लेखक परिचय

डॉ. राजेश कपूर

डॉ. राजेश कपूर

लेखक पारम्‍परिक चिकित्‍सक हैं और समसामयिक मुद्दों पर टिप्‍पणी करते रहते हैं। अनेक असाध्य रोगों के सरल स्वदेशी समाधान, अनेक जड़ी-बूटियों पर शोध और प्रयोग, प्रान्त व राष्ट्रिय स्तर पर पत्र पठन-प्रकाशन व वार्ताएं (आयुर्वेद और जैविक खेती), आपात काल में नौ मास की जेल यात्रा, 'गवाक्ष भारती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, आजकल स्वाध्याय व लेखनएवं चिकित्सालय का संचालन. रूचि के विशेष विषय: पारंपरिक चिकित्सा, जैविक खेती, हमारा सही गौरवशाली अतीत, भारत विरोधी छद्म आक्रमण.

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-डॉ राजेश कपूर

यद्यपि ऐलोपैथी का एकछत्र साम्राज्य दुनियाभर के देशों पर नजर आता है पर इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि यह औषधि सिद्धांत सही है। ‘दवा-लॉबी’ का गढ़ माने जाने वाले अमेरीका की दशा इन दवाओं के कारण इतनी खराब है कि वहां के कई ईमानदार चिकित्सक इन्हें किसी महामारी से अधिक खतरनाक मानने लगे हैं। विश्वप्रसिद्ध स्वास्थ्य साईट “Mercola.com” के अनुसार अमेरिका में 2,25,000 लोग हर साल ऐलोपैथिक चिकित्सा के कारण मर जाते हैं। दवाओं के बुरे प्रभाव को आजीवन भोगने वालों की गिनती इन मृतको से कहीं अधिक है। जब अमेरीका की यह दुर्दशा है तो दुनिया के अन्य देशों के कितने लोग इन दवाओं के बुरे प्रभावों का शिकार बनें और असाध्य कष्ट भोग रहे हैं, इसका अनुमान कठिन है। यह संख्या करोड़ों में हो सकती है। डॉ जोसैफ मैरकोला द्वारा इस की विस्तृत और प्रमाणिक जानकारी दी गई है। बड़ी दवा कंपनियों पर ये आरोप लगते हैं कि ये शक्तिशाली दवा माफिया अपने हथकण्डों के दम पर दुनिया को अपनी घातक दवाएं खाने पर बाध्य कर रहा है।

प्रश्न यह है कि आखिर केवल ऐलोपैथी की दवाओं के ही इतने घातक प्रभाव क्यों होते हैं? बीसीयों प्राचीन पद्धतियाँ संसार में प्रचलित हैं, उनमें से तो किसी की दवाएं बार-बार वापिस लेने या बन्द करने की, उनपर प्रतिबन्ध लगाने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। जबकि ऐलोपैथिक दवा निर्माता हानिकारक दवाओं के घातक प्रभावों के ओरोपों के चलते कई बिलियन डालर जुर्माना अदा कर चुके हैं। वास्तव में एलोपेथी की दवाओं के निर्माण का सिद्धांत ही दोषपूर्ण है। इसे जानने समझाने से पूरा चित्र स्पष्ट हो जाता है ।

विषाक्तता का सिद्धांत :- आयुर्वेद तथा सभी चिकित्सा पद्धतियों में मूल पदार्थों यथा फल, फूल, पत्ते, छाल, धातु, आदि को घोटने, पीसने, जलाने, मारने, शोधन, मर्दन, संधान, आसवन आदि क्रियाओं में गुजारा जाता है। इनमें ‘एकल तत्व पृथकीकरण’ का सिद्धांत है ही नहीं। विश्व की एकमात्र चिकित्सा पद्धति ऐलोपैथिक है जिसमें ‘एकल तत्व पृथकीकरण’ का सिद्धांत और प्रकिया प्रचलित है। इसकी यही सबसे बड़ी समस्या है। एक अकेले साल्ट, एल्कायड या सक्रीय तत्व के पृथकी करण; (single salt sagrigation) से प्रकृति द्वारा प्रदत्त पदार्थ का संतुलन बिगड़ जाता है और वह विषकारक हो जाता है। हमारे चय-अपवय; (metabolism) पर निश्चित रूप से विपरीत प्रभाव डालने वाला बन जाता है। वास्तव मे इस प्रक्रिया में पौधे या औषध के प्रकृति प्रदत्त संतुलन को तोड़ने का अविवेकपूर्ण प्रयास ही सारी समस्याओं की जड़ है। पश्चिम की एकांगी, अधूरी, अनास्थापूर्ण दृष्टि की स्पष्ट अभिव्यक्ति ऐलोपैथी में देखी जा सकती है। अहंकारी और अमानवीय सोच तथा अंधी भौतिकतावादी दृष्टी के चलते केवल धन कमाने, स्वार्थ साधने के लिये करोड़ों मानवों (और पशुओं) की बली ऐलोपैथी की वेदी पर चढ़ रही है।

एकात्मदर्शन के द्रष्टा स्व. दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार पश्चिम की सोच एकांगी, अधूरी, असंतुलित अमानवीय और अनास्थापूर्ण है। जीवन के हर अंग को टुकड़ों में बाँटकर देखने के कारण समग्र दृष्टी का पूर्णतः अभाव है। प्रत्येक जीवन दर्शन अधूरा होने के साथ-साथ मानवता विरोधी तथा प्रकृति का विनाश करने वाला है। ऐलोपैथी भी उसी सोच से उपजी होने के कारण यह एंकागी, अधूरी और प्रकृतिक तथा जीवन विरोधी है।

7 Responses to “ऐलोपैथिक दवाओं की विषाक्तता का सिद्धान्त”

  1. Dr. ashutosh nandan tripathi

    एलो शब्द का अर्थ है- सामान्य से अलग | आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के पञ्च महाभूत सिद्धांत के सामानांतर क्लाड बनाड (१८१३) ने स्वस्थ सरीर का रहस्य बताते हुए कहा था “एक कोश तभी तक स्वस्थ रहता है जब तक उसके अन्तः कोशीय तरल व वह्य्कोशीय तरल के मध्य संस्थापन बना रहता है|
    यदि allopathसे शल्य चिकित्सा को अलग कर दिया जाये तो इससे अधिक निरर्थक चिकित्सा पद्धति कोई और नहीं होगी , यह कहना एक कटु सत्य है |
    allopath मात्र लक्षण विशेष की चिकित्सा पर प्राथमिक बल देता है, जबकि आयुर्वेद रोग की मुलभुत कारणों की स्थायी चिकित्सा करता है |
    आयुर्वेद आयु का विज्ञानं है| आयुर्वेद के सत्वाजय के सिद्धांत के द्वारा शतायु होकर चतुर्थ पुरुषार्थो की प्राप्ति कर अपने जीवन के मूल्यों को सार्थक बनाया जा सकता है |
    आज के परिवेश में आयुर्वेद को एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में आकलन करना अत्यंत दुखद है |
    आयुर्वेद मात्र एक चिकित्सा पद्धति नहीं वरण एक जीवन जीने की शैली है |
    हमारे देश में बहुतायत प्रयोग में आने वाली दवाए अमेरिका व अन्य कई देशो में प्रतिबंधित है|
    हमे जरुरत है तो सिर्फ अपने पुरातन ज्ञान को नवीन दिशा देने की जिससे हमारा राष्ट्र एक बार पुनः ” जगतगुरु ” जैसी संज्ञा से गौरवान्वित हो सके|

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  2. Kuldeep Sharma

    आपका यह आर्टिकल पढ़ा बहुत अच्छा लगा

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  3. Soneesh Sharma(PYS)

    आपका लेख ज्ञानवर्धक और आज के परिपेक्ष में काफी महत्वपूर्ण है.

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  4. kapil

    डा. कपूर जी,
    आपने एक अछूते विषय पर बहुत बड़ा निष्कर्ष दिया है. देश ही नहीं सारे संसार को इस पर विचार करना चाहिए. आनेवाले समय में आपकी यह स्थापना ( फाईंडिंग )बहुत बड़े शोध का आधार बन सकती है.

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  5. sunil patel

    bahut hi gyanvardhak jankari. Dhanyavaad. Apke agle lekh ke intjaar main.

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    जी हाँ! ईश्वर कृपा से सारा जीवन यही करने का मन है. पाठकों के प्रोत्साहन, आलोचना के आलोक के साथ ” प्रवक्ता.कोम ” जैसे प्रयास निर्बाध चलते रहें और इनकी सामर्थ्य बढ़ती रहे तो मुझ सरीखे अनेकों भारत-भारती की सेवा का सौभाग्य प्राप्त करते रहे हैं, करते रहेंगे.
    विरोधी ताकतों को कम करके न आंकें, स्वामी रामदेव जी की एक वेबसाईट (३ में से) ब्लोक है, यह आज ही देखा. मेरी मेल बहुत बड़ी सख्या में ब्लोक होती ही रहती है. अतः हम सबकी नज़रें चौकन्नी चाहियें. सत्य को जानना और आगे प्रचारित करना,आज के इस दानव का रामबाण उपाय है. यह ज़िंदा ही सूचनाओं को छुपाने के दम पर और गलत सूचनाएं फैलाने के दम पर है. धन्यवाद !

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  7. Agyaani

    आदरणीय कपूर जी,
    लेख के लिए बहुत बहुत धन्यबाद! हम आशा करते हैं कि ऐसे और तथ्यपरक लेख आपकी लेखनी से जीवनपर्यन्त निकलते रहेंगे!

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