलकों में बनता-मिटता रहा है। पहला पड़ाव था उन्नाव, जहां वकीलों से मिलने का मतलब था- एक ऐसे जाल में फंसा महसूस करना, जिससे निकलने की न कभी हम उम्मीद कर पाते हैं, न उसमें फंसे बिना अपने लिए कोई दूसरा चारा ही खोज पाते हैं। जब तुम्हारे अधिकार पर कोई दूसरा ज़बर्दस्ती दखल करे तो तुम यदि इतने विरक्त या बुद्धिमान नहीं हो कि इस कब्जे को नज़रअंदाज कर सको तो यह तय है कि तुम पुलिस कचहरी, वकील, गवाह, कागज-तारीख के अनवरत शिकंजे में जरूर ही फंस जाओगे। यह तटस्थता या होशियारी मैं अपने निजी जीवन में थोड़ी बहुत लागू कर सका, जबकि बाकी तमाम लोग इसे दब्बूपन, कायरता, सुस्ती, पलायनवाद आदि- आदि कहते समझते रहे लेकिन अपने पिता और छोटे भाई को मैं कभी नहीं समझा पाया कि ज़मीन-जायदाद और मान-मर्यादा के लिए लड़ने-झगडने में समय, शक्ति और साधन का जो अपव्यय करना पड़ता है, उससे हमेशा एक ही मसल याद आती है कि टके की बुलबुल नौ टका हुसकाई।

    चूकिं, उनकी राय मुझसे मेल न खाती थी और मैं खूद भी कभी-कभी सोचने लगता था कि गलती कहीं न कहीं मेरे ही सोच में है, और कि जो भी हो मुझे ज़रूरत के वक़्त उनके हाथ मज़बूत करने चाहिए- यह मेरा नैतिक कर्तव्य है- तो आखिरकार मुझे भी, मजबूरन इस जंजाल में फंसना पड़ा, लेकिन जब मैं इस मुहिम का हिस्सा बना, तो मैंने यह भी समझा कि यहां अधिक वास्तविक दुनिया है जो हमें जीने का ज्यादा कारगर ढंग सिखा सकती है और संसार का पूर्णतर चित्र हमारे सामने रखती है। उस एक हफ्ते में मैंने बहुत जानकारी हासिल की, जिसे विस्तार से बताना जरूरी नहीं, अपनी समझ के लिए कुछ ही मुद्दे दर्ज करता हूं ताकि सनद रहे और वक़्त जरूरत काम आय। मैंने अनुभव किया कि आम तौर से निचले दर्जे के कर्मचारी अधिक सुस्त, काहिल और भ्रष्ट हैं बनिस्पक ऊंचे दर्जे के। कार्यकुशलता और शिष्टता का भी बड़ अभाव है। लेकिन हमारी व्यवस्था का ढांचा कुछ ऐसा है कि पैसे या निजी संबंधों के बल पर हम अपना अधिकतर काम इस निचले तबके के अमले से करवा सकते हैं। पटवारी, पेशकार, सिपाही, दारोगा हमारे लिए जितना कारगर हो सकता है, उतना मंत्री, सचिव या उच्च अधिकारी वर्ग नहीं हो पाता। देश का जीवन- स्तर जिस निचले दर्जे पर सामान्य रूप से चलता है, वहां सुई की उपयोगिता तलवार की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देती है।

    जहां तक उच्च अधिकारियों का संबंध है, वे किन्हीं मामलों में कारगर होते जरूर हैं, लेकिन तभी जब उन पर ऊपर से कोई गहरा दबाव पड़े या कोई अन्य बड़ी वजह हो, वरना आमतौर से वे हीला-हवाल कर मामले से बचने की और कीचड़ में कमल वाली छवि बनाये रखने की कोशिश करते हैं। यह जरूर है कि हमारी व्यवस्था में उनकी हैसियत ऐसी बनायी गई है कि यदि वे प्रभावकारी हस्तक्षेप का निर्णय लेते हैं तो तमाम बन्द दरवाजे अपने आप खुलने लगते हैं। हमारे मामले में भी यही बात लागू हुई कि एक मामूली पटवारी ने जमीन के कागजों में मौजूद तनिक से पेंच की जानकारी किसी स्थानीय हड़पबाज घुसपैठिये को दे दि और उसने हमारी जमीन में ऐसी लात घुसा दी कि उसे निकाल फेंकना मुश्किल हो गया। बहरहाल जब सत्ता के पहियों को हमने घुमाना शुरू किया तो ऐसा लगा कि पटवारी उनके वेग को संभाल नहीं पा रहा है, लेकिन यह तो लड़ाई की महज शुरूआत है। अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता कि चक्के में फंसा पेंचकस उसको जाम कर देगा या खुद टूट-फूट जायेगा। बहुत सी अन्य बातों पर लड़ाई का नतीजा निर्भर करेगा। अभी तो मुझे न मामले की पूरी जानकारी है न झगड़े की शक्ल साफ़ हुई है। सिर्फ चार-छह बार पेशियों पर हाजिर होना और तारीखों का बढ़ जाना ही हाथ लगा है। इसे पूर्वजन्मों के संचित पुण्य का फल कहूं या किन्हीं पापों का फूट निकलना, मैं नहीं जानता।

    यह बेशक मालूम है कि बिना आरक्षण वाली वापसी रेल यात्रा में पिताजी द्वारा सिखाया गया मूलमंत्र मैं कितना ही जपूं कि,बैठने की जगह मिले तो खड़े मत रहना और लेटने की गुंजाइश दिखे तो बैठे रहने से बचनालेकिन इसका क्या भरोसा कि भेड़ियाधसान मुझे डिब्बे के भीतर घुसेड़ कर ही चैन लेगी या गाड़ी छूट जाने के बाद प्लेटफार्म पर अटका और अगली ट्रेन की फिक्र में डूबा मैं देर तक दोहराता ही रह जाऊंगा- इब्तिदाए इश्क है… रोता है क्या !

    आगे आगे देखिये होता है क्या !’

    ब्रजेश कुमार झा
    ब्रजेश कुमार झाhttps://www.pravakta.com
    गंगा के तट से यमुना के किनारे आना हुआ, यानी भागलपुर से दिल्ली। यहां दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज से पढ़ाई-वढ़ाई हुई। कैंपस के माहौल में ही दिन बीता। अब खबरनवीशी की दुनिया ही अपनी दुनिया है।

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