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    …और अब मोदी अंगोछा

    आजकल मुखबंद (मास्क) सबकी जरूरत बन गया है। शुरू में तो इस पर असमंजस था कि इसे लगाएं या नहीं ? कुछ लोग कहते थे कि इसे कोरोना के रोगी या उनके बीच में काम करने वाले ही लगाएं। बाकी को जरूरत नहीं है। कुछ कपड़े की दो या तीन परतों वाले मुखबंद के समर्थक थे, तो कुछ सर्जिकल मुखबंद या इससे भी आगे एन.95 की। मार्च में कुछ ही लोग मुखबंद लगाए मिलते थे; पर अपै्रल में सबके चेहरे पर ये दिखाई देने लगा। 25 से लेकर 250 रु. तक के मुखबंद बिकने लगे। अब तो शासन ने इसे अनिवार्य कर दिया है। कई जगह इसके बिना बाहर निकलने पर जुर्माना ठोका जाने लगा है। शायद कोरोना के जाने तक ये लोगों के स्वभाव में आ जाएगा।

    मुखबंद की मांग बढ़ी, तो घरेलू महिलाओं से लेकर उद्योगपति तक इसे बनाने लगे। थे। साड़ी, चुन्नी, पगड़ी जैसे पुराने कपड़ों से भी मुखबंद बनने लगे। जेल में कैदियों को इसमें लगा दिया गया। राष्ट्रपति की पत्नी भी घर में इसे बनाती दिखीं। मांग बढ़ने पर फैशन वाले (डिजाइनर) मुखबंद आ गयेे। कई लोगों ने इसे धंधा बना लिया। इससे उन्हें भी लाभ हुआ और जनता को भी। लेकिन भारत 130 करोड़ का देश है। हरेक को कम से कम तीन-चार मुखबंद तो चाहिए ही। जिससे हर दिन इन्हें ठीक से धोकर पहन सकें। इतने मुखबंद बनना आसान नहीं है। चाहे कितने भी सस्ते हों; पर भारत में हर कोई इतने मुखबंद खरीद भी नहीं सकता। इसका विकल्प बना साधारण अंगोछा।

    प्रधानमंत्री मोदी ने जब कोरोना के काल में दूरदर्शन पर दूसरी बार जनता को संबोधित किया, तो उन्होंने मुंह अंगोछे से ढक रखा था। वे कई बार सरकारी बैठकों में भी ऐसा करते दिखे। बंगाल और उड़ीसा के चक्रवात प्रभावित क्षेत्र के दौरे में भी उन्होंने अंगोछे से ही मुंह ढक रखा था। इससे ये संकेत मिला कि लोग अंगोछे से मुंह और नाक ढक सकते हैं। यह बाजारी मुखबंद का एक सस्ता और सर्वसुलभ विकल्प है। यद्यपि सम्पन्न लोग फेसशील्ड भी प्रयोग कर रहे हैं; पर अधिकांश महिलाएं चुन्नी से और पुरुष अंगोछे से मुंह ढकने लगे हैं। उ.प्र. के बाराबंकी जिले में अंगोछे बनाने के हजारों उद्योग हैं। जबसे मोदी ने अंगोछा मुंह पर रखा, तबसे वैसे अंगोछे की मांग बढ़ गयी। इस पर वहां के उद्योगपति बाजार में ‘मोदी अंगोछा’ ले आये। अब ये अंगोछे पूरे देश में बिक रहे हैं। यानि इस संकट को उन्होंने एक अवसर बना लिया।

    वैसे यह कोई नयी बात नहीं है। प्रायः लोग जिसे अपना आदर्श या हीरो मानते हैं, उस जैसा बनने का प्रयास करते हैं। लोग लोकप्रिय राजनेता, फिल्मी हीरो, हीरोइन, खिलाडि़यों आदि की नकल करते हैं। इसमें युवा वर्ग आगे रहता है। आजादी के आंदोलन में खादी से बनी ‘गांधी टोपी’ स्वाधीनता सेनानियों की पहचान थी। कई जगह शासन इस पर प्रतिबंध लगा देता था; पर लोग उसे लगाकर जेल चले जाते थे। पता नहीं इसका नाम गांधी टोपी क्यों पड़ा ? क्योंकि इसे लगाये हुए गांधीजी का कोई चित्र नहीं मिलता। आजादी के बाद यह कांग्रेस वालों की पहचान बन गयी, क्योंकि नेहरुजी भी इसे लगाते थे। जब अधिकांश कांग्रेसी भ्रष्टाचार में डूब गये, तब किसी कवि ने लिखा था, ‘‘इन गांधी टोपी वालों को, जनता चुन-चुनकर मारेगी।’’ अब भी कुछ कांग्रेसी कभी-कभी वैसी टोपी में नजर आ जाते हैं।

    प्रधानमंत्री नेहरुजी के कारण ‘नेहरू जाकेट’ भी लोकप्रिय हुई। बिना बांहों और कई जेब वाला यह छोटा कोट बहुत प्रचलित है। चूंकि इसमें रूमाल, मोबाइल, पेन, चश्मा, बटुआ आदि आ जाते हैं; पर नेहरुजी की प्रिय ‘अचकन’ अधिक नहीं चली। यह घुटनों तक लटकता लम्बा बंद गले का कोट था। इसमें कपड़ा और सिलाई अधिक लगती थी तथा यह असुविधाजनक भी था। डा. लोहिया इसे मुगल दरबार के तबलचियों की पोशाक कहते थे। आजकल किराये पर लेकर उत्तर भारत में दूल्हे इसे पहनते हैं।

    इंदिरा गांधी छोटे बाल रखती थीं। भारत में महिलाओं का बाल कटवाना अच्छा नहीं माना जाता; पर उनकी देखादेखी तारकेश्वरी सिन्हा आदि कई महिला नेताओं ने ऐसे बाल रख लिये। अब तो मायावती और प्रियंका वाड्रा सहित कई कामकाजी महिलाएं ऐसा करती हैं। संजय गांधी के दौर में उनका सफेद कुर्ता-पाजामा बहुत लोकप्रिय हुआ। आपातकाल में कांग्रेसी दफ्तरों में ये बहुत सस्ते में बिकते थे। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर उनका शाॅल ओढ़ने का ढंग फैशन बन गया। दिल्ली में जब अरविंद केजरीवाल ने ‘आम आदमी पार्टी’ बनाकर चुनाव लड़ा, तो उनका मफलर और पार्टी की टोपी खूब चली। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ‘वी फाॅर विक्ट्री’ प्रतीक दुनिया भर में आज भी लोकप्रिय है। फिल्मी सितारों की नकल तो हमेशा ही हुई है। साठ के दशक में लड़कियां ‘साधना कट’ बाल रखती थीं। राजेश खन्ना की खड़े काॅलर वाली कमीज और अमिताभ बच्चन के कान ढके बाल भी खूब चल चुके हैं।

    ये दौर नरेन्द्र मोदी का है। उनके प्रधानमंत्री बनने पर लोग उन जैसा आधी बाहों वाला कुर्ता पहनने लगे थे। अब मोदी अंगोछे की बारी है। यह जहां लोगों को संक्रमण से दूर रखेगा, वहां हजारों कारोबारियों का भी उद्धार करेगा। ‘एक पंथ दो काज’ शायद इसे ही कहते हैं।

    – विजय कुमार

    विजय कुमार
    विजय कुमार
    निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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