लेखक परिचय

अम्बा चरण वशिष्ठ

अम्बा चरण वशिष्ठ

मूलत: हिमाचल प्रदेश से। जाने माने स्‍तंभकार। हिंदी और अंग्रेजी के अनेक समाचार-पत्रों में अग्रलेख प्रकाशित। व्‍यंग लेखन में विशेष रूचि।

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लेखक- अम्बा चरण वशिष्ठ
ठीक ही तो कहते हैं कि किसी सभ्य समाज में फांसी की सज़ा उस समाज के नाम पर एक कलंक है। पर साथ ही यह कोई नहीं कहता कि यदि वह समाज सभ्य है तो उस में हत्या केलिये भी कोई स्थान नहीं है। जब हत्या नहीं होगी तो फांसी की सज़ा का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

प्रत्येक हत्या के पीछे होता है एक उत्प्रेरक कारण जिसके निराकरण का प्रावधान सभ्य समाज की न्याय व्यवस्था में उपलब्ध होता है। फिर भी इस ‘सभ्य’ समाज के व्यक्ति न्याय व्यवस्था का सहारा न लेकर कानून अपने हाथ में ले लेते हैं और जिस व्यक्ति से उन्हें मतभेद, द्वेष या गुस्सा होता है उसे वह न्याय व्यवस्था के अधीन दण्ड दिलाने की बजाय न्याय का डण्डा स्वयं अपने हाथ में उठा कर उसे अपने हाथों से दण्डित करते हैं। यह दण्ड मारपीट, हाथ-पांव तोड़ने तक ही सीमित नहीं रहता। कई बार तो यह हत्या तक का अमानुषिक दण्ड बन कर रह जाता है हालांकि उसका अपराध इतना घोर नहीं होता कि उसे न्याय व्यवस्था के अधीन उसके अपराध केलिये उसे फांसी ही मिलती। अपराधी इसे ‘आदर्श’ न्याय और सज़ा की संज्ञा दे देते हैं।

इसी प्रकार किसी सभ्य समाज में न आतंकवाद केलिये कोई स्थान होना चाहिये और न आतंकवादी हिंसा का व हत्याओं के लिये। आतंकवादी एक दम्भी व्यक्ति होता है जो स्वयं को सही और बाकी सब को गलत मानता है जो उससे सहमत नहीं होते। उसका सामाजिक व न्याय व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं होता। जनतन्त्र व बहुमत में उसकी आस्था नहीं होती। वह बात मानता है तो बस अपनी। कानून मानता है तो अपना। न्याय मानता है तो उसे जिसे वह दूसरों को देता है। तर्क के आधार पर नहीं, वह अपनी बात आतंक के बल पर सैकड़ों-हज़ारों से मनवाना चाहता है। जो उससे सहमत नहीं वह सब उसे मूर्ख, समाज व देश के दुश्मन और उसके अपने शत्रु दिखते हैं। चुनाव व्यवस्था में उसका विश्वास नहीं होता क्योंकि वह इतना अवश्य जानता है कि बहुमत उसके साथ नहीं है।

आतंकवादी अपने आतंक द्वारा दूसरों के मानवाधिकारों को बड़ी बेरहमी से कुचलता है। आग-फूंक करना और निर्दोष जनता और कानून की रक्षा कर रहे रक्षाकर्मियों की हत्या कर देना वह अपना अधिकार और इसे अपनी न्याय व्यवस्था का अभिन्न अंग समझता है। पिछले 17 वर्षों में लगभग एक लाख निर्दोष आतंकवाद की बलि चढ़ चुके हैं जिस में से लगभग 75,000 अकेले जम्मू-कश्मीर से हैं। यह संख्या पाकिस्तान से कारगिल समेत चार युध्दों और चीन के साथ 1962 के युध्द में शहीद हुये लोगों से चार गुणा से अधिक हैं। देश द्वारा इतनी कुर्बानी दे देने के बाद भी आतंकवाद के दानव की हिंसा की पिपासा बढ़ती ही जा रही है।

उधर जब दस-पचास निर्दोष आतंकी हिंसा का शिकार हो जाते हैं तो दो दिन तो मीडिया अवश्य समाचार देता है पर बाद में इस समाचार को आया-गया बना दिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि जो बच्चे अनाथ हो गये, जो महिलायें विधवा हो गईं, जिन बूढ़ों की इस उम्र में सहारे की लाठी छीन ली गई, उनका क्या बना। आतंकी हिंसा तो आज इतनी साधारण बात हो गई है कि कई बार तो समाचारपत्र इस खबर को विशेष महत्व ही नहीं देते और कहीं कोने में छोटी से खबर लगा देते हैं । इलैक्ट्रानिक मीडिया की भी यही हालत है । घटना के बाद बेचारे निरीह सन्तप्त परिवार की कोई सुध नहीं लेता।

वास्तविकता तो यह है कि अव्वल तो कोई आतंकबादी पकड़ा ही नहीं जाता। यदि पकड़ा भी जाये तो उसे सज़ा नहीं होती क्योंकि कोई गवाही देने आगे नहीं आता क्योंकि सब को अपनी और अपने परिवार के जीवन से प्यार है। गल्ती से अगर कभी-कभार कोई आतंकवादी पकड़ा जाये तो उसके अपराध से पहले उसकी रक्षा का कवच बन जाते हैं उसके मानवाधिकार। वह व्यक्ति मानवाधिकारों का सुपात्र बन जाता है जिसने अनगिनत हत्यायें की हैं और सैंकडों के मानवाधिकारों को अपने पांव तले रोंदा है। हमारी मानवाधिकार संस्थाओं केलिये उन व्यक्तियों के मानवाधिकार बहुत पावन हैं जो दूसरों के मानवाधिकारों की हत्या करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानों इन संस्थाओं के दृष्टि में मानवाधिकर केवल अपराधियों और आतंकवादियों के ही होते हैं जिनकी रक्षा करना उनका धर्म है। बेचारे निर्दोष व्यक्तियों के तो कोई मानवाधिकार होते ही नहीं और न ही उनकी रक्षा करना मानवाधिकारों की रक्षा में लगी लोग व संस्थायें अपना कर्तव्य व धर्म ही मानते है। ऐसा लगता है कि मानवाधिकार संस्थाओं की दृष्टि में वह तो मानव नहीं गली के कीड़े-मकोड़े हैं जो तो बस मरने केलिये ही पैदा हुये हैं और आतंकवादी तो उनका नरसंहार कर उन्हें इस नरकीय जीवन से मुक्ति दिला कर पुण्य ही कमाते हैं। यदि ऐसा न होता तो मानवाधिकार संस्थायें आम जनता के मानवाधिकारों के प्रति भी उतनी ही चिन्तित नज़र आतीं जितनी कि वह अपराधियों और आतंकवादियों के प्रति दिखती हैं। यही बात बहुत हद तक हमारे मीडिया के बारे भी सच है। कई बार तो ऐसा लगता है कि पावन मानवाधिकार अर्जित करने केलिये तो व्यक्ति विशेष केलिये अपराध करने और आतंकवादी बनने की तपस्या करना अनिवार्य योग्यता है।

हमारे मीडिया की पैनी नज़र व कलम इस खोज खबर के पीछे कभी नहीं दौड़ती कि हमारे आतंकवादियों को शरण प्रदान करने वाले कौन हैं, उन्हें आर्थिक सहायता कौन प्रदान करते हैं, उनके छुपने के ठिकाने कहां हैं, किस प्रकार आतंकवाद से निपटा जा सकता है और अपराधियों को पकड़ा जा सकता है ताकि निर्दोष हत्यायें न हों। अपने राष्ट्रीय कर्तव्यपालन में डटे किसी सुरक्षाकर्मी की यदि कोई आतंकवादी निमर्म हत्या कर देता है तो हमारी मानवाधिकार संस्थाओं के कान पर जूं नहीं रेंगती। पर यदि मुठभेड़ में कोई आतंकवादी अपनी जान गंवा बैठता है तो इनके कान खड़े हो जाते हैं और इसमें फर्जी मुठभेड़ की बू आने लगती है। तब वह इस मुठभेड़ को फर्जी साबित करने केलिये दिन-रात लगा देते हैं। ऐसा आभास मिलता है कि उनकी दृष्टि में आतंकवादी द्वारा किसी सुरक्षाकर्मी की हत्या उसका एक पावन अधिकार है और जवाब में अपनी सुरक्षा करते-करते सुरक्षाकर्मी के हाथों किसी आतंकवादी का मारा जाना घोर दण्डनीय अपराध। तब सारे मीडिया और मानवाधिकार संस्थाओं में कोहराम मच जाता है।

ज्यों ही किसी आतंकवादी के पुलिस हिरासत में प्रताड़ना या मौत की सूंघ उन तक पहुंचती है तो मीडिया विद्युत गति से हरकत में आ जाता है और अपनी खोज-खबर की दक्षता के प्रमाण देने में एक दूसरे के साथ होड़ में आ जाता है। मोटी-मोटी सुर्खियां लगती हैं, ब्रेकिंग न्यूज़ बनती है। सारा-सारा दिन समाचार चलते रहते हैं। दुर्दान्त अपराधियों और आतंकवादियों के पिछले सारे काले कारनामें धुल जाते हैं और वह जनता के सामने उभर आते हैं सच्ची-सुच्ची पीड़ित-प्रताड़ित आत्मायें जिनके साथ इस ‘सभ्य’ समाज में बड़ा अन्याय हुआ है। वह महान बन जाते हैं, शूरवीर शहीद।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सभ्य समाज में किसी भी दोषी को बिना मुकद्दमा चलाये सज़ा नही दी जा सकती। पर क्या आतंकवादियों को निर्दोष महिलाओं, वच्चों और बूढ़ों को – और कई बार धर्म के आधार पर – मौत के घाट उतार देने का मानवीय अधिकार है? यदि नहीं, तो हमारी मानवाधिकार संस्थाओं ने इसे रोकने और अपराधियों को दण्ड दिलाने में क्या योगदान दिया है? इनका पावन कर्तव्य क्या केवल असमाजिक व आपराधिक तत्वों के मानवाधिकारों की ही रक्षा करना है और उन्हें अपने पापों की सज़ा दिलाना नहीं?

आजकल तो हमारा समाज इतना ‘सभ्य’ बन चुका है कि हमारी पुस्तकों में सुभाष चन्द्र बोस, सरदार भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरू सरीखे महान् स्वतन्त्रता सेनानी व शहीद तो आतंकवादी बन चुके हैं और अफज़ल गुरू सरीखे आतंकवादी जिसने संसद पर हमला बोला उसे निर्दोष और शहीद बनाने की क्वायद की जा रही है। देश के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहे आठ सुरक्षाकर्मी जिन्होंने अपना जीवन बलिदान कर दिया वह मानो गाजर-मूलीं थे और यह आतंकवादी उनसे महान् हो गया। उच्चतम् न्यायालय ने जिसे अपने कुकर्म केलिये मृत्युदण्ड दिया उसे जीवनदान देने के प्रयास हो रहे हैं। न्यायालय के निर्णय पर प्रश्न उठाये जा रहे हैं। यदि उसे भारत की न्याय व्यवस्था में न्याय नहीं मिला तो किसी अन्य देश में मिलेगा?

यह है भारत के ‘सभ्य’ समाज का यथार्थ!

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं)

2 Responses to “सब ‘सभ्य’ – हम, हमारा समाज और मीडिया”

  1. प्रवक्‍ता ब्यूरो

    admin

    रविजी, नमस्‍कार।
    आपके उत्‍साहवर्द्धक शब्‍दों से हमें प्रेरणा मिलती हैं। आज हम अपने प्रयास को सफल मान रहे हैं। आशा है आगे भी आपका स्‍नेह व सहयोग हमें मिलता रहेगा।

    संजीव कुमार सिन्‍हा
    संपादक, प्रवक्‍ता(डॉट)कॉम

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