क्या आप भी पचास के हो रहे हैं ?

 विजय कुमार, 

पिछले दिनों हमारे पड़ोस में श्रीरामकथा का आयोजन था। कथावाचक घर-गृहस्थी वाले अच्छे विद्वान और संत पुरुष थे। प्रतिदिन एक घंटा वे अपने आवास पर लोगों से मिलते थे। उसमें लोग अपनी निजी जिज्ञासा, समस्या आदि की चर्चा करते थे। गुप्ता जी अब 55 साल के हो गये हैं। अवकाश प्राप्ति में कुछ ही वर्ष बचे हैं। उन्होंने इसके बाद की अपनी चिन्ताओं के बारे में कुछ जिज्ञासा रखी। इसका उत्तर संत जी ने जो दिया, उसका सार संक्षेप निम्न है। यह केवल गुप्ता जी ही नहीं, बाकी सबके लिए भी उपयोगी है।जैसे-जैसे आपकी आयु बढ़ती है, लोगों का आपकी ओर देखने का दृष्टिकोण बदलने लगता है। आपके सफेद होते जा रहे बाल, बढ़ते जा रहे पेट, चाल में आते धीमेपन और माथे पर बढ़ती जा रही लकीरों को देखकर लोग समझ जाते हैं कि आप भी 50 के आस-पास पहुंचने लगे हैं। इस आयु में सामान्यतः हर व्यक्ति अपनी बेटी की शादी, बेटे के काम-धंधे आदि के बारे में चिंतित होता है। यह ठीक भी है। क्योंकि इस दायित्व को ठीक से निबटाये बिना आप अगले सफर की ओर सफलतापूर्वक नहीं चल सकते।50 का होते-होते व्यक्ति को और एक बात की ओर ध्यान देना चाहिए; और वह यह कि वह 60 साल का हो जाने के बाद क्या करेगा ? अर्थात अपने जीवन के तीसरेपन में, जब वह नौकरी से सेवानिवृत हो जाएगा; यदि वह व्यवसायी है, तो जब उसके लड़के-बच्चे काम संभाल लेंगे। यदि आप महिला हैं, तो जब आपकी पुत्रवधू घर पर आ जाएगी.. आदि। निःसंदेह अगले कदम का आधार पिछला कदम ही होता है। इसलिए यदि आप 50 पार कर रहे हैं, तो कुछ बातों की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।अवकाशप्राप्ति के बाद का जीवन सुख-चैन से व्यतीत करने का सबसे अच्छा मार्ग है स्वयं को किसी सामाजिक, धार्मिक सेवाकार्य में व्यस्त रखना। इससे आपका घर, कारोबार, स्वास्थ्य और प्रतिष्ठा सब ठीक बने रहेंगे; पर इसके लिए 50 वर्ष के होते ही कुछ तैयारी प्रारम्भ कर देनी चाहिए।सबसे महत्वपूर्ण अपने मन की तैयारी है। विचार करें कि हमें अवकाशप्राप्ति के बाद किस संस्था से जुड़ना है। यदि ऐसी कोई संस्था आपके आसपास है, तो बहुत अच्छा; अन्यथा आप अपने समविचारी चार-छह मित्रों के साथ ऐसी संस्था बना सकते हैं। अच्छा तो यह रहेगा कि अपने परिचय की संस्थाओं में कुछ समय लगाना शुरू करें, वहां की रीति-नीति और कार्यशैली को समझें। इनमें से जो पति-पत्नी दोनों के मन, बुद्धि और स्वभाव के अनुकूल हो, उसका चयनकर अवकाशप्राप्ति के बाद उसमें ही पूरा समय लगायें।यह जरूरी नहीं कि वह संस्था आपके घर के आसपास या नगर में ही हो। भारत में हजारों तीर्थ और धर्मस्थल हैं, जहां अनेक प्रकार की धार्मिक और सेवा संबंधी गतिविधियां चलती हैं। इनमें से भी किसी के साथ आप सम्बद्ध हो सकते हैं। 50 से 60 वर्ष के बीच का समय इसमें लगाएं। चयनित संस्था के बारे में पति-पत्नी दोनों की सहमति आवश्यक है। अपनी आवष्यकताएं सीमितकर स्वयं पर कम से कम खर्च करें । पति-पत्नी दोनों मिलकर विचार करें और फिर निष्चयपूर्वक एक ही कमरे में, पर अलग-अलग सोने का नियम बनाएं।यहां तक पहुंचते-पहुंचते शरीर कुछ शिथिल होने लगता है; पर आसन-व्यायाम और ध्यान आदि से शरीर को अधिकाधिक स्वस्थ बनाये रख सकते हैं। अब अपने आहार-विहार में भी कुछ परिवर्तन कर लेना चाहिए। अन्न का प्रयोग तीन के बदले दो बार तथा सब्जी, सलाद, फल, दूध आदि का प्रयोग अधिक करना ठीक रहेगा। मसालेदार भोजन, सिगरेट या शराब जैसी कोई आदत है, तो उसे अब छोड़ देना ही श्रेयस्कर है। प्रातः या सायंकाल का तीन-चार कि.मी. का भ्रमण सदा ही ठीक रहता है; पर अब तो इसे दिनचर्या का अनिवार्य अंग बना लें। किसी बीमारी की उपेक्षा न करें; पर शरीर में हो रहे आयुगत परिवर्तनों से परेशान भी न हों। स्वयं को अपने अगले कार्य और जीवन के लिए तैयार करना प्रारम्भ कर दें।अवकाशप्राप्ति के बाद पति-पत्नी दोनों को सामान्य जीवनयापन में कठिनाई न हो, इसके लिए समुचित धन का प्रबन्ध भी अवश्य कर लेना चाहिए। निजी संस्थाओं के बदले सरकारी बैंक पर ही भरोसा करना ठीक है। केवल अपने खाने-पीने के लिए ही नहीं, तो बेटी के घर आने पर, किसी शादी-विवाह में जाने पर लेन-देन के जो दायित्व निभाकर हर दम्पति को प्रसन्नता होती है, उसकी भी व्यवस्था कर लें। यद्यपि भविष्य क्या होगा, कोई नहीं जानता, फिर भी किसी आकस्मिक संकट का विचार भी कर लेना चाहिए।यदि आप अवकाशप्राप्ति के बाद भी अपने बच्चों के साथ ही रह रहे हैं, तो अपने लिए अपेक्षाकृत छोटे स्थान को चुन लें; जिससे बेटे, बहू और उनके बच्चों को कष्ट न हो। पुत्र और पुत्रवधू को अपनी तरह से घर चलाने दें, बार-बार टोककर घर का वातावरण अषांत न करें। घर-बाजार के अधिकांश कार्य उन्हें ही सौंप दें। भौतिक वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग उन्हें ही करने दें। उनकी इच्छा के आगे अपनी इच्छाएं त्याग दें, अपनी आवश्यकता भी उन्हीं को बताएं। निश्चय जानिए, वे प्रसन्नतापूर्वक उसे पूरा करेंगे।अपनी चल-अचल सम्पत्ति के संबंध में किसी विश्वस्त वकील और एक-दो घनिष्ठ मित्रों से परामर्शकर उसकी लिखित वसीयत बना लें। यथासंभव बच्चों की भी उसमें सहमति लें; पर यदि कोई समस्या हो, तो भी वसीयत बनाएं अवश्य। इससे आप अनेक प्रकार के मानसिक तनाव से मुक्त रहेंगे तथा बाद में बच्चों में झगड़ा नहीं होगा।ध्यान रहे, हर व्यक्ति को 50 ही नहीं, 60 का भी होना है। उसे आज नहीं तो कल अवकाश भी लेना ही है। यदि उसकी तैयारी ठीक से की, तो न केवल आपका, बल्कि आपके बच्चों का जीवन भी अच्छा बीतेगा। इसके साथ-साथ आपके अनुभव से देश, धर्म और समाज का भी कुछ भला अवश्य होगा। और जब परमपिता परमेश्वर का बुलावा आयेगा, तो आप संतोष के साथ वहां भी जा सकेंगे।

 

 

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