बेमिसाल अदाकारी के अलावा और भी अनेक प्रतिभाओं के धनी थे दिलीप साहब

 तनवीर जाफ़री
  भारतीय उप महाद्वीप के सबसे लोकप्रिय फ़िल्मी अभिनेता दिलीप कुमार जिनका वास्तविक नाम यूसुफ़ ख़ान था,गत दिनों इस संसार से हमेशा के लिए रुख़सत हो गये। उनकी प्रतिभा व व्यक्तित्व को लेकर बहुत कुछ कहा व लिखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमिताभ बच्चन तक अनेक विशिष्ट व अतिविशिष्ट हस्तियों ने उनके सम्मान में 'शब्दांजलि ' अर्पित की हैं। अमिताभ बच्चन ने तो उन्हें एक संस्था बताया है। वास्तव में वे अदाकारी की एक  संपूर्ण संस्था थे। बड़े से बड़े अभिनेताओं ने या तो दिलीप कुमार के अभिनय को देखकर अभिनय की कला सीखी या उनकी नक़ल करने में ही स्वयं को सौभाग्यशाली समझा। जिनलोगों को उनके साथ काम करने का मौक़ा मिला उनकी ख़ुशक़िस्मती का तो कहना ही क्या।
                                                       परन्तु दिलीप साहब केवल एक अभिनेता मात्र ही नहीं थे बल्कि इसके अतिरिक्त वे एक महान साहित्य प्रेमी,राजनैतिक व सामाजिक सूझ बूझ व दख़ल रखने वाले बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के भी  स्वामी थे। भारत-पाकिस्तान संबंधों  के एतबार से उनकी शख़्सियत दोनों देशों के बीच मैत्री सेतु का भी काम करती थी। पेशावर में पैदाइश होने के बावजूद अपनी सारी ज़िन्दिगी भारत में बिताने से ही साफ़ ज़ाहिर है कि उनका दिल भारत के लिए ही धड़कता था। भाषाई ज्ञान के लिहाज़ से  शायद ही फ़िल्म जगत के किसी अन्य अभिनेता को इतनी भाषाओँ का ज्ञान हो जितनी दिलीप कुमार को आती थीं।  वे हिंदी उर्दू भाषाओँ  अतरिक्त अंग्रेज़ी ,पंजाबी,मराठी,पश्तो,बंगाली,गुजरती फ़ारसी,हिँड्को तथा अवधी व भोजपुरी भाषाओँ का  सम्पूर्ण ज्ञान रखते थे। उनकी लाइब्रेरी में उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेज़ी व अन्य  भाषाओँ के साहित्य भरे पड़े हैं। वे क़ुरान और गीता व बाइबल के ज्ञान से भी भांति परिचित थे। उन्हें सितार बजाने के अलावा क्रिकेट खेलने का भी बहुत शौक़ था।
                                                       उर्दू भाषा ख़ास तौर पर उर्दू शेर-ो-शायरी का तो उन्हें बहुत ज़्यादा ही शौक़ था। वे देश विदेशों में अनेक उच्चस्तरीय मुशायरों की रौनक़ बढ़ाते और वहां अपने कलाम पेश करते भी देखे व सुने जाते थे।दिलीप साहब के मुंबई निवास पर दशकों तक देश विदेश के बड़े से बड़े अदीबों व शायरों की महफ़िल सजा करती थी। वे स्वयं सब मेहमानों की बड़े ही हुस्न -ो-एख़लाक़ से मेज़बानी किया करते थे। कैफ़ी आज़मी,फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,कुंवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर ' ख़ुमार बाराबंकवी  साहिर लुधियानवी,मजरूह सुल्तानपुरी,जावेद अख़्तर जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अनेक महान अदीबों की नशिस्त दिलीप साहब के दौलत ख़ाने पर सजा करती थी। मैं भी उन सौभाग्यशाली लोगों में हूँ जिसने दिलीप कुमार साहब को मुशायरे में कलाम पढ़ते सुना व देखा है। जीप इंडस्ट्रीज़ के प्रबंध निदेशक व पूर्व राज्य सभा सदस्य स्व एम आर शेरवानी की जानिब से इलाहबाद स्थित गवर्नमेंट प्रेस के समक्ष स्थित विशाल ग्राउंड में 1981 में एक मुशायरा आयोजित किया गया था। इस मुशायरे की सदारत महान उर्दू शायर अली सरदार जाफ़री साहब ने की थी जबकि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ व साहिर लुधियानवी जैसे कई बड़े शायर भी इस मुशायरे का हिस्सा थे। सारी रात चले इस मुशायरे में जैसे ही दिलीप साहब मंच पर तशरीफ़ लाये और माइक संभाला यक़ीन कीजिये खचाखच भरा स्टेडीयम लगभग 20 मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। बावजूद इसके कि यह मुशायरा रात 10 बजे शुरू होना था फिर भी केवल अपने प्रिय अभिनेता की एक झलक देखने व उनसे रूबरू होने की ग़रज़ से पूरा स्टेडियम दोपहर तक ही खचाखच भर चुका था। स्व० एम आर शेरवानी के बड़े बेटे व भारत सरकार में पूर्व विदेश  स्वास्थ्य मंत्री रहे सलीम इक़बाल शेरवानी के साथ उनकी सुन्दर व छोटी सी विदेशी कार में बैठ कर दिलीप साहब ने इलाहबाद शहर ख़ासकर सिविल लाइंस का ख़ूब भ्रमण किया था और अपने प्रशंसकों से रूबरू हुए । उन्होंने इलाहबाद में सेवईं भी खाई और इतनी पसंद की कि उनके नाम पर वहां आज भी 'दिलीप सेवईं ' बनाई जाती है।
                                               दिलीप कुमार को उनके लाजवाब व बेमिसाल अभिनय के लिये बेस्ट एक्टर के लिये आठ बार फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला। 1993 में दिलीप साहब को फ़िल्म फ़ेयर लाइफ़ टाइम एचीवमेंट एवार्ड से भी नवाज़ा गया। उन्हें लता मंगेशकर के साथ एक अति विशेष 50 वां फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड भी हासिल हुआ। 1994 में उन्हें दादा साहब फ़ाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। दिलीप कुमार 1980 में न केवल मुंबई के शैरिफ़ मनोनीत किये गए बल्कि  भारत सरकार ने 1991 में उन्हें पदम् भूषण व 2015 में पदम् विभूषण भूषण जैसे देश  के सर्वप्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाज़ा। वे कांग्रेस पार्टी की ओर से सन 2000 से लेकर 2006 तक राज्य सभा के महाराष्ट्र प्रतिनिधि के रूप में  सदस्य भी रहे। देश विदेश से मिलने वाले उनके पुरस्कारों व सम्मानों की सूची वैसे तो बहुत लंबी है परन्तु उनके जीवन में उन्हें पाकिस्तान से मिलने वाला वहां का सर्वोच्च सम्मान 'निशान-ए-इम्तियाज़ '  एक ऐसा सम्मान था जिसने तत्कालीन शिव सेना प्रमुख स्वर्गीय बाल ठाकरे की आपत्ति के चलते कुछ विवाद पैदा कर दिया। दरअसल 1998 में पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'निशान-ए-इम्तियाज़ ' मिलने  के बाद शिव सेना प्रमुख ने दिलीप साहब से इस सम्मान को वापस करने की अपील की थी । विवाद बढ़ने पर दिलीप कुमार यह विषय  तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के संज्ञान में लाए और उन्हीं से इस बात का फ़ैसला करने को कहा कि पाकिस्तान से प्राप्त सम्मान  'निशान-ए-इम्तियाज़ '  वापस करना चाहिये अथवा नहीं। वाजपेई जी ने  सम्मान वापस करना तो दूर उल्टे अपने साथ पाकिस्तान जाने वाले उच्चस्तरीय शिष्टमंडल में एक नाम दिलीप कुमार का भी रखा। परन्तु अस्वस्थ होने के कारण वे वाजपेई जी के साथ पाकिस्तान नहीं जा सके।  
                                             बहरहाल मरणोपरांत उसी महान कलाकार को राजकीय सम्मान के साथ बिदाई देकर स्वर्गीय बाल ठाकरे के पुत्र व महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री एवं वर्तमान शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने यह साबित कर दिया कि भले ही राजनैतिक कारणों से उनके पिता के पाकिस्तानी सम्मान को लेकर विवाद क्यों  न रहे हों परन्तु दिलीप साहब के देशप्रेम,फ़िल्म जगत के अतिरिक्त उनकी साहित्यिक व  सामाजिक सेवाओं को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसमें  कोई शक नहीं कि फ़िल्म जगत के एक ऐसे महान कलाकार ने इस  दुनिया को अलविदा कह दिया जो बेमिसाल अदाकार होने के अलावा और भी अनेक प्रतिभाओं के धनी थे।

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