व्यवस्था की मजबूरी बन गये हैं अन्य पिछड़ा वर्ग

देश की बृहत्तम आबादी अन्य पिछड़ा वर्ग की है और उक्त वर्ग को अभीतक इस देश में इनके अधिकारों से तमाम कारणों के तहत बंचित कर रखा गया है। देश में ज्यादत्तर समय तक सत्ता में रहीं कांग्रेस सरकार ने अबतक उक्त वर्ग को उपेक्षित ही कर रखा था। जबकि इस वर्ग के वोटों की बदौलत नेतागण सत्ता सुख भोगते रहें।

जगदीश यादव
देश की बृहत्तम आबादी अन्य पिछड़ा वर्ग की है और उक्त वर्ग को अभीतक इस देश में इनके अधिकारों से तमाम कारणों के तहत बंचित कर रखा गया है। देश में ज्यादत्तर समय तक सत्ता में रहीं कांग्रेस सरकार ने अबतक उक्त वर्ग को उपेक्षित ही कर रखा था। जबकि इस वर्ग के वोटों की बदौलत नेतागण सत्ता सुख भोगते रहें। सबसे दुखद बात तो यह है कि पिछड़ों को सिढ़ी बनाकर संसद में पहुंचने वाले तमाम राजनेता संसद जाने के बाद सत्ता सुख की आबोहवा में इस कदर मसगूल होंते रहें कि जैसे उन्हें उक्त वर्ग से कोई सरोकार ही नहीं था या फिर है। उक्त वर्ग ने समय-समय पर तमाम आन्दोंलनों के जरीये अपनी मांगों को तमाम सरकारों के समाने रखा और अब तो पिछड़ा वर्ग किसी भी सरकार के लिये उतना ही अहम है जितना जिन्दगी के लिये हवा या पानी।
कांग्रेस सरकार को छोड़ दें तो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को वर्तमान की मोदी सरकार से काफी उम्मीदें है। सरकार ने इस वर्ग के लिये किश्तों में ही सही सार्थक प्रयास कर रही है। ऐसे में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की केंद्रीय सूची में 15 नई जातियों को केंद्र की मोदी सरकार नेशामिल किया है। सरकार ने इस बारे में अधिसूचना जारी की है। बिहार और झारखंड की एक-एक जातियां शामिल की गई हैं। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने आठ राज्यों- असम, बिहार, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महराष्ट्र,मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के संदर्भ में 28बदलावों की सिफारिश की थी। इन 28 में से, बिहार में गधेरीइताफरोश, झारखंड में झोरा और जम्मू-कश्मीर में लबाना समेत 15 जातियां नई प्रवष्टियां हैं, नौ कुछ जातियों की पर्याय या उपजातियां हैं जो पहले से सूची में हैं तथा चार में सुधार किया गया है। संयुक्त सचिव बी एल मीणा के हस्ताक्षर वाली अधिसूचना कहती है, केंद्र सरकार ने एनसीबीसी और जम्मू-कश्मीर सरकार की उपरोक्त सिफारिशों पर गौर किया और उन्हें मंजूर किया तथा उक्त राज्यों के अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची में उन्हें शामिल करने-सुधार करने की अधिसूचना जारी करने का फैसला किया। जाहिर है कि पिछड़ों के आन्दोंलन और जागरुकता को देखते हुए कोई भी इस बात को समझ सकता है कि इस वर्ग को अगर अब और दरकिनार नहीं किया जा सकता है। जबकि अबतक उक्त वर्ग को दरकिनार ही किया जाता रहा है। जरा ध्यान दें तो पता चलेगा कि 1जनवरी 1978 को पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की गई। यह आयोग मंडल आयोग के तौर पर जाना गया। 1980 के दिसंबर माह में मंडल आयोग ने देश के गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को रिपोर्ट सौंपी। उक्त रिपोर्ट में अन्य पिछड़े वर्गों को 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई थी। 1982 में रिपोर्ट संसद में पेश हआ और फिर 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल ने आयोग की सिफारिशों को चुनाव घोषणापत्र में शामिल किया। 7 अगस्त 1990 विश्वनाथ प्रताप सिंह ने रिपोर्ट लागू करने की घोषणा की। आज पिछड़ों के आत्म बलिदान और आन्दोंलन रंग ला रहा है। यहीं कारण है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की केंद्रीय सूची में 15 नई जातियों को सरकार ने शामिल किया है। वैसे देखा जाये तो उक्त वर्ग को बंगाल में सबसे ज्यादा उपेक्षित होना पड़ रहा है। कारण देश के तमाम राज्यों लगभग 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है लेकिन यहां सबसे कम 7प्रतिशत ही । देखा जाये तो बंगाल में भी अब उक्त वर्ग में व्यवस्था के खिलाफ आसंतोष फूटने लगा है। शायद यही कारण था कि राज्य के हुगली जिले व महानगर कोलकाता में भाजपा ओबीसी मोर्चा के कार्यक्रम में पिछड़ों रेला उमड़ा। आकड़ों और दस्तावेज की माने तो मंडल आयोग द्वारा तमाम उपाय व बैज्ञानिक अधार के तहत 11 प्रकार की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक सह अन्य मामलों पर जातियों का अध्यन किया था। तब गहन शोध के बाद आयोग ने पाया था कि देश में इस समय कुल 3,743पिछड़ी जातियां हैं। यह भारतीय आबादी का कुल जमा 52प्रतिशत हिस्सा था। इसके लिए 1931 की जनगणना को आधार बनाया गया था। इससे पूर्व कालेलकर आयोग ने2,399 जातियों को पिछड़ा और इनमें से 837 को अति पिछड़ा माना था। आज उक्त वर्ग किसी की भी सत्ता को हिलाने की औकात रखते हैं लेकिन बस जरुरत है इंन्हें एक ईमानदार आन्दोंलन व मुखिया की।

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